ईरान दशकों बाद पहली बार इस युद्ध में अपने पारंपरिक सहयोगियों के बिना अकेला लड़ रहा है?, कोई नहीं दे रहा साथ

तेहरान
इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी जंग ने क्षेत्रीय और वैश्विक तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है। 13 जून को इजरायल ने 'ऑपरेशन राइजिंग लॉयन' के तहत ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। इसके बाद दोनों देशों के बीच मिसाइल हमलों का सिलसिला जारी है। इस बीच, एक सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या ईरान दशकों बाद पहली बार इस युद्ध में अपने पारंपरिक सहयोगियों के बिना अकेला लड़ रहा है?

दरअसल पिछले चार दशकों से, ईरान ने मध्य पूर्व में अपनी शक्ति का विस्तार करने और अमेरिका व इजरायल के प्रभाव को कम करने के लिए एक "प्रतिरोध की धुरी" यानी एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस के रूप में प्रॉक्सी ताकतों का गठन किया है। यह गठबंधन अभी तक ईरान को सीधे टकराव से बचाते रहे हैं और खुद ही इजरायल और अमेरिकी हितों पर हमले करते रहे हैं। लेकिन अब, जब इजरायल ने ईरान की धरती पर अभूतपूर्व हमले किए हैं, तो ये सहयोगी असामान्य रूप से चुप्पी साधे हुए हैं। यह सवाल उठता है कि क्या ईरान, दशकों बाद पहली बार, अकेला लड़ रहा है? आइए, समझते हैं।

कहां गायब है कि ईरान के "प्रतिरोध की धुरी"?
ईरान ने लेबनान में हिजबुल्लाह, फिलिस्तीन में हमास, यमन में हूती विद्रोहियों और इराक में शिया मिलिशिया जैसे संगठनों को हथियार, ट्रेनिंग और आर्थिक सहायता प्रदान की है। ये समूह ईरान के लिए क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन का माध्यम रहे हैं। लेकिन वर्तमान में ये संगठन कमजोर, आंतरिक रूप से विभाजित और अपनी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

इराक: इराक में ईरान समर्थित शिया मिलिशिया ने लंबे समय तक अमेरिकी सैनिकों पर हमले किए और बगदाद में ईरान के हितों की रक्षा की। लेकिन हाल के वर्षों में, ये समूह आंतरिक संघर्ष और स्थानीय विरोध का सामना कर रहे हैं। इजरायल के हमलों के बाद, इन मिलिशियाओं ने कोई बड़ा जवाबी कदम नहीं उठाया है।

लेबनान: यहां हिजबुल्लाह ईरान का सबसे मजबूत सहयोगी है। लेकिन हिजबुल्लाह भी इजरायल के हाथों भारी नुकसान उठा चुका है। 2023 से इजरायली सेना लगातार हिजबुल्लाह को निशाना बना रही है। लेबनान में संघर्ष में इसके वरिष्ठ कमांडरों की हत्या और संसाधनों की कमी ने इसे कमजोर किया है।

फिलिस्तीन: हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर अभूतपूर्व हमले किए थे। इस हमले के बाद से हमास गाजा में इजरायल के सैन्य अभियानों का सामना कर रहा है और अपनी सैन्य क्षमता खो चुका है। वहीं इजरायल ने लगभग पूरी गाजा पट्टी को तबाह कर दिया है।

यमन: हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में शिपिंग पर हमले करके वैश्विक ध्यान खींचा था, लेकिन इजरायल और अमेरिका के हवाई हमलों ने उनकी क्षमता को सीमित कर दिया है।

रूस और अन्य सहयोगी: रूस, जो पहले ईरान का रणनीतिक साझेदार रहा है, वह यूक्रेन युद्ध और अपनी क्षेत्रीय रणनीति के कारण इस संघर्ष में तटस्थ दिखाई देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे युद्ध की स्थिति में रूस को नुकसान हो सकता है, क्योंकि ईरान में सरकार बदलने से उसका एक महत्वपूर्ण सहयोगी खत्म हो सकता है।
इजरायल-ईरान संघर्ष का वर्तमान परिदृश्य कैसा है?

इजरायल ने हाल ही में ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले किए, जिसमें कई वरिष्ठ सैन्य कमांडर और परमाणु वैज्ञानिक मारे गए। ईरान ने जवाब में इजरायल पर लगभग 400 मिसाइलें दागीं, जिनमें से 40 ने हवाई रक्षा को भेदकर 24 नागरिकों की जान ले ली। ईरान ने अपनी हवाई रक्षा को सक्रिय किया, ड्रोन को मार गिराया और 18 संदिग्ध इजरायली जासूसों को गिरफ्तार किया। साथ ही, सुरक्षा कारणों से अस्थायी इंटरनेट प्रतिबंध भी लगाए गए। लेकिन इसके बावजूद, ईरान के प्रॉक्सी सहयोगी खामोश हैं, जिसने तेहरान की क्षेत्रीय रणनीति पर सवाल उठाए हैं।
 

अमेरिका और ट्रंप की भूमिका

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को "बिना शर्त आत्मसमर्पण" करने की मांग की है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका इस युद्ध में सीधे शामिल होगा या नहीं। ट्रंप ने कहा, "मैं यह नहीं कह सकता कि अमेरिका ईरान पर हमला करेगा या नहीं।" इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया कि वे ईरान के परमाणु और मिसाइल ढांचे को "चरणबद्ध तरीके से" नष्ट कर रहे हैं। ट्रंप ने ईरान के फोर्डो परमाणु संवर्धन केंद्र को नष्ट करने की संभावना पर विचार किया है, लेकिन कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया।

क्षेत्रीय और वैश्विक प्रतिक्रियाएं क्या हैं?
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे खाड़ी देशों ने इजरायल के साथ सहयोग की इच्छा जताई है, जबकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को क्षेत्र के लिए खतरा बताया है। वैश्विक स्तर पर, रूस, चीन और उत्तर कोरिया के साथ ईरान का गठबंधन है जिसे पश्चिमी देश "अराजकता की चौकड़ी" या "CRINK धुरी" कहते हैं। यह संगठन भी इस संकट में सक्रिय भूमिका नहीं निभा रहा। रूस ने मध्यस्थता की पेशकश की है, लेकिन इसका प्रभाव सीमित दिख रहा है।

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