राजा भभूतसिंह : एक ऐसा योद्धा जिसकी गाथा लोकगीतों में आज भी जीवित है

भोपाल

मध्य भारत की धरती, विशेषकर मालवा और नर्मदा तटवर्ती सतपुड़ा क्षेत्र, प्राचीन समय में अवंतिका महाजनपद का हिस्सा रही है। इस क्षेत्र की महादेव पहाड़ियाँ, ताप्ती और नर्मदा की घाटियाँ, हजारों वर्षों से धार्मिक और आध्यात्मिक साधना की भूमि रही हैं। यहाँ का कोरकू आदिवासी समाज भोलेनाथ को अपना आराध्य और कुल देवता मानता है। ऐसा विश्वास है कि कोरकू समाज भोलेनाथ के गणों और उनके अनुयायियों के वंशज हैं।

कोरकू समुदाय का प्रभुत्व 18वीं सदी तक इस सम्पूर्ण भूभाग में स्थापित था। राजा भभूतसिंह कोरकू, इसी परंपरा के एक ऐसे सिद्ध पुरुष और जागीरदार थे, जिनका प्रभुत्व पचमढ़ी, हर्राकोट, पातालकोट, तामिया, बोरी, मढ़ई, हरियागढ़, केसला, बैतूल और हरदा तक फैला हुआ था।

राजा भभूतसिंह का जीवन चमत्कारिक शक्तियों, आध्यात्मिक सिद्धियों और रणकौशल का अद्वितीय संगम था। वे तंत्र-मंत्र, जड़ी-बूटियों और वन औषधियों में पारंगत थे। कहा जाता है कि उन्होंने ऐसी दिव्य औषधियों का प्रयोग कर रखा था जिससे उनके शरीर पर किसी भी अस्त्र-शस्त्र का प्रभाव नहीं होता था। उन्होंने बूटी को अभिमंत्रित कर अपने शरीर में स्थापित किया था और इस कारण से लोहे के हथियार उनके शरीर को नुकसान नहीं पहुँचा सकते थे।

उनके शरीर की अमरता की कथा भी प्रसिद्ध है: राजा केवल हरे बांस की लकड़ी से ही मृत्यु को प्राप्त हो सकते थे, यह रहस्य केवल उनके सबसे निकटस्थ एक मित्र को ज्ञात था।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब तात्या टोपे और उनकी सेना अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए सतपुड़ा पहुँचे, तब उन्होंने राजा भभूतसिंह की शरण ली। अक्टूबर 1858 के अंतिम सप्ताह में फतेहपुर के सरैया घाट से तात्या टोपे ने नर्मदा पार की और पचमढ़ी क्षेत्र में प्रवेश किया। राजा भभूतसिंह ने गुफाओं के माध्यम से उन्हें हरियागढ़, बोरदई और फिर मुलताई क्षेत्र की ओर भेजा।

अंग्रेज कप्तान जेम्स फोर्सिथ को जब यह पता चला कि भभूतसिंह ने तात्या टोपे को शरण दी है, तो उसने फतेहपुर के नवाब आदिल मोहम्मद खान के माध्यम से राजा से तात्या को सौंपने का आग्रह किया। लेकिन निडर भभूतसिंह ने अंग्रेजों के सामने झुकने से इनकार कर दिया।

जुलाई 1859 में राजा भभूतसिंह ने खुलेआम विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों ने मिलिट्री पुलिस और मद्रास इन्फेंट्री की टुकड़ी को भेजा। देनवा घाटी में युद्ध हुआ जो लगभग छह महीनों तक चला। कोरकू योद्धाओं की गुप्त युद्ध नीति और पहाड़ी मार्गों की जानकारी अंग्रेजों के भारी हथियारों पर भारी पड़ी।

कहा जाता है कि युद्ध के दौरान राजा ने चिरौठा के दानों को मंत्रों से अभिमंत्रित कर मधुमक्खियों में परिवर्तित किया और उन्हें युद्ध के एक हथियार के रूप में प्रयोग किया। भभूतसिंह द्वारा अपनाई गई छापामार युद्ध रणनीति बिल्कुल शिवाजी महाराज जैसी थी — अदृश्य रहकर प्रहार करना और जंगलों की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाना।

