तनाव का चक्र: जब चिंता बढ़ाए चिंता

तनाव को लेकर एक और तनाव। जीवन में अनेक समस्याएं हैं। समस्याएं पीड़ित करती हैं। लोग तनाव में आते हैं लेकिन भारत के लोग तनाव को लेकर प्राय चिकित्सकों के पास नहीं जाते। दुनिया के तमाम देशों में मनोविश्लेषकों के पास लम्बी कतारे हैं। संपन्न लोग निजी मनोचिकित्सक भी रखते हैं लेकिन भारत में मनोविश्लेषकों के पास भीड़ नहीं है।

मनोविश्लेषक हैरान हैं। सो इस पेशे के समर्थक भारत को पिछड़ा बताते हैं। मनोविश्लेषक तनाव को रोग बताते हैं। वे तमाम प्रश्न पूछते हैं परामर्श देते हैं। इसे काउंसिलिंग कहा जाता है। लेकिन तनाव का समाधान प्रायः नहीं होता। मैं अपना उदाहरण दूं। राजनैतिक कार्यकर्ता हूं। मंच पर जगह चाहिए, माल्यार्पण चाहिए और आगे पीछे माइक भी। मंच, माला, माइक राजनैतिक कार्यकर्ता के आभूषण हैं। वे नहीं मिलते तो तनाव होता है। मनोविश्लेषक मेरे जैसे यशलोलुप को क्या परामर्श देंगे? ज्यादा से ज्यादा सुझाव देंगे कि ऐसा हर सभा में जरूरी नहीं। कहेंगे कि परिस्थिति को यथातथ्य समझना आवश्यक है। वैसे राजनीति तनाव का क्षेत्र है ही। यहां प्रतिपल तनाव हैं। मेरे एक मित्र वरिष्ठ राजनेता अक्सर तनाव में रहते हैं। अखबार में उनका नाम पहले नम्बर पर नहीं आता। तनाव सब तरफ है। क्रिकेट के खेल में मनपसंद टीम नहीं जीती तो भी तनाव लेकिन तनाव बीमारी नहीं है। यह जीवन दृष्टि का ही उपहार है। दर्शन की अनेक धाराएं हैं लेकिन जीवन साियता के ढंग सिर्फ दो। हम आस्तत्व के अंग हैं। आस्तत्व का हरेक अंग, अणु और परमाणु गतिशील है। इसी गति में हम सब भी गतिशील है।

अस्तित्व के साथ गतिशील होना विराट प्रवाह का आनंद पाना है। नदी बह रही हैं। हम बहाव के विपरीत तैर रहे हैं। संघर्ष स्वाभाविक है। संघर्ष का ताप अंदर तक होना ही तनाव है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। हम नदी के प्रवाह में स्वयं को छोड़ सकते हैं। अब नदी की इच्छा ही हमारी इच्छा। वह जहां चाहे, वहां ले जाए। काहे का संघर्ष। तनाव का कोई प्रश्न ही नहीं। अस्तित्व विराट। नदी जैसा। हम आस्तत्व के अंग हैं। अस्तित्व नाद के ही प्रवाह। उपनिषद के ऋषि बता गये हैं- इकाई होना दुख है। अनंत होना आनंद। बूंद होना पीड़ा है, नदी या सागर होना परमबोध और आनंद। अनंत होने की अनुभूति का मार्ग सीधा है। यहां कोई बौध्दिकता नहीं। ऋक पंथ है यह। आस्तत्व का जस तस स्वीकार। अस्तित्व ही निर्णायक है। हम कौन होते हैं, निर्णय लेने वाले? यही आस्तिकता है। अस्तिकता किसी अज्ञात ईश्वर के प्रति विश्वास नहीं है। अस्तित्व प्रत्यक्ष है। जड़ के हरेक अणु से चेतना झांक रहा है। पेड़ से, शाख से, पत्ती और फूल से चेतना ही चेतन की गूंज है। हरेक प्राणी, धूल का कम या कीट पतिंग अस्तित्व का ही चेहरा है। सबका स्वीकार। सबके प्रति नमन। लेकिन ऐसा आसान नहीं। अनुभूति और दर्शन की बातें दीगर हैं लेकिन स्वयं को अस्तित्व के साथ एकात्म जानना आत्मबोध से ही संभव है। एकाकीपन डराता है। हम अज्ञात भविष्य के प्रति भयभीत होते हैं। तब हम वर्तमान में नहीं होते। हम भविष्य की कल्पित आशंकाएं वर्तमान में ले आते हैं।

मनोविज्ञान पर ढेर सारी किताबें हैं। वे जटिल हैं। डा.कृष्णदत्त उप्र के प्रतिष्ठित मनोविज्ञानी ने जीवन मनोविज्ञान नाम से एक सुंदर पुस्तक लिखी है। तनाव वाले अध्याय में लिखते हैं तनाव की उत्पति भविष्यगत कारणों से होती है। यह काल्पनिक स्थिति है। खेल मन का है। प्रभाव तन पर भी पड़ता है। मन तनावग्रस्त तो तन भी। मन और तन दो अलग सत्ता नहीं हैं। सूक्ष्म मन का स्थूल भाग तन है या स्थूल तन का अतिसूक्ष्म भाग मन। स्वयं को एकांकी जानना ही गलत है। लेकिन तनाव निन्दनीय नहीं है। दुनिया के सारे महान दार्शनिक और वैज्ञानिक तनाव में रहे। उनमें प्रकृति की गतिशीलता को समझने का तनाव था। जान पड़ता है कि सविता सूर्य भी उगने और अस्त हो जाने का कर्तव्य पालन पूरा करने के लिये तनावग्रस्त रहे होंगे। इसी तनाव ने उन्हें नियमबध्द आचरण दिया। नदिया तनाव में ही समुद्र की ओर भागती हैं तेज रफ्तार। इसी तनाव में उन्होंने अपनी गति को लयबध्द बनाया। तनाव हड़बड़ी है। नियम-बध्दता आश्वस्ति है। प्रकृति में नियमबध्दता है। हममें नहीं है। प्रकृति हड़बड़ी में नहीं है, हम हड़बड़ी में हैं। वैदिक पूर्वजों में हड़बड़ी नहीं थी। काहे की जल्दबाजी? वे 100 बरस जीना चाहते थे, जानते थे कि बार-बार किसी न किसी रूप में संभवन होता है। अनंत इच्छाएं हैं तो समय भी अनंत है। कोई शीघ्रता नहीं। इसी आश्वस्ति भाव में उन्होंने काव्य और मंत्र रचे।

 

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