दिल्ली की ओर कदम? राज्यसभा से राजेन्द्र राठौड़ और सतीश पूनिया की एंट्री की अटकलें

जयपुर.

राजस्थान की राजनीति में इस वक्त राजेंद्र राठौड़ और सतीश पूनिया के भविष्य को लेकर जो अटकलें हैं, उन्हें जून 2026 में होने वाले राज्यसभा चुनाव एक तार्किक अंजाम दे सकते हैं। इस पूरी राजनीतिक बिसात को अगर एक मुकम्मल रिपोर्ट के रूप में देखें, तो तस्वीर काफी साफ नजर आती है।

​राजस्थान बीजेपी में इन दिनों जो सन्नाटा दिख रहा है, वह असल में 'तूफान से पहले की शांति' है। राजेंद्र राठौड़ और सतीश पूनिया जैसे कद्दावर नेताओं का फिलहाल पदविहीन होना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी आलाकमान इन दोनों चेहरों को किसी जल्दबाजी में नहीं, बल्कि सही समय पर सही जगह फिट करने के 'होल्डिंग पैटर्न' पर रखे हुए है।

​इस पूरी बिसात में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ जून 2026 में आने वाला है, जब राजस्थान से राज्यसभा की तीन सीटें (नीरज डांगी-कांग्रेस, राजेंद्र गहलोत-बीजेपी और रवनीत सिंह बिट्टू-बीजेपी) खाली हो रही हैं। विधानसभा में बीजेपी के पास 115 से ज्यादा विधायकों का मजबूत बहुमत है, जिसके चलते इन तीन में से दो सीटों पर बीजेपी की जीत पूरी तरह सुनिश्चित है। लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा यह भी है कि पार्टी अपनी घेराबंदी इस तरह कर सकती है कि तीसरी सीट पर भी कब्जा कर लिया जाए, जो कोई बड़ी हैरानी की बात नहीं होगी।

​यही वह मौका है जब राजेंद्र राठौड़ की 'दिल्ली रवानगी' को एक औपचारिक मुहर मिल सकती है। राठौड़ का विशाल संसदीय अनुभव और सदन की बारीकियों पर उनकी पकड़ उन्हें राज्यसभा के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार बनाती है। उन्हें राज्यसभा भेजकर पार्टी न केवल उनके कद का सम्मान करेगी, बल्कि दिल्ली में एक प्रखर वक्ता के रूप में उनका उपयोग भी कर पाएगी। इससे राज्य की आंतरिक राजनीति में भी एक संतुलन बना रहेगा।

​दूसरी ओर, सतीश पूनिया का भविष्य भी इसी बड़े बदलाव से जुड़ा है। हालांकि मदन राठौड़ अभी प्रदेशाध्यक्ष के रूप में मुख्यमंत्री के साथ बेहतर तालमेल बिठा रहे हैं, लेकिन पूनिया की संगठनात्मक क्षमता को दिल्ली नजरअंदाज नहीं कर सकती। पार्टी उन्हें राजस्थान के अध्यक्ष की कुर्सी पर दोबारा बैठाने के बजाय राष्ट्रीय महासचिव या किसी बड़े राज्य के प्रभारी जैसी 'नेशनल रोल' वाली भूमिका में देख रही है।

 जून 2026 के समीकरणों में अगर पार्टी तीसरी सीट पर भी दांव खेलती है, तो पूनिया के लिए भी उच्च सदन के दरवाजे खुल सकते हैं, जिससे उन्हें एक 'राष्ट्रीय जाट चेहरे' के रूप में स्थापित किया जा सके। ​जमीन पर कार्यकर्ताओं के बीच संदेश साफ है कि बीजेपी अपने इन दोनों दिग्गजों को 'आउट' नहीं कर रही, बल्कि 2029 की बड़ी जंग के लिए तैयार कर रही है। जून 2026 का राज्यसभा चुनाव वह निर्णायक समय होगा जब इन दोनों नेताओं की 'होल्डिंग' खत्म होगी और वे एक नई और बड़ी भूमिका में नजर आएंगे। तब तक की यह खामोशी केवल उस रणनीति का हिस्सा है जिसे बिना किसी शोर-शराबे और बिना किसी 'ट्रेलर' के सीधे नामांकन के साथ दुनिया के सामने लाया जाएगा।

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