एक बार राखी पर्व के अवसर पर भभूतसिंह अपनी मुंह बोली बहन से राखी बंधवाने खारी गाँव पहुँचे। वहीं किसी ने अंग्रेजों को गुप्त सूचना दे दी। अंग्रेजों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया, लेकिन उनकी दिव्य शक्ति के कारण उन्हें बाँधना असंभव था। कहा जाता है कि राजा का एक विश्वासपात्र मित्र, जो उनकी शक्तियों और रहस्यों से परिचित था, अंग्रेजों से मिल चुका था। उसी की गद्दारी से भभूतसिंह को पकड़ने में अंग्रेज सफल हुए।

अंग्रेजों ने उन्हें यातनाएँ दीं, परंतु वे अपने खजाने और रहस्यों की जानकारी देने को तैयार नहीं हुए। जब शारीरिक यातनाएँ बेअसर रहीं, तो उन्हें अन्न-जल से वंचित रखा गया। इसके बावजूद वे अंत तक अडिग रहे।

1860 में अंग्रेजों ने उन्हें जबलपुर में मृत्युदंड दिया। कुछ प्रमाणों में कहा गया है कि उन्हें फांसी दी गई, वहीं कुछ में कहा गया कि उन्हें गोलियों से छलनी कर मार दिया गया। अंग्रेजों ने उनके नामोनिशान मिटाने के प्रयास में उनके राज्य को वन विभाग को सौंप दिया। यह घटना भारतीय इतिहास में पहली थी जब किसी आदिवासी की शहादत के बाद उनकी जागीर को वन क्षेत्र घोषित किया गया।

आज भी देनवा नदी के तट पर राजा भभूतसिंह का बग़ीचा और “भभूतकुण्ड ” विद्यमान है, जिसमें बारहमासी जल भरा रहता है। चौरागढ़ मंदिर में उनके द्वारा चढ़ाए गए पत्थर के त्रिशूल आज भी दर्शनार्थियों को वीरता और भक्ति का संदेश देते हैं।

राजा भभूतसिंह की वीरता और बलिदान को कोरकू समाज ने लोकगीतों और भजनों के माध्यम से जीवित रखा है। पचमढ़ी क्षेत्र के गाँवों, मंदिरों और लोक संस्कृति में आज भी उनकी गाथाएँ सुनाई जाती हैं। राजा भभूतसिंह न केवल एक योद्धा थे, बल्कि वे जनजातीय चेतना और आत्मसम्मान के प्रतीक बन चुके हैं।

उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेजों का कोप कोरकू समाज पर टूटा। अनेक कोरकू लोग पहाड़ों में छुप गए, कुछ अन्य गोंड जागीरदारों के पास चले गए, तो कुछ तात्या टोपे के साथ महाराष्ट्र तक पहुँच गए। अनेक लोगों ने अपनी पहचान छिपा ली और अपने गोत्र/सरनेम बदल लिए।

राजा भभूतसिंह की वीरगाथा, अंग्रेज अधिकारी एलियट की 1865 की सेटलमेंट रिपोर्ट में भी दर्ज है। वे सतपुड़ा क्षेत्र के “शिवाजी ” कहे जाते हैं। अफसोस है कि जिस योद्धा ने अंग्रेजों से दो वर्षों तक सतत संघर्ष किया, वह इतिहास की पुस्तकों में उचित स्थान नहीं पा सका।

राजा भभूतसिंह कोरकू एक ऐसा नाम हैं, जो केवल कोरकू समाज का नहीं, पूरे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का गौरव हैं। उनका जीवन आदिवासी अस्मिता, देशभक्ति, और आध्यात्मिक शक्ति का जीवंत उदाहरण है। उनके बलिदान और शौर्य की गाथा को राष्ट्रीय पटल पर लाना, आज की पीढ़ी का नैतिक कर्तव्य बनता है।

राजा भभूतसिंह कोरकू — एक नाम नहीं, एक स्वाभिमान की ज्वाला हैं, जो आज भी सतपुड़ा की वादियों में गूंजती है।

दुर्गेश रायकवार

 

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