अमेरिका और यूके के इंजीनियरों ने डाले ‘हथियार’, स्टील्थ टेक्नोलॉजी में भारत के पास बड़ा मौका?

तिरुवनंतपुरम
 दुनिया के सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों में से एक ब्रिटिश रॉयल नेवी का F-35B 14 जून को तिरुवनंतपुरम में इमरजेंसी लैंडिंग करने के लिए मजबूर हो गया। इससे एक अनोखी स्थिति पैदा हो गई। यह घटना वैश्विक सैन्य तकनीक के समीकरणों को बदल सकती है। अब, लगभग तीन हफ्ते बाद ब्रिटेन की इंजीनियरिंग टीम एयर इंडिया के एमआरओ (Maintenance, Repair and Overhaul-MRO) हैंगर में मरम्मत का काम शुरू कर रही है। इस काम में इस विमान की अमेरिकी निर्माता कंपनी के इंजीनियर भी योगदान देने के लिए तिरुवनंतपुरम पहुंचे हैं। अमेरिकी और ब्रिटिश विशेषज्ञों की यह एक नई श्रृंखला है। ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स का एयरबस ए400ओम एटलस इन्हें उतारकर तुरंत लौट चुका है। इससे पहले कितने ही इंजीनयर आए और विमान को उड़ने लायक बनाने में नाकाम होकर अपने-अपने देश लौट गए। भारत शुरू से चाहता था कि इस फाइटर जेट को मेंटेनेंस हैंगर में ले जाकर आराम से मरम्मत की कोशिश की जाए। लेकिन, अभी तक ब्रिटिश नेवी ऐसा नहीं करने के लिए अड़ी हुई थी। लेकिन, आखिरकार उन्हें भारत की बात मानने के लिए मजबूर होना पड़ गया। बहरहाल,इस वजह से भारत एक दुर्लभ तकनीकी परिस्थितियों के बीच खड़ा है।

स्टील्थ फाइटर जेट की दुर्लभ खराबी और तकनीकी अवसर
F-35B में आई अचानक तकनीकी खराबी ब्रिटेन और अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रही है। लेकिन भारत के लिए यह एक सुनहरा अवसर साबित हो सकता है। यह विमान 110 मिलियन डॉलर से अधिक का है। इसे कड़ी सुरक्षा में रखा जाता है। यह तब भी देखने को मिला, जब एयरपोर्ट के वीआईपी पार्किंग से इसे एमआरओ हैंगर में खींचकर ले जाया जा रहा था। अब यह अत्याधुनिक अमेरिकी लड़ाकू विमान भारतीय MRO तकनीशियनों और ग्राउंड टीमों की नजरों के सामने है। भले ही जानबूझकर ऐसा न किया जाए, लेकिन संयोग से ऐसी परिस्थितियां पैदा हुई हैं कि इस स्टील्थ जेट की बनावट, कूलिंग सिस्टम, कोटिंग तकनीक और सेंसर अलाइनमेंट को देखकर भारतीय इंजीनियरों को भी बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है। उन्हें अत्याधुनिक अमेरिकी स्टील्थ टेक्नोलॉजी के बारे में नई जानकारियां मिल सकती हैं।

स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट बना रहा भारत
यह भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। भारत अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) बना रहा है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) वर्षों से स्टील्थ तकनीक पर काम कर रहा है। लेकिन, असली जानकारी और तुलनात्मक डिजाइनिंग के लिए प्रोटोटाइप की कमी के कारण काम में मुश्किलें आती हैं। भारत में F-35B की मौजूदगी से यह देखने को मिलेगा कि एक असली स्टील्थ जेट की तकनीक अंदर से कैसी होती है, उसकी मरम्मत कैसे होती है, और उसे कैसे सर्विस किया जाता है।

