Saphala Ekadashi Vrat Katha: लुम्भक की कथा से समझें सफला एकादशी का महत्व, अनजाने व्रत से कैसे बदली किस्मत

युधिष्ठिर ने पूछा-पौष मास के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है ? उसकी क्या विधि है और उसमें किस देवता की पूजा की जाती है। भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने कहा कि पौष मास के कष्णपक्ष में सफला नाम की एकादशी होती है। उस दिन विधान से ही विधिपूर्वक भगवान नारायण की पूजा करनी चाहिए। सफला एकादशी को विशेषरूप से दीप-दान करने का विधान है। रात को वैष्णव पुरुषों के साथ जागरण करना चाहिए। जागरण करने वाले को एकादशी का पूर्ण फल मिलता है। अब सफला एकादशी व्रत की कथा सुनो।

चम्पावती नाम के राज्य में राजा माहिष्मत रहता था। महर्षि माहिष्मत के 5 पुत्र थे। उसके सभी बेटे अच्छे थे लेकिन सबसे बड़ा पापी था। राजा के पैसों को वह पाप कर्म में खर्च करता था। वह दूसरों को धोखा देता था|वह सदा दुराचार और ब्राह्मणों को सताता और निंदा करता था। बैष्णवों और देवताओंकी भी हमेशा निन्‍दा करता था। अपने बेटे का पाप करते देख राजा माहिष्मत ने उसका नाम लुम्भक रख दिया । फिर पिता और भाइयों ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए उसे राज्य से निका दिया। लुम्भक उस नगर से निकलकर वन में चला गया। वहीं रहकर उस पापी ने लूटपाट शुरू कर दी है। वह चोरी करके एक दिन जा रहा था , तो राजा के सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया। उसने अपने को राजा माहिष्मत का पुत्र बतलाया तो सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया। लेकिन उसे राज्य में नहीं आने दिया। वह पापी वन में रहने लगा और मास तथा वृक्षोंके फल खाकर जी रहा था। एक दिन वो पुराना पीपल के पेड़ के पास आराम कर रहा था। उस वनमें वह वृक्ष एक महान्‌ देवता माना जाता था।
 
एक दिन किसी पुण्य के प्रभाव से उसके द्वारा एकादशी व्रत का पालन हो गया। पौष मास में कृष्णपक्ष की दशमी के दिन॑ लुम्भक ने वृक्षों के फल खाए और रातभर सर्दी का कष्ट भोगा। उस समय न तो उसे नींद आई ओर न आराम ही मिला। सूर्योदय होने पर भी उस पापीको होश नहीं हुआ। सफला एकादशी के दिन भी लुम्भक बेहोश पड़ा रहा । वह भूखसे दुर्बल हो रहा था। तब उसने वृक्ष की जड़ में बहुत-से फल निवेदन किया कि इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान विष्णु संतुष्ट हों ।

इस प्रकार उससे अनायास ही ब्र तका पालन कर लिया। उस समय सहसा आकाशवाणी हुई कि एकादशीके प्रसाद से राज्य ओर पुत्र प्राप्त करोगे। तब से वो भगवान्‌ विष्णु के भजन में लग गया । उस समय भगवान्‌ श्रीकृष्ण की कृपासे उसके मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। इस प्रकार जो सफला एकादशीका उत्तम त्रत करता है, वह इस लोकमें सुख भोगकर मरने के पश्चात्‌ मोक्ष को प्राप्त होता है ।
 

 

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