प्रधानमंत्री मोदी का स्वदेशी मंत्र: अब पैसों से नहीं, पसीने से होगी असली पहचान!

नई दिल्ली

‘मेरी स्वदेशी की व्याख्या बहुत सिंपल है. पैसा किसका लगता है, उससे लेना-देना नहीं है.  डॉलर है, पाउंड है… वह करेंसी काली है या गोरी है, मुझे लेना-देना नहीं है. लेकिन जो प्रोडक्शन है उसमें पसीना मेरे देशवासियों का होगा. जो प्रोडक्शन होगा, उसमें महक मेरे देश की मिट्टी की होगी.’ मोदी ने पिछले दिनों गुजरात में मारुति सुजुकी ई-विटारा इलेक्ट्रिक एसयूवी और हाइब्रिड बैटरी यूनिट का उद्घाटन करते हुए जब स्वदेशी की इस तरह व्याख्या की तो कई बातें स्पष्ट हो गईं. पीएम के बयान से यह साफ हो गया कि सरकार के स्वदेशी का दायरा इसके परंपरागत परिभाषा से कहीं व्यापक और वृहद है.

रविवार को राष्ट्र के नाम संबोधन में PM  नरेंद्र मोदी ने फिर से स्वदेशी मंत्र का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता को जैसे स्वदेशी के मंत्र से ताकत मिली, वैसे ही देश की समृद्धि को भी स्वदेशी के मंत्र से ही शक्ति मिलेगी. 

हर घर को स्वदेशी का प्रतीक बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा किआज जाने-अनजाने हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत सी विदेशी चीजें जुड़ गई हैं, हमें पता तक नहीं है. हमारे जेब में कंघी विदेशी है कि देसी है, पता ही नहीं है. हमें इनसे भी मुक्ति पानी होगी. 

 उन्होंने 'मेक इन इंडिया' पर जोर देते हुए कहा कि हम वो सामान खरीदें, जो मेड इन इंडिया हो, जिसमें हमारे देश के नौजवानों की मेहनत लगी हो, हमारे देश के बेटे बेटियों का पसीना हो. उन्होंने कहा कि ये हर भारतीय का मिजाज़ बनना चाहिए.

स्वदेशी का विचार

सहज भाषा में कहें तो स्वदेशी का अर्थ है "अपने देश का" या अपने देश में निर्मित वस्तुएं, सेवाएं और देश में पैदा हुए और फले-फूले विचार. स्वदेशी का कॉन्सेप्ट भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था. इसका उद्देश्य विदेशी (विशेषकर ब्रिटिश) वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करना था. तब महात्मा गांधी स्वदेशी के ब्रैंड एम्बेसडर थे. 

  आधुनिक संदर्भ में स्वदेशी का मतलब स्थानीय उत्पादों, प्रौद्योगिकी और संसाधनों को प्राथमिकता देना है ताकि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और विदेशी निर्भरता कम हो. 

  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठन परंपरागत रूप से स्वदेशी को राष्ट्रीय गौरव और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक मानते हैं. इनका तर्क है कि स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग से भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, रोजगार बढ़ेगा. 

  कुछ साल पहले तक तो संघ और स्वदेशी जागरण मंच स्वदेशी को विदेशी कंपनियों की "आर्थिक गुलामी" से बचने का उत्तर मानते थे. ये संगठन  विदेशी निर्भरता कम करने और संरक्षणवादी नीतियों को अपनाने की वकालत करते हैं. 

  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 की कोरोना संकट के दौरान स्वदेशी के पुश पर जोर दिया था. 

  PM मोदी ने 12 मई को "आत्मनिर्भर भारत अभियान" की घोषणा की थी. जिसमें स्वदेशी को आर्थिक आत्मनिर्भरता का आधार बताया गया था. 

