बांग्लादेश की स्थिति डंवाडोल, वेतन देने के पैसे नहीं… चुनाव भी लटक गया, यूनुस बोले- युद्ध जैसी स्थिति से गुजर रहा है देश!

नई दिल्ली:

बांग्लादेश एक बार फिर से उबल रहा है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार अस्थिरता के बवंडर की ओर बढ़ रही है। उनकी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। मुल्क में तनाव का आलम हो। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार विरोध प्रदर्शन में सरकारी कर्मचारी भी शामिल हो चुके हैं। लेकिन, मोहम्मद यूनुस अपनी नाकामियों को बिना नाम लिए भारत पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं। जो भी हो रहा है, उसके लिए 'विदेशी साजिश' को जिम्मेदार बता रहे हैं। जबकि, हकीकत ये है कि उन्हें सिर्फ चुनाव करवाने तक के लिए सरकार चलाने भर की जिम्मेदारी मिली है। लेकिन, वह चुनाव छोड़कर बाकी हर तरह के हथकंडे अपनाने में लगे हैं। बांग्लादेश की विदेश नीति, संविधान,उसका इतिहास और यहां तक कि उसके जन्म की मूल अवधारणा तक को नकारने के दांव लगा रहे हैं। यही वजह है कि आज बांग्लादेशी फौज भी उनके विरोध में खड़ी हुई है। मोहम्मद यूनुस जब से बांग्लादेश की सत्ता में आए हैं, भारत के चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों के साथ नाचने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन, उन्हें चीन के दम पर भारत के जिस चिकन नेक कॉरिडोर (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) को दबा पाने की गलतफहमी हो गई है, उन्हें शायद अंदाजा नहीं है कि भारत उनके साथ क्या कर सकता है।
'बुराई को खत्म करने के लिए शक्ति का इस्तेमाल'

मोहम्मद यूनुस शायद यह भूल चुके हैं कि बांग्लादेश की पैदाइश ही भारतीय विदेश नीति की देन है। जो अपने जन्मदाता की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने लगेगा तो भारत को भी देर-सबेर अपने विकल्प तलाशने पड़ेंगे। अगर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत के एक हालिया इंटरव्यू को देखें तो नागपुर से भी मोदी सरकार को उसी तरफ इशारा किया गया है। संघ के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर और पांचजन्य में रविवार को छपे उनके एक इंटरव्यू के मुताबिक उन्होंने भारत के पड़ोस में 'बुराई को खत्म' करने के लिए शक्ति का इस्तेमाल करने की बात कही है। उनके अनुसार कुछ देशों में हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा है। ऐसे में हिंदू समाज की ताकत का इस्तेमाल उनकी रक्षा के लिए किया जाना चाहिए। दरअसल, पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के मुद्दे पर अपने विचार रखते हुए संघ के सर संघचालक ने कहा, 'हमारी ताकत अच्छे लोगों की रक्षा और बुरे लोगों को नष्ट करने के लिए होनी चाहिए। जब कोई और चारा नहीं होता, तो बुराई को जबरदस्ती खत्म करना पड़ता है। इसलिए, हमारे पास शक्तिशाली बनने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि हम अपनी सीमाओं पर बुरी ताकतों की बुराई देख रहे हैं।'
दोनों गर्दन दबोची तो कहीं के नहीं रहेंगे यूनुस

शायद जो बात भागवत ने खुलकर नहीं कहा, उसे असम के मुख्यमंत्री और पूर्वोत्तर के दिग्गज बीजेपी नेता हिमंत बिस्वा सरमा ने अधिक विस्तार से बताने की कोशिश की है। कुछ दिन पहले भी उन्होंने मोहम्मद यूनुस के भारत के चिकन नेक कॉरिडोर पर उनकी गलत नजर पर बांग्लादेश के पास भी दो चिकन नेक होने की बात कही थी। लेकिन, तब उन्होंने बांग्लादेश के दूसरे चिकन नेक को साफ तौर पर स्पष्ट नहीं किया था। लेकिन, नवभारत टाइम्स डॉट कॉम ने तब उनकी बातों के आधार पर जो संभावना जताई थी, सरमा ने अब उसी पर मुहर लगाई है। उन्होंने रविवार को एक X पोस्ट डाला है। उन्होंने लिखा है कि 'जिन्हें भारत को चिकन नेक कॉरिडोर पर धमकाने की आदत पड़ चुकी है, उन्हें तीन तथ्यों को ध्यान से नोट कर लेना चाहिए।'

