नई दिल्ली.
देश में डिजिटल अरेस्ट की बढ़ती घटनाओं पर रोक लगाने के लिए सरकार ने कारगर पैंतरा अपनाया है. गृह मंत्रालय ने डिजिटल अरेस्ट की समस्या के समाधान के लिए उच्च स्तरीय समिति बनाई थी. इस समिति ने ‘किल स्विच’ जैसे विकल्प सुझाए हैं, जहां एक बटन दबाते ही स्कैमर्स के मंसूबों पर ताला लगाया जा सकता है. इतना ही नहीं, अगर डिजिटल अरेस्ट के दौरान कोई वित्तीय नुकसान हुआ है तो उसकी भी भरपाई करने का तरीका समिति ने सुझाया है.
गृह मंत्रालय की उच्च स्तरीय समिति ने ‘किल स्विच’ जैसे विकल्पों का सुझाव दिया है. इसका मतलब है कि अगर किसी को अपने साथ डिजिटल फर्जीवाड़े की आशंका है तो वह इस किल स्विच बटन के जरिये अपने सभी फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन तत्काल रोक सकता है. इससे स्कैमर्स को खाते से पैसे निकालने या धोखाधड़ी करने का मौका ही नहीं मिलेगा और बैंक की तरफ से यूजर के सभी खाते कुछ समय के लिए फ्रीज कर दिए जाएंगे.
नुकसान की भरपाई के लिए भी व्यवस्था
बैंकिंग सिस्टम में धोखाधड़ी से जुड़े नुकसान को कवर करने के लिए एक बीमा व्यवस्था भी जल्द आ सकती है, क्योंकि बढ़ते डिजिटल युग के घोटाले वाणिज्यिक बैंकों को अपने जोखिम प्रबंधन ढांचे पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं. इसका मकसद ग्राहकों और पूरे वित्तीय सिस्टम की बेहतर सुरक्षा करना है. समिति ने किल स्विच के साथ ऐसे बीमा उत्पाद लाने का भी सुझाव दिया है.
कैसे काम करेगी इमरजेंसी बटन
पिछले साल दिसंबर में किल स्विच के लिए एक अंतर विभागीय समिति बनाई गई थी. इसमें अन्य विकल्पों के साथ-साथ एक इमरजेंसी बटन की व्यवस्था की जा सकती है, जिसे लेंडर्स के पेमेंट ऐप्स में जोड़ा जाएगा. जब भी कोई यूजर महसूस करे कि वह धोखाधड़ी का शिकार हो रहा है, तो वह इस बटन को दबाकर अपने सभी बैंकिंग ऑपरेशन्स तुरंत फ्रीज कर सकता है. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि विचार यह है कि क्या यूजर के पेमेंट ऐप, जैसे UPI ऐप या बैंक ऐप में किल स्विच हो सकता है और जैसे ही यूजर वह बटन दबाए, कोई भी बैंक ट्रांजेक्शन संभव न हो सके.
धोखाधड़ी के बाद पैसा वापस दिलाने की कोशिश
समिति यह भी देख रही है कि क्या ऐसे लेन-देन की पहचान करना संभव है जो धोखाधड़ी के शिकार हो सकते हैं. साथ ही क्या ऐसा कोई तरीका है जिससे धोखाधड़ी के बाद उसे तुरंत कई म्यूल खातों में बांटा न जा सके, ताकि पैसों को वापस दिलाने की कोशिश की जा सके. डिजिटल अरेस्ट घोटालों में ठग पुलिस या अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारियों के रूप में वीडियो कॉल के जरिए लोगों से संपर्क करते हैं और दावा करते हैं कि वे गंभीर अपराधों की जांच के दायरे में हैं. वे अपनी विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए लीक हुए निजी डेटा का इस्तेमाल करते हैं. अक्सर डर और जल्दबाजी का माहौल बनाते हैं और फर्जी आईडी व गिरफ्तारी वारंट दिखाकर पीड़ितों से बड़ी रकम ऐंठ लेते हैं.