  इसका फोकस स्थानीय विनिर्माण, आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना और विदेशी आयात से निर्भरता कम करना था. इसी दौरान पीएम मोदी ने वोकल फॉर लोकल का नारा दिया. इसका मतलब था कि भारतीयों को स्थानीय उत्पाद, लोकल सामान के बारे में खुलकर बात करना चाहिए और इसका प्रचार करना चाहिए.

  यह पीएम मोदी द्वारा स्वदेशी को जन-आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करता था. 

  इसी दौरान पीएम मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की. इसके साथ ही उन्होंने MSME, कृषि, और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन शुरू किए. रक्षा में 101 आयात वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाया गया.

स्वदेशी को ग्लोबल सप्लाई चेन से जोड़ा

  आगे के वर्षों में पीएम मोदी ने स्वदेशी को केवल स्थानीय उत्पादों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भूमिका से जोड़ा. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो नारा दिया गया उसी का नाम है, "मेक इन इंडिया, और मेक फॉर द वर्ल्ड" का नारा. 

  पीएम मोदी ने मेक इन इंडिया का नारा दिया तो निश्चित रूप से ये विदेशी पूंजी के स्वागत का न्योता था. दरअसल मेक इन इंडिया स्वदेशी और वैश्वीकरण का मिश्रण है, जो विदेशी पूंजी को आकर्षित कर भारत को मैन्युफैक्चरिंग और नवाचार का हब बनाता है. यह भारत की आर्थिक और रणनीतिक शक्ति को मजबूत करने की घोषणा है.

पैसा किसका लगता है, कौन सा देश लगाता है, बड़ी बात नहीं 

  यही वजह है कि पीएम मोदी ने अहमदाबाद में साफ कह दिया है कि स्वदेशी प्रोडक्शन में पैसा किसका लगता है, कौन सा देश लगाता है, ये बड़ी बात नहीं है. जो बड़ी बात है वो यह है कि प्रोडक्शन भारत भूमि में हो और इसका लेबर भी भारत से आए. 

  लेकिन सवाल है कि स्वदेशी को लेकर उस संगठन का क्या कहना है जो भारत में इसके पक्ष में सबसे बड़ा आंदोलन चलाता है. स्वदेशी जागरण मंच भारत में स्वदेशी आंदोलन की बड़ी ताकत है. 

  स्वदेशी को समझाते हुए स्वदेशी जागरण मंच के सह संयोजक अश्विनी महाजन कहते हैं कि इस टर्म को बहुत हद तक बदनाम किया गया और स्वदेशी की जो परिभाषा को जिस तरह से महात्मा गांधी ने समझाया उसके अनुसार स्वदेशी का अर्थ है अपने आस-पास के परिवेश के साजो-सामान का इस्तेमाल करना. उससे सामान बनाना और श्रेष्ठता लाना और अगर उसमें कुछ कमी हो तो उसको ठीक करना. 

  स्वदेशी आंदोलन में विदेशी सहयोग को स्वीकार करने की बात करते हुए अश्विनी महाजन ने आजतक डॉट इन से कहा, "स्वदेशी का मतलब कोई विदेशों से कटना नहीं है. विदेशों से संबंध नहीं रखना इसका मतलब स्वदेशी नहीं है. विदेशों से सामान नहीं खरीदना-बेचना स्वदेशी नहीं है, ये तो ऑटर्की (Autarky) है. स्वदेशी एक सकारात्मक विचार है." आजादी के समय स्वदेशी में बहिष्कार के कॉन्सेपट को समझाते हुए उन्होंने कहा कि ये उस काल की एक खासियत थी. 

  आधुनिक अर्थ में स्वदेशी को समझाते हुए उन्होंने कहा कि, "पीएम मोदी ने पहले मेक इन इंडिया कहा, फिर आत्मनिर्भर भारत कहा, फिर अब स्वदेशी की बात की. ये सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और परिस्थितियों के हिसाब से हम स्वदेशी को चुनते हैं."

