बिना बिजली ठंडक का कमाल: मालवा-निमाड़ के मटकों की क्यों हो रही है इतनी चर्चा?

नई दिल्ली
भीषण गर्मी की आहट होते ही घरों में फ्रिज से ज्यादा 'देसी फ्रिज' यानी मिट्टी के मटकों की मांग बढ़ गई है। आपको जानकर हैरानी होगी कि मध्य प्रदेश, खासकर मालवा और निमाड़ क्षेत्र में बने मटके आज सिर्फ प्रदेश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी गूंज दक्षिण भारत तक पहुंच चुकी है। अपनी खास बनावट और प्राकृतिक शीतलता के कारण एमपी के ये मटके राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की पहली पसंद बन गए हैं।

क्यों खास हैं मालवा-निमाड़ के मटके?
मध्य प्रदेश के इन मटकों को 'देसी फ्रिज' की संज्ञा दी जाती है। इनकी लोकप्रियता के पीछे छिपे हैं ये चार मुख्य कारण:

विशेषता     विवरण
विशेष काली मिट्टी: प्राकृतिक खनिजों से भरपूर काली मिट्टी का उपयोग किया जाता है, जो पानी को शुद्ध रखती है।
कठोर तपस्या:     इन्हें बनाने में तीन दिन की कड़ी मेहनत लगती है और भट्टी में तब तक तपाया जाता है जब तक ये पूरी तरह लाल और मजबूत न हो जाएं।
बैक्टीरिया मुक्त: मिट्टी की प्राकृतिक संरचना के कारण इसमें हानिकारक बैक्टीरिया नहीं पनपते, जिससे पानी स्वास्थ्य के लिए अमृत समान होता है।
कुदरती कूलिंग: ये मटके भीषण गर्मी में भी पानी को फ्रिज जैसा ठंडा रखने की क्षमता रखते हैं।

सात समंदर तो नहीं, पर सात राज्यों पार है डिमांड
 मालवा के कारीगरों की बेहतरीन नक्काशी और गुणवत्ता का ही परिणाम है कि यहां के मटके अब दक्षिण भारत के राज्यों में भी सप्लाई हो रहे हैं। गुजरात की विशेष मिट्टी से बने आकर्षक बर्तन भी अब बाजार में कड़ी टक्कर दे रहे हैं, लेकिन पारंपरिक काली मिट्टी के मटकों का दबदबा आज भी बरकरार है।
 
तीन दिन की मेहनत से तैयार होता है एक 'फ्रिज'
एक मटके को आकार देने से लेकर उसे बाजार तक पहुंचाने की प्रक्रिया बेहद जटिल है। कारीगरों के अनुसार, मिट्टी को गूंथने, चाक पर चढ़ाने और फिर सुखाने के बाद आग में तपाने की प्रक्रिया में लगभग 72 घंटे का समय लगता है। यही 'तपस्या' मटके को इतनी मजबूती देती है कि वह सालों-साल चलता है।
 
स्वास्थ्य और स्वाद का संगम
डॉक्टरों का भी मानना है कि मिट्टी के घड़े का पानी पीने से शरीर का मेटाबॉलिज्म सुधरता है और गले से जुड़ी बीमारियां नहीं होतीं। फ्रिज के प्लास्टिक और गैस के विपरीत, मिट्टी के मटके पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) होते हैं।

इंदौर, उज्जैन, खरगोन और खंडवा के बाजारों में मटकों की दुकानें सज चुकी हैं। इस साल डिजाइनदार और स्टैंड वाले मटकों की मांग सबसे ज्यादा देखी जा रही है।

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