पहला, बांग्लादेश के पास अपने दो 'चिकन नेक' हैं। दोनों कहीं ज्यादा असुरक्षित हैं।
दूसरा, पहला है 80 किमी लंबा उत्तर बांग्लादेश कॉरिडोर। यह दक्षिण दिनाजपुर से दक्षिण पश्चिम गारो हिल्स (मेघालय) तक जाता है। अगर यहां कोई रुकावट आती है, तो पूरा रंगपुर डिवीजन बांग्लादेश से कट सकता है। मतलब, रंगपुर का बाकी बांग्लादेश से संपर्क टूट जाएगा।
तीसरा,यह है 28 किमी का चटगांव कॉरिडोर। यह साउथ त्रिपुरा से बंगाल की खाड़ी तक जाता है। यह कॉरिडोर भारत के 'चिकन नेक' से भी छोटा है। पर यह बांग्लादेश की आर्थिक राजधानी और राजनीतिक राजधानी को जोड़ने वाला एकमात्र रास्ता है।

बांग्लादेश के साथ क्या कर सकता है भारत

बांग्लादेश के मौजूदा हालात, मोहम्मद यूनुस की ओर से सत्ता में बने रहने के लिए चलाए जा रहे खौफनाक एजेंडा और भारत में अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए सामने आ रहे विचारों को अगर एक संदर्भ में देखें तो इसके 5 पहलू हैं, जो भारत के लिए जवाबी विकल्प हो सकते हैं।

रंगपुर में चिकन नेक कॉरिडोर काटने का मतलब

1. रंगपुर में चिकन नेक कॉरिडोर काटने का मतलब है कि भारत का सिलीगुड़ी कॉरिडोर बहुत ही विशाल हो जाएगा। मतलब जो अभी लगभग 22 किलोमीटर की चौड़ी पट्टी है और जिसपर यूनुस और भारत के दुश्मनों की नजर लगी हुई वह अप्रत्याशित रूप से चौड़ी हो सकती है। मतलब, पूर्वोत्तर की बहुत बड़ी समस्या ही एक झटके में खत्म हो सकती है।
चटगांव कटा तो पूर्वोत्तर को मिलेगा अपना समु्द्र

2. अगर हम त्रिपुरा के कुछ किलोमीटर तक नीच चले लाएं (चटगांव कॉरिडोर) तो पूरे पूर्वोत्तर को जोड़ने वाला अपना समुद्र हो जाएगा। यह सामरिक और आर्थिक रूप से बहुत ही फायदे का सौदा साबित हो सकता है। भविष्य में मोहम्मद यूनुस की तरह के विचार वाले बांग्लादेश के किसी अन्य शासक की भी आए दिन की नौटंकी खत्म की जा सकती है।

रोहिंग्या समस्या से मिल सकता है स्थायी छुटकारा

3. बांग्लादेश के चटगांव से नीचे म्यांमार का रखाइन इलाका है। यहीं रोहिंग्या समस्या है। मतलब बांग्लादेश से चटगांव के कटते ही रोहिंग्या समस्या खत्म हो सकती है। भारत इस इलाके को रोहिंग्या मुसलमानों को सौंप सकता है और भारत में जो रोहिंग्या घुसपैठिए आ गए हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं, उन्हें यहां पर स्थायी रूप से भेजा जा सकता है। यह उनका मूल इलाका है, जहां जाकर बसना उनके लिए भी आसान हो सकता है।

पूर्वोत्तर के उग्रवादी समस्या का भी हल संभव

4.म्यांमार के रखाइन से ही थोड़ा उत्तर-पूर्व में उसका चिन इलाका है। यह पहाड़ी क्षेत्र क्रिश्चियन बहुल इलाका है, जो म्यांमार से अलग होना चाहता है….यह पहले से ही मिजोरम में मिलाए जाने की मांग कर रहे हैं। अगर भारत ने इस पूरे इलाके पर दबदबा कायम कर लिया तो पूर्वोत्तर की कई उग्रवादी समस्याओं का हल निकालना भी आसान हो सकता है। क्योंकि, विदेश की यह धरती अभी उग्रवादियों के लिए नर्सरी का काम करती है।

बांग्लादेश को दोबारा जन्म देने में सक्षम है भारत

5. 1971 में भारत, बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र मुल्क के रूप में जन्म दे चुका है। इसलिए, ऊपर जो चार विकल्प दिए गए हैं, वह इसके लिए असंभव भी नहीं है। क्योंकि,मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में जिस तरह से बांग्लादेश फिर से पाकिस्तान की ओर झुक गया है और वहां पर ISI की गतिविधियां बढ़ गई हैं, भारत के लिए इस वास्तविकता को ज्यादा लंबे समय तक टालना आसान नहीं है।

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