बुंदेलखंड की परंपरा में रंगे अरविंद पटेरिया, दिवारी नृत्य में मौनिया के संग लगाए ठुमके

छतरपुर 
 बुंदेलखंड का छतरपुर लोकनृत्य और लोक संगीत कलाओं को संजोए हुए है. इन्हीं में से एक बुंदेली मौनिया नृत्य है, जो दीपावली के बाद आयोजित होता है. यह नृत्य बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में दीपावली के दूसरे दिन मौन परमा को पुरुषों द्वारा किया जाता है. इसे मौनी परमा भी कहा जाता है.

ये बुंदेलखंड की सबसे प्राचीन नृत्य शैली है. इसे सेहरा और दिवारी नृत्य भी कहते हैं. इसमें किशोरों व युवकों द्वारा घेरा बनाकर मोर के पंखों को लेकर मनमोहक अंदाज में नृत्य किया जाता है.

दिवारी नृत्य में लाठीबाजी के करतब

दिवारी नृत्य लाठियां लड़ाकर भी किया जाता है. छतरपुर जिले के ग्रामीण अंचलों के लोगों की प्राचीन परंपरा आज भी जीवित है. छतरपुर जिले के खजुराहो स्थित आदिवर्त संग्रहालय में पारंपरिक उल्लास के साथ मौनिया उत्सव का आयोजन किया गया. यह आयोजन संग्रहालय के सामने पार्किंग स्थल पर हुआ. उत्सव में पारंपरिक संगीत, ढोलक और नगाड़ों की गूंज के बीच विभिन्न क्षेत्रों से आए मौनिया दलों ने दीवारी नृत्य की अद्भुत प्रस्तुतियां दी.

तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजा खजुराहो

दिवारी नृत्य में रंग-बिरंगे परिधानों में सजे कलाकारों ने लोक संस्कृति के अनोखे रंगों से सराबोर कर दिया. खजुराहो, छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, दमोह तथा आसपास के ग्रामीण अंचलों से आए मोनिया दलों ने जब मंच पर पारंपरिक दीवारी नृत्य प्रस्तुत किया तो लोग देखते रह गए. कलाकारों ने अपने तेज़ लयबद्ध कदमों, चटख रंगों के परिधानों और उत्साहपूर्ण दृश्य प्रस्तुत किया कि पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

दीवारी या मोनिया नृत्य बुंदेलखंड की कृषक, चरवाहा संस्कृति का प्रतीक लोकनृत्य है, जो दीपावली से लेकर पूर्णिमा तक निरंतर किया जाता है. इस नृत्य में युवा कलाकार बुंदेली दिवारी लोकगीतों की ताल पर समूह में नाचते हैं.

सामाजिक एकता का प्रतीक भी है मौनिया

गीतों में श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा, धर्म, नीति, परिश्रम और जीवन के उल्लास का वर्णन होता है. यह नृत्य अहीर समाज की प्राचीन परंपरा को आज भी जीवंत बनाए हुए है. बुंदेलखंड में बरेदी नृत्य के रूप में प्रसिद्ध यह कला दीपावली के 15 दिन तक गांवों में गूंजती रहती है.

इसमें नर्तक अत्यंत तीव्र गति से गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं, जबकि एक कलाकार गीत की शुरुआत करता है और बाकी दल सामूहिक स्वर में उसे आगे बढ़ाते हैं. यह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सामाजिक एकता, कृतज्ञता और धार्मिक आस्था का लोक उत्सव भी है, जिसे लोग आज भी जीवित रखे हुए हैं.

मौनिया नृत्य कैसे शुरू हुआ

खजुराहो में आयोजित हुए मोनिया नृत्य के दौरान राजनगर विधायक अरविंद पटेरिया भी मौनिया को देखकर अपने आपको नृत्य करने से नहीं रोक पाए. पहले विधायक ने नगड़िया बजाई, फिर बुंदेली परंपरा के अनुसार मौनिया कलाकरों के साथ नृत्य किया.

इस परंपरा के बारे में छतरपुर के पंडित अनंत शास्त्री महाराज बताते हैं "मोनिया नृत्य में बुंदेली लोक संस्कृति की झलक मिलती है. ऐसी मान्यता है जब भगवान श्री कृष्ण की सारी गायें कहीं चली गई तो भगवान श्रीकृष्ण दु:खी होकर मौन हो गए तो उनके दोस्तों ग्वालों ने उनकी गायें खोजी ओर गायें लेकर आये तब भगवान ने मौन तोड़ा."

मौनिया उत्सव लोक संस्कृति की आत्मा

मौनिया को लेकर दूसरी मान्यता यह भी है कि इंद्र के प्रकोप से गोकुलवासियों को बचाने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत अपनी उंगली पर उठा लिया. तब गोकुलवासी खुशी के मारे झूम उठे, तभी से यहां आयोजन मनाया जाता है. इस मौके पर विधायक अरविंद पटेरिया ने कहा "मौनिया उत्सव हमारी लोक संस्कृति की आत्मा है. इस आयोजन के माध्यम से न केवल परंपराएं संरक्षित होती हैं बल्कि नई पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से परिचय भी मिलता है." 

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