विलेज ऑफ आर्मी: छत्तीसगढ़ का वो गांव, जहां सेना बनना है परंपरा

किरीत
ये गांव है वीर जवानों का,अलबेलों का,मस्तानों का… इस गांव का यारों क्या कहना… जी हां!छत्तीसगढ़ में एक गांव है किरीत,जहां की माटी वीर सपूतों को जन्म देती है। यहां ऐसा कोई घर नहीं है जहां के युवा फौज में न हो। यहां के युवाओं में देशप्रेम की भावना कूटकूट कर भरी हुई है। इस गांव के 100 से अधिक युवा थल सेना में अलग-अलग पदों पर रहते हुए सीमा पर तैनात हैं। इसके अलावा पुलिस, आईटीबीपी, सीआरपीएफ, सीआईएसएफ जैसे विंगों में भी गांव के युवक सेवा दे रहे हैं। देश सेवा का जुनून और फौज में भर्ती होने का यह सिलसिला चार दशक पहले शुरू हुआ था, जो अब तक चल रहा है।

किरीत गांव के ग्राम पटेल लक्ष्मण प्रसाद चंद्रा बताते हैं कि 6 जून 1985 को सबसे पहले गांव के युवा ध्यानचंद्र चंद्रा की थल सेना में भर्ती हुई थी। ध्यानचंद्र को तब इस बात का जरा भी अंदाज नहीं था कि युवाओं में देशप्रेम का उनके द्वारा जगाया जज्बा इतना प्रभावी होगा कि किरीत का नाम पूरे छत्तीसगढ़ में अदब से लिया जाएगा। प्रदेश का यह पहला गांव है… जहां इतनी बड़ी संख्या में युवा देश की सेवा कर रहे हैं। देशसेवा की दीवानगी यहां के युवाओं में कुछ ऐसी है कि दिन रात हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। सुबह से लेकर शाम तक युवाओं को दौड़ लगाते देख सकते हैं। हर साल 6 से 7 युवाओं की भर्ती सेना में हो रही है।

प्रवेशद्वार पर लिखा ‘सैनिक नगर’
गांव के रजनीश कुमार खुंटे ने बताया कि देश सेवा के प्रति गांव के लोगों में इस कदर का जुनून आपने कहीं नहीं देखा होगा। देश और प्रदेश में गांव को सैनिक नगर के नाम से जाना जाता है। गांव की मिट्टी के कण-कण में देश सेवा का जज्बा है, जिसके चलते सौ से ज्यादा सेना के जवान देश सेवा में लगे हुए हैं। गांव के प्रवेश द्वार पर सैनिक नगर लिखा हुआ है। हमारे गांव के हर युवा का सपना है कि वह आर्मी में भर्ती हो और गांव के इस ख्याति को बनाए रखें। हमारे गांव किरीत को सैनिक का गांव भी कहते हैं। हमारे गांव ने पूरे छत्तीसगढ़ में अपनी और जांजगीर-चांपा जिले की अलग पहचान बनाई है।

आर्मी में हर साल 6 से 7 युवा जाते हैं
ग्रामीण सीताराम साहू बताते हैं कि गांव की आबादी लगभग 4 हजार के आसपास है। गांव के बच्चों में बचपन से ही देश प्रेम और देशभक्ति का जुनून देखने को मिलता है। देश सेवा करने का सपना… सपने को साकार करने का जुनून युवाओं में आपको दिखेगा। गांव के ग्राउंड में ही युवा अपने सपनों को पंख लगाने मेहनत करते दिख जाएंगे। आर्मी की नौकरी से रिटायर होने वाले युवा अब दूसरी जगहों पर नौकरी कर रहे हैं। डिप्टी कलेक्टर जैसे पद पर सेवा दे रहा है। उन्होंने बताया कि पिछले 40 साल से हर साल 6 से 7 सैनिक गांव से चयनित होते हैं। सेना के अलावा पुलिस, सीआरपीएफ में भी गांव के युवा नौकरी कर रहे हैं।

 

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