स्वदेशी को बदनाम किया गया

  स्वदेशी जागरण मंच का मानना है कि स्वदेशी को बदनाम किया गया है और इसके लिए मंच सोशलिस्ट विचारधारा को जिम्मेदार मानते हैं. अश्विनी महाजन कहते हैं, " स्वदेशी का मतलब सोशलिस्ट नहीं है, स्वदेशी का ये अर्थ नहीं है कि सरकार सब कुछ करेगी. सरकार सब चीजों पर नियंत्रण रखेगी ऐसा नहीं है. स्वदेशी का मतलब है हम अपने देश में जो संसाधन है उसका देशहित में भरपूर उपयोग करना."  

  जब हम कहते हैं कि मेक इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड तो ये स्वदेशी है. यानि की हम इस क्वालिटी का प्रोडक्ट बनाएं कि दुनिया भर में इसकी मांग हो.  इसका मतलब ये नहीं है कि हम अपने लिए बनाएं और अपने लिए ही इस्तेमाल कर लें. 

  स्वदेशी की आधुनिक विचारधारा में विदेशी साझेदारों के साथ सहभागिता को सहमति देते हुए अश्विनी महाजन कहते हैं कि स्वदेशी का मतलब यह नहीं है कि विदेशों से हमें कुछ सिखना ही नहीं है.  

हिन्दू सोशलिस्ट सिस्टम का पक्षधर नहीं

  उन्होंने कहा कि हिन्दू कभी भी सोशलिस्ट सिस्टम के पक्षधर नहीं हैं. हिन्दू ग्रोथ मॉडल कहता है कि हमें विश्व के लिए प्रोडक्शन करना है. भारत उद्यमियों का देश है… हमने पिछले 11 सालों में सिर्फ स्टार्ट अप की बात ही की तो एक लाख साठ हजार स्टार्ट अप बन गए. 110-115 यूनिकॉर्न बन गए. हालांकि महाजन ने कहा कि वे इन यूनिकॉर्न की अच्छाई-बुराई में नहीं जा रहे हैं. 

नेहरू जी ने स्वदेशी को बदनाम किया

  अश्विनी महाजन ने आगे साफ कहा कि नेहरू जी ने स्वदेशी को बदनाम करने का काम किया. उन्होंने कहा कि सरकार सब कुछ अपने हाथ में रखेगी. निजी क्षेत्र कुछ नहीं कर सकता है. हमारे उद्यमी कुछ नहीं कर सकते, हमारे पास पैसा नहीं है, हमारे पास तकनीक नहीं है. लेकिन इन चीजों को विकसित किया जा सकता है. 

  यह पूछे जाने पर कि क्या पीएम मोदी के स्वदेशी पर उदार नीति को देखते हुए मंच ने स्वदेशी की अपनी परिभाषा को हल्का कर किया है? अश्विनी महाजन ने कहा कि मोदी जी भी उसी स्कूल से आते हैं जिस स्कूल ऑफ थॉट से हम आते हैं. उन्होंने कहा कि हमें मिसकोट किया गया, मिसअंडरस्टैंड किया गया और नैरेटिव बनाया गया कि हम स्वदेशी वाले देश को अंधकार में रखना चाहते हैं. 

  'हमारा कहना है कि विदेशी पूंजी के आधार पर जो विकास करने की कोशिश हुई जिसमें पूंजी उनकी शर्तों पर आ रही थी, पेटेंट, ट्रेड, निवेश सब बाहर की कंपनियों की शर्तों पर हो रहा था. हम इसका विरोध कर रहे थे.' 

  स्वदेशी जागरण मंच ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भारत में हर तरह की विदेशी पूजीं को मेक इन इंडिया के लिए इस्तेमाल किए जाने पर अपनी राय दी. अश्विनी महाजन ने कहा कि सरकारें को अंतरराष्ट्रीय संबंधों को देखते हुए निर्णय करना होता है. कुछ देश को देखते हुए फैसला करना होता है. सरकारें तो सतत चलती रहती हैं. सरकार पार्टी की नहीं देश की सरकार होती है.