स्टील्थ विमान जितनी बड़ी ताकत, उतनी गोपनीय तकनीक
F-35B कोई साधारण लड़ाकू विमान नहीं है। इसे लॉकहीड मार्टिन जैसी अमेरिकी कंपनी ने बनाया है। इसे नाटो (NATO) के कई देश इस्तेमाल करते हैं। यह रडार से बचने वाली स्टील्थ तकनीक, सुपरसोनिक गति और आधुनिक सेंसरों वाली अत्याधुनिक लड़ाकू मशीन है। ब्रिटिश रॉयल नेवी की ओर से इस्तेमाल की जाने वाली इसकी वर्टिकल टेकऑफ और लैंडिंग (VTOL) क्षमता इसे और भी खास बनाती है। इसकी मरम्मत और समस्या का समाधान बहुत सावधानी से किया जाता है। इसलिए अभी तक बड़े-बड़े इंजीनियर इसे ठीक करने में नाकाम रहे हैं और न ही इसे किसी बड़े विमान से उठाकर ले जाने में सक्षम हो पाए हैं।

अमेरिका और यूके के इंजीनियरों को क्यों डालने पड़े'हथियार'
पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई F-35B किसी दूसरे देश में हफ्तों तक मरम्मत के लिए बेबस फंसा रहा हो। आमतौर पर, ऐसे विमानों की मरम्मत तुरंत कड़ी सुरक्षा में की जाती है या उन्हें सुरक्षित बेस पर ले जाया जाता है। भारत में, एक कमर्शियल MRO सुविधा में मरम्मत करने के लिए तैयार होने का फैसला एक बड़ा बदलाव है। यह दिखाता है कि यूके और अमेरिका के पास कोई और विकल्प नहीं था।

F-35B केस भारत के लिए तकनीकी और कूटनीतिक जीत
भारत ने अबतक इस स्थिति को बहुत ही समझदारी से संभाला है। इससे पता चलता है कि भारत का वैश्विक स्तर पर कितना प्रभाव बढ़ गया है। भारत ने इस विमान के बारे में कोई शोर नहीं मचाया। भारतीय अधिकारियों ने ब्रिटिश इंजीनियरों को बिना किसी परेशानी के काम करने दिया और हर संभव सहयोग किया है। यूके ने भारत को 'निरंतर समर्थन और सहयोग' के लिए धन्यवाद भी दिया है। इस सद्भावना से भारत और यूके के बीच रक्षा सहयोग और बढ़ सकता है। इससे पता चलता है कि भारत के तकनीकी ढांचे और काम करने के तरीके पर भरोसा किया जा सकता है। इससे भविष्य में रक्षा उत्पादन और विमान रखरखाव में संयुक्त उद्यम स्थापित किए जा सकते हैं।

अनजाने में ही सही, लेकिन तकनीक के क्षेत्र में बेहतर मौका
हालांकि, भारत को इस फाइटर जेट के सिस्टम तक पूरी पहुंच नहीं मिलेगी, और ब्रिटेन संवेदनशील चीजों को बचाने के लिए पूरी सावधानी बरतेगा, लेकिन आसपास काम करने वाले भारतीय इंजीनियरों को जेट के निर्माण, थर्मल शील्डिंग, रडार-एब्सॉर्बिंग मटेरियल या सेंसर लेआउट के बारे में कुछ जानकारी मिल सकती है। DRDO के वैज्ञानिकों और HAL (Hindustan Aeronautics Limited) जैसी एयरोस्पेस कंपनियों के लिए, यह घटना उनके रिसर्च या सिमुलेशन के आधार पर बनाए गए विचारों को सही साबित कर सकती है। कम से कम जानकारी मिलने से भी भारत के स्टील्थ जेट की डिजाइन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। खासकर मटेरियल इंजीनियरिंग, वजन का संतुलन, इंजन कूलिंग और एयरफ्रेम रखरखाव के बारे में जानकारी मिल सकती है।

"F-35B की आपातकालीन लैंडिंग और इसके बाद हुई मरम्मत से भारत को मिलने वाले तकनीकी लाभों और भविष्य की रक्षा क्षमताओं पर आपकी क्या राय है? क्या यह घटना भारत के लिए वाकई एक सुनहरा अवसर है, या इसके सीमित लाभ ही हैं? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ! लॉग इन करें और अपनी प्रतिक्रिया हिंदी या अंग्रेज़ी में साझा करें।

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