अमेरिका से अरब तक महक रही बासमती: कैसे भारत ने जीता ग्लोबल राइस मार्केट

वाशिंगटन 
सुबह का सूरज जब पंजाब के हरे-भरे खेतों पर चमकता है, तो हवा में एक अनोखी खुशबू फैल जाती है। ये खुशबू है बासमती चावल की- लंबे दाने, बारीक सुगंध और स्वाद का वो राज जो सदियों से भारत की मिट्टी से निकलकर दुनिया के हर कोने तक पहुंच रहा है। आज, जब आप अमेरिका के किसी रेस्तरां में बिरयानी का मजा लेते हैं या सऊदी अरब के किसी घर में चावल की थाली सजती है, तो उसके पीछे भारत का स्वाद जुड़ा होता है। ‘इंडियन राइस एक्सपोर्ट्स फेडरेशन’ के आंकड़ों के अनुसार, भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है और वैश्विक बाजार में 28 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। वह शीर्ष निर्यातक भी है, जिसकी 2024-25 में वैश्विक निर्यात में 30.3 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। भारत चावल की जो किस्में वैश्विक स्तर पर निर्यात करता है, उनमें ‘सोना मसूरी’ अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजारों में पसंद की जाती है। लेकिन भारत का ये दबदबा रातोंरात नहीं बना। ये एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा की कहानी है जो सिंधु घाटी से शुरू होकर आज के जीन-एडिटेड बीजों तक का सफर तय कर चुकी है। आइए, इस खुशबू की कहानी को विस्तार से समझते हैं।

भारतीय चावल की चर्चा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया दावे से शुरू हुई है। ट्रंप ने कहा है कि भारत को अमेरिकी बाजार में चावल डंप करना (सस्ते दामों पर बेचना) नहीं चाहिए और वह इस मामले से निपट लेंगे। ट्रंप ने चेतावनी दी कि टैरिफ लगाकर इस समस्या का आसानी से हल निकल जाएगा। ट्रंप ने सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास एवं कार्यालय ‘वाइट हाउस’ में खेती और कृषि क्षेत्र के प्रतिनिधियों तथा अपने कैबिनेट के प्रमुख सदस्यों खासकर वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और कृषि मंत्री ब्रूक रोलिन्स के साथ एक गोलमेज बैठक की।

लुइसियाना में अपने परिवार के कृषि कारोबार ‘केनेडी राइस मिल’ का संचालन करने वाली मेरिल केनेडी ने ट्रंप से कहा कि देश के दक्षिणी हिस्से में चावल उत्पादक वास्तव में संघर्ष कर रहे हैं और अन्य देश अमेरिकी बाजार में चावल डंप कर रहे हैं यानी कि बेहद सस्ते दामों पर चावल बेच रहे हैं। जब ट्रंप ने पूछा कि कौन से देश अमेरिका में चावल सस्ते दामों पर बेच रहे हैं तो राष्ट्रपति के बगल में बैठीं केनेडी ने जवाब दिया- भारत और थाइलैंड; यहां तक कि चीन भी प्यूर्टो रिको में चावल सस्ते दामों पर बेच रहा है। प्यूर्टो रिको कभी अमेरिकी चावल का सबसे बड़ा बाजार हुआ करता था। हमने कई वर्षों से प्यूर्टो रिको में चावल नहीं भेजे हैं।

ट्रंप ने फिर बेसेंट की ओर देखते हुए कहा- भारत, मुझे भारत के बारे में बताइए। भारत को ऐसा करने की अनुमति क्यों है? उन्हें टैरिफ देना होगा। क्या उन्हें चावल पर छूट मिली हुई है? इस पर बेसेंट ने कहा- नहीं सर, हम अभी उनके साथ व्यापार सौदे पर बातचीत कर रहे हैं। केनेडी ने ट्रंप को यह भी बताया कि भारत के खिलाफ विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में एक मामला चल रहा है। ट्रंप ने कहा कि इसे बहुत आसानी से निपटाया जा सकता है। उन्होंने कहा- यह उन देशों पर टैरिफ लगाकर बहुत जल्दी हल हो जाएगा, जो अवैध रूप से सामान भेज रहे हैं।

प्राचीन जड़ें: चावल का भारत से वैश्विक सफर
अब आते हैं असली कहानी पर- भारत और चावल का इतिहास। चावल की कहानी भारत की सभ्यता से जुड़ी है। पुरातत्वविदों के अनुसार, 5000 साल से ज्यादा पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2500 ईसा पूर्व) में चावल की खेती के प्रमाण मिलते हैं। लोथल और राखीगढ़ी जैसे स्थलों पर मिले अवशेष बताते हैं कि हमारे पूर्वज नदियों के किनारे इस अनाज को उगा रहे थे। वेदों में भी 'अन्न' के रूप में चावल का जिक्र है, जो न सिर्फ भोजन था बल्कि पूजा-अर्चना का हिस्सा भी। संस्कृत में इसे 'अक्षत' कहा जाता है, जो अमरता का प्रतीक है।

