‘साज’ और मंगेशकर बहनों की कहानी: सच या महज संयोग?

1998 में सई परांजपे ने एक संगीतमय फिल्म 'साज' बनाई। यह कहानी दो बहनों मानसी और बंसी की है। उनके माता-पिता की मौत के बाद दोनों मुंबई आ जाती हैं। कई मुश्किलों के बाद मानसी और बंसी संगीत की दुनिया में बहुत मशहूर गायिकाएं बन जाती हैं। लेकिन साथ ही वे एक-दूसरे की बड़ी प्रतिद्वंद्वी भी बन जाती हैं। क्या फिल्म 'साज' की कहानी लता मंगेशकर और आशा भोसले की जिंदगी से प्रेरित थी?

क्या 'साज' की कहानी लता और आशा की असली कहानी से है प्रेरित
लता और आशा भी 1942 में अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर की अचानक मौत के बाद मुंबई आई थीं। पिता एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और रंगमंच कलाकार थे। उनके जाने के बाद परिवार के पास पैसों का कोई सहारा नहीं बचा। उस समय आशा सिर्फ नौ साल की थीं। बड़ी बहन लता और छोटी आशा ने परिवार चलाने के लिए गाना शुरू कर दिया।

'साज' से मिलती है दोनों बहनों की असली कहानी?
जैसे फिल्म 'साज' में मानसी और बंसी को मजबूरी में गाना पड़ा, वैसे ही मंगेशकर बहनों को भी अपनी असल जिंदगी में राोजाना खर्चों के लिए गाना पड़ा। लेकिन उनकी प्रतिभा ने उन्हें बॉलीवुड की सबसे बड़ी गायिकाएं बना दिया। साठ के दशक की शुरुआत तक लता और आशा ही रेडियो और फिल्मों में सबसे ज्यादा सुनाई देती थीं।

कल्पना की कहानी है फिल्म 'साज'
अरुणा ईरानी ने फिल्म 'साज' में मानसी का रोल निभाया है। वे बहुत सफल गायिका बन जाती हैं। शबाना आजमी बंसी का रोल करती हैं। बंसी भी गाना चाहती है, लेकिन मानसी कहती है कि उसे शादी करनी चाहिए और जिंदगी में आगे बढ़ना चाहिए।

फिर क्या बंसी की शादी हो जाती है। फिर एक संगीतकार इंद्रनील उसकी आवाज को पहचानता है और उसे मौका देता है। बंसी सफल हो जाती है। लेकिन मानसी को यह पसंद नहीं आता। खासकर तब जब एक युवा संगीतकार हिमन देसाई बंसी से प्यार करने लगता है।

सई परांजपे का इनकार
फिल्म निर्माता सई परांजपे ने कभी आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा कि फिल्म 'साज' लता और आशा के ऊपर आधारित है। फिल्म रिलीज होने के बाद से यह बहस काफी समय तक चर्चा में रही थी। 'साज' दो भावनाओं को दिखाती है, जिसमें दो बहनों के बीच गहरा प्यार और देखभाल।

लता मंगेशकर ने क्या कहा?
नसरीन मुन्नी कबीर की किताब में लता जी ने कहा, 'यह गलत है कि प्रतिद्वंद्विता ने हमारे रिश्ते को खराब कर दिया। हम बहनें हैं और पड़ोस में रहती हैं। हम बात करती हैं, साथ खाना खाती हैं। खुशी-गम में एक-दूसरे के साथ हैं।' उन्होंने आशा की तारीफ करते हुए कहा, 'जितने तरह के गाने आशा गा सकती हैं, कोई और गायक उनकी बराबरी नहीं कर सकता।'
    
कब आशा भोसले का मिली पहचान
आशा की बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें लता की छाया से बाहर निकाला। साठ के दशक में ओ.पी. नैयर के साथ उनके गाने जैसे 'आओ हुजूर तुमको' और 'कजरा मोहब्बत वाला' ने उन्हें अलग पहचान दी। फिर साठ के बीच में राहुल देव बर्मन (पंचम) आए। उनके संगीत में पश्चिमी ताल थी। आशा की आवाज उससे बहुत अच्छे से मिली। 'आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा', 'पिया तू अब तो आजा', 'चुरा लिया है तुमने' और 'दम मारो दम' जैसे गाने हिट हो गए।

1981 में फिल्म 'उमराव जान' आई। आशा ने इसमें शाहरयार के गीतों पर खय्याम का संगीत गाया। 'दिल चीज क्या है' गाने के लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इस फिल्म ने दुनिया को आशा की नई छवि दिखाई।  ठीक उसी तरह, 1982 में 'डिस्को 82' में लता जी ने भी डिस्को स्टाइल गाना गाया। दोनों बहनें हमेशा यह याद दिलाती हैं कि संगीत उनके जीवन का सबसे बड़ा प्यार है। बाकी सब सिर्फ कहानियां हैं।

More From Author

3.40% पर पहुंची महंगाई: जेब पर असर, लोन की EMI बढ़ने के संकेत

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

RO No. 13379/55

city24x7.news founded in 2021 is India’s leading Hindi News Portal with the aim of reaching millions of Indians in India and significantly worldwide Indian Diaspora who are eager to stay in touch with India based news and stories in Hindi because of the varied contents presented in an eye pleasing design format.