मातृ-पितृ भक्ति दिवस: सेवा, सम्मान और ‘विश्वास का संकल्प’

मातृ-पितृ भक्ति दिवस: सेवा, सम्मान और 'विश्वास का संकल्प'
 
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा, मातु-पिता गुरु नावहिं माथा भावार्थ- प्रभु श्रीराम प्रातः काल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं। हमारी भारतीय सनातन संस्कृति की आत्मा यदि किसी मूल्य में समाहित है, तो वह माता-पिता के प्रति भक्ति और सेवा है। यह केवल एक पारिवारिक दायित्व नहीं, बल्कि जीवन का वह आदर्श है, जिसने हमारी सभ्यता और संस्कृति को हजारों वर्षों तक जीवित, जाग्रत और उज्ज्वल बनाए रखा है।  

हमारे शास्त्रों में वर्णित "मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः"- यह उपदेश केवल संस्कृत का एक श्लोक नहीं है, यह हमारे जीवन का दर्शन है। माता-पिता का स्थान संसार में सबसे श्रेष्ठ, सबसे पूज्य है। उन्हें देवताओं के समान स्थान प्राप्त है। जिस परिवार और समाज में माता-पिता की सेवा को प्राथमिकता दी जाती है, वहाँ धर्म, शांति और समृद्धि सदैव निवास करती है। उनकी उपस्थिति किसी जीवंत मंदिर की तरह होती है।

भारतीय सनातन संस्कृति का इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा हुआ है, जहाँ पुत्रों ने अपने जीवन को माता-पिता की सेवा में समर्पित कर दिया। प्रभु श्रीराम का वनवास पिता के आज्ञा पालन और भक्ति का अनुपम उदाहरण है। तो वहीं श्रवण कुमार की कथा आज भी मातृ-पितृ सेवा का आदर्श बनी हुई है। जिन्होंने अपने नेत्रहीन माता-पिता को काँवर में बैठाकर तीर्थयात्रा कराई। ये कथाएँ केवल आदर्श नहीं, वे संस्कारों की शिला हैं, जिन पर आज भी भारतीय समाज खड़ा है।

माता-पिता न केवल हमें जन्म देते हैं, बल्कि अपने त्याग, परिश्रम और प्रेम से हमें जीवन जीने की राह दिखाते हैं। वे हमारे पहले शिक्षक, पहले संरक्षक और पहले मार्गदर्शक होते हैं। उनकी शिक्षा व संस्कार से ही हमारी भावनात्मक, नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है। उनका आशीर्वाद हमारे जीवन का वह अदृश्य कवच है, जो हर संघर्ष में हमें बल देता है।

मेरे पूज्य पिताजी, मध्यप्रदेश भाजपा के संस्थापक सदस्य एवं राज्यसभा सांसद रहे स्व. श्री कैलाश नारायण सारंग जी का जीवन सेवा, सिद्धांत और त्याग की प्रतिमूर्ति रहा है। उनका जीवन न केवल राजनीति का एक यशस्वी अध्याय था, बल्कि उन्होंने अपने जीवन मूल्यों के माध्यम से परिवार से लेकर समाज तक नैतिकता, मूल्यबोध और सामाजिक चेतना का संचार किया है।

पूज्य पिताजी का स्वप्न था कि हर माता-पिता व बुजुर्गों को वह सम्मान और सेवा मिले जिसके वे अधिकारी हैं। उनका मानना था कि माता-पिता का आशीर्वाद ही वह अमूल्य निधि है जो संतान को जीवन  जीने में सही मार्ग प्रशस्त करती है। समाज की जड़ें तभी मजबूत होंगी जब उस समाज में माता-पिता और बुजुर्गों का सम्मान होगा।

पूज्य पिताजी का जीवन एक ऐसा दर्पण था जिसमें सेवा, नैतिकता और समाज के प्रति समर्पण झलकता था। उन्होंने सेवाभाव के जो आदर्श प्रस्तुत किए उसी का अनुसरण करते हुए हर वर्ष उनकी जयंती 02 जून और पुण्यतिथि 14 नवंबर को मातृ-पितृ भक्ति दिवस के रुप में मनाने का संकल्प लिया है। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार, एक भावना और एक संकल्प है- जिससे समाज और भावी पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ा जा सके।

मेरी पूज्य माताजी स्व. श्रीमती प्रसून सारंग जी ने समाज के प्रति सदैव समर्पण भावना के संस्कारों की सीख के साथ सारंग परिवार को संस्कारित बनाया। उन्होंने पूज्य पिताजी के सेवा कार्यों में उनकी शक्ति बनकर उनका सदैव साथ दिया। वे अपने अंतिम समय तक समाज के उत्थान एवं कल्याण के लिये पूज्य पिताजी के प्रत्येक कार्य में उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलती रहीं। समाज के लिये उनके द्वारा दिया गया योगदान अविस्मरणीय है।

माता-पिता व बुजुर्गों का सम्मान करना केवल कर्तव्य नहीं, हमारा धर्म भी है। माता-पिता भले ही भौतिक रूप से हमारे साथ न हों, लेकिन उनका स्नेह, आशीर्वाद और प्रेरणा हमें हर पल मार्गदर्शन देती रहती है। जब वे हमारे बीच नहीं होते, तब हर वृद्ध, हर बुजुर्ग माता-पिता के प्रतीक बन जाते हैं।

जिस समाज में माता-पिता व बुजुर्गों का सम्मान होता है, वहां धर्म, संस्कृति और मानवता पुष्पित-पल्लवित होती हैं। मेरे माता-पिता भौतिक रूप से भले ही मेरे साथ नहीं हैं लेकिन सूक्ष्म रूप से सदैव मेरे साथ रहकर सेवा कार्य की प्रेरणा देते हैं। आज उनके भौतिक रूप से साथ न होने के कारण मेरे लिए हर बुजुर्ग माता-पिता के समान हैं। युवा पीढ़ी अपने माता-पिता के साथ-साथ बुजुर्गों का सम्मान करना सीखे इसी उद्देश्य को लेकर आज पूज्य पिताजी की जयंती पर सभी बुजुर्गों का सम्मान किया जा रहा है।

आज की पीढ़ी आधुनिकता की दौड़ में अपने जड़ों से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में आवश्यक है कि हम संस्कारों को चिरस्थाई रखें और अपने बच्चों को यह सिखाएं कि माता-पिता का सम्मान और सेवा ही उनकी सफलता की नींव है। हमें अपने परिवारों में ऐसे वातावरण का निर्माण करना होगा जहाँ बुजुर्गों को बोझ नहीं, बल्कि आशीर्वाद का स्रोत समझा जाए।

मातृ-पितृ भक्ति दिवस केवल एक दिन का आयोजन नहीं, यह जीवन भर निभाया जाने वाला व्रत है। यह एक ऐसा महायज्ञ है, जिसमें हम सेवा, सम्मान और संवेदना की आहुति देते हैं और परिणामस्वरूप प्राप्त करते हैं- एक संस्कारित, संवेदनशील और सशक्त समाज।

आइए, हम सब मिलकर इस पवित्र संकल्प को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। अपने माता-पिता के साथ-साथ समाज के प्रत्येक बुजुर्ग के लिए सेवा और सम्मान का दीप जलाएं। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी हमारे पूर्वजों को और यही सबसे बड़ा दायित्व होगा हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए।

विश्वास कैलाश सारंग
कैबिनेट मंत्री, म.प्र. शासन

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