जिन्ना का नाम हटाने की मांग पर गरमाई सियासत, NCERT चैप्टर पर ओवैसी का विरोध

नई दिल्ली 
एनसीईआरटी के नए मॉड्यूल में बंटवारे के लिए कांग्रेस और जिन्ना को जिम्मेदार ठहराया गया तो इसको लेकर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस नेताओं का कहना है जिन्ना को समझने की भूल हुई और इसलिए देश को बंटवारे की विभीषिका का सामना करना पड़ा। हालांकि एनसीईआरटी का यह मॉड्यूल रेग्युलर सिलेबस नहीं है। इस चैप्टर में बताया गया है कि बंटवारे की एक वजह कांग्रेस भी थी।

इसके अलावा मोहम्मद अली जिन्ना को बंटवारे का असली जिम्मेदार बताया गया है। इसपर एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी भड़क गए। उन्होंने कहा कि आखिर बंटवारे के लिए किसी विशेष वर्ग को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। मॉड्यूल में कहा गया है कि बंटवारे के लिए प्रमुख तीन कारण जिम्मेदार थे। पहले थे जिन्ना, जो कि मुस्लिमों के लिए अलग देश की मांग कर रहे थे। दूसरी थी कांग्रेस जिसने जिन्ना की मांग को स्वीकार किया और तीसरा माउंटबेटन जिन्होंने इसे अमली जामा पहना दिया।

कांग्रेस और विपक्ष का कहना है कि चैप्टर में पक्षतापूर्ण तरीके से जानकारी दी गई है। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि ऐसी किताब को आग लगा देनी चाहिए। उन्होंने कहा, सच तो यह है कि मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा की वजह से देश का विभाजन हुआ था। वहीं बीजेपी के प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि देश का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी और जिन्ना की सोच में कोई अंतर नहीं है।

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, एनसीईआरटी को अगर बंटवारे के बारे में पढ़ाना ही है तो शम्सुल इस्लाम की मुस्लिम अगेंस्ट पार्टीशन किताब सिलेबस में शामिल की जानी चाहिए। इसी तरह झूठ को फैलने से रोका जा सकता है। ओवैसी ने कहा कि बंटवारे के लिए आखिर मुसलमान कैसे जिम्मेदार हो सकते हैं? जो लोग भाग गए वे तो भाग ही गए और जो वफादार थे, वे ठहर गए।

एनसीईआरटी के सेकंडरी स्टेज मॉड्यूल में कहा गया है कि भारत के नेताओं के पास उस समय प्रशासन का अनुभव नहीं था। उस वक्त सेना, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की समझ भी नहीं थी। ऐसे में किसी को अंदाजा ही नहीं था कि इस फैसले से कितनी बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है। इसमें कहा गया कि 1.5 करोड़ लोगों का विस्थापन, हिंसा और कत्लेआम एक विभीषिका थी जो कि आज भी देश के लिए जख्म है।

मॉड्यूल्स ने कहा कि देश आज भी बंटवारे के परिणामों में भुगत रहा है। कश्मीर की सांप्रदायिक राजनीति और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद इसी फैसले की उपज है। इसमें यह भी कहा गया कि कश्मीर पर कब्जा करने के लिए पाकिस्तान ने तीन बार युद्ध का रास्ता चुना लेकिन उसके हाथ आतंकवाद के अलावा कुछ नहीं लगा।

 

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