स्वदेशी जागरण मंच की विदेशी की परिभाषा

  उन्होंने स्वदेशी जागरण मंच की विदेशी की परिभाषा बताते हुए कहा कि जो कंपनी विदेश में बनी है वो विदेशी है, जिस कंपनी में 50 प्रतिशत से ज्यादा शेयर विदेश के हैं वो विदेशी हैं. अगर किसी भारतीय का भी पैसा विदेशी रूट से आया है तो वो विदेशी पैसा है. 

  स्वदेशी को प्रगतिशील विचार बताते हुए महाजन ने कहा कि ये बात सही है कि हमें प्रोद्योगिकी का विकास करने की जरूरत है. कई बार हम इस तकनीक को अपने लेवल पर विकसित कर सकते हैं, कई बार हमें विदेशी तकनीक की जरूरत पड़ती है, हम इसे भी सही मानते हैं लेकिन ये आवश्यक बुराई हो जाता है. उन्होंने कहा कि स्वदेशी एक प्रगतिशील विचार है. तो तकनीक जहां से मिले उसे लेना है लेकिन उस पर आश्रित नहीं होना है. 

क्या स्वदेशी जागरण मंच को सड़क पर उतरने की जरूरत है?

  जब स्वदेशी जागरण मंच से पूछा गया कि क्या मौजूदा माहौल में उन्हें स्वदेशी को पुश देने के लिए फिर से सड़क पर उतरने की जरूरत है. क्या मंच की आवाज कमजोर हुई है तो उन्होंने कहा कि क्या आपको ऐसा लगता है? अश्विनी महाजन ने कहा कि सरकार के सामने हम जितने भी विषय लेकर गए जैसे जेनेटिकली मोडिफाइड सीड्स… सरकार ने इसे माना और बिना हमारे विरोध के थोड़े ही माना. फिर जमीन अधिग्रहण बिल में सुधार की बात आई, हमनें विरोध किया तो वो ठंडे बस्ते में चला गया. फिर RCEP की बात आई, एअर इंडिया का विनिवेश विदेशी कंपनी को किया जा रहा था. हमने विरोध किया. फिर रिटेल ट्रेड में विदेशी निवेश का मसला था. सरकार ने इन सभी मुद्दों को गंभीरता से सुना है और इसका निराकरण भी किया है. कितने लोग हमारी वजह से निकाल दिए गए. अगर हमारी आवाज कमजोर हुई होती तो हमारे विचारों से प्रतिकूल व्यक्ति वहां पर आए फिर चले गए. हमारी वजह से ऐसे लोग निकाल दिए गए ऐसा नहीं है. 

क्या जरूरत है सड़क पर आंदोलन करूं

  हम सरकार में बैठे लोगों से निवेदन करते हैं कि हम ऐसा समझते हैं हमारी बात मान लेनी चाहिए. अब अगर हमारी बात आप टेबल पर बैठकर मानते हो मुझे क्या जरूरत है कि मैं सड़क पर आकर आंदोलन करूं. वो मेरी बात मान रहे हैं ऐसा नहीं है कुल मिलाकर ये एक आर्थिक विचार है, जिस आर्थिक विचार से हम सब लोग आते हैं. अगर थोड़ा बहुत इधर-उधर होता है तो बैठकर बात कर लेते हैं.

  इस बीच पिछली मन की बात में पीएम मोदी ने स्वदेशी की विचारधारा को फिर पुश किया है. उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में बहुत से त्योहारों की धूम होगी. इन त्योहारों में स्वदेशी की बात आपको कभी नहीं भूलनी है. उपहार वही जो भारत में बना हो, पहनावा वही जो भारत में बुना हो, सजावट वही जो भारत में बने सामान से हो. रोशनी वही जो भारत में बनी झालरों से हो. जीवन की हर जरूरत में सब कुछ स्वदेशी हो. गर्व से हमें स्वदेशी को लेकर आगे चलना है.

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