प्राचीन काल में चावल व्यापार का माध्यम बना। रोमन साम्राज्य से लेकर अरब व्यापारियों तक, भारतीय चावल मसालों के साथ जहाजों पर लादा जाता। लेकिन असली मोड़ आया मुगल काल में। कहा जाता है कि जहांगीर के समय (17वीं शताब्दी) बासमती चावल को 'बासमती' नाम मिला, जिसका मतलब है 'महकदार' या 'सुगंधित'। हालांकि इतिहास में इसको लेकर अलग-अलग दावे हैं। खैर, ये चावल हिमालय की तलहटी में उगता था- पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के मैदानों में। मुगलों ने इसे राजसी भोजनों का हिस्सा बनाया और जल्द ही ये यूरोप पहुंच गया। ब्रिटिश राज में चावल निर्यात औपचारिक रूप ले चुका था। 19वीं शताब्दी के अंत तक, भारत ब्रिटेन को चावल सप्लाई कर रहा था, जो औद्योगिक क्रांति के दौरान मजदूरों का मुख्य भोजन था।

स्वतंत्रता के बाद, 1950-60 के दशक में हरित क्रांति ने चावल उत्पादन को आसमान पर पहुंचा दिया। भारत रत्न एम.एस. स्वामीनाथन जैसे वैज्ञानिकों ने हाइब्रिड बीज, उर्वरकों और सिंचाई (जैसे पंजाब में नहरें) से उत्पादन को दोगुना कर दिया। 1960 में जहां भारत 50 मिलियन टन चावल पैदा करता था, वहीं आज ये 150 मिलियन टन को पार कर चुका है। इस क्रांति ने न केवल भुखमरी को रोका, बल्कि यह निर्यात का आधार बनी। 1970-80 के दशक में भारत ने अफ्रीका और मध्य पूर्व को सस्ता चावल भेजना शुरू किया, जो आज भी उसके प्रमुख बाजार हैं।

वैश्विक बाजार में उभार: चुनौतियां और जीत
1990 के दशक में भारत ने चावल निर्यात में थाइलैंड और वियतनाम को पछाड़ना शुरू किया। वजह? विविधता- बासमती की प्रीमियम खुशबू और नॉन-बासमती का सस्तापन। 2000 तक भारत वैश्विक निर्यात का 20% हिस्सा ले चुका था। लेकिन चुनौतियां भी आईं। 2007-11 और 2023 में एल नीनो जैसी सूखे की वजह से भारत ने निर्यात प्रतिबंध लगाए, जिससे वैश्विक कीमतें 15 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं। ये कदम घरेलू खाद्य सुरक्षा के लिए थे, लेकिन दुनिया को याद दिला दिया कि भारत के बिना चावल बाजार अधूरा है।

फिर भी, भारत ने दबदबा बनाए रखा। 2011 से भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है। 2023 में OEC के आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने 11 बिलियन डॉलर का चावल निर्यात किया, जिसमें सऊदी अरब, ईरान और इराक प्रमुख खरीदार थे। बेनिन जैसे अफ्रीकी देशों ने नॉन-बासमती चावल के लिए 55.7 करोड़ डॉलर खर्च किए। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत का चावल न सिर्फ अमीरों की मेज पर, बल्कि गरीबों की थाली में भी है।

2025 में नया रिकॉर्ड और खुशबू का विस्तार
2025 में भारत का चावल बाजार चरम पर है। खरीफ सीजन 2025-26 के पहले अनुमान के अनुसार, चावल उत्पादन रिकॉर्ड 124.50 मिलियन टन पहुंचेगा- पिछले साल से 1.73 मिलियन टन ज्यादा। कुल खाद्यान्न उत्पादन 173.33 मिलियन टन अनुमानित है। ये बढ़ोतरी मॉनसून की अच्छी बरसात और बेहतर सिंचाई से आई। IRRI और ICAR ने 31 नई चावल किस्में लॉन्च कीं, जो जलवायु प्रतिरोधी हैं- जैसे DRR धान 75, जो बासमती 5204 का बेहतर वर्जन है। मई 2025 में भारत ने दुनिया की पहली जीन-एडिटेड चावल किस्में- DRR धान 100 (कमला) और पुसा DST-1 जारी कीं। ये 19% ज्यादा पैदावार देती हैं, सूखा-सहनशील हैं और 20% ग्रीनहाउस गैस कम करती हैं।

ये देश खरीदते हैं भारत से सबसे ज्यादा चावल
    सऊदी अरब
    इराक
    बेनिन
    ईरान
    संयुक्त अरब अमीरात
    अमेरिका
    बांग्लादेश
    यमन
    मलेशिया
    सिंगापुर
    अफगानिस्तान
    नाइजीरिया
    ब्रुनेई
    कुवैत
    जॉर्डन
    नीदरलैंड्स
    सेनेगल
    उत्तरी मैसेडोनिया
    कोटे डी'इवोरी
    सूडान

भारत ने 1 अप्रैल, 2024 से 25 मार्च, 2025 के बीच 198.65 लाख टन चावल एक्सपोर्ट किया। भारतीय चावल निर्यातक फेडरेशन 26 नए बाजारों – जैसे इराक, इंडोनेशिया, जापान, मैक्सिको पर नजर रखे हुए है। लेकिन चुनौतियां भी हैं। दिसंबर 2025 में डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ संकेतों से बासमती शेयरों में 10% गिरावट आई, लेकिन अमेरिका कुल निर्यात का सिर्फ 5% है।

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के डेटा के अनुसार, भारत ने 2023-24 में अमेरिका को 391.74 मिलियन डॉलर मूल्य का चावल एक्सपोर्ट किया, जो भारत के कुल चावल शिपमेंट का लगभग 3.1% है। भारत 179 अन्य देशों को भी चावल एक्सपोर्ट करता है। दूसरी ओर, वर्ल्ड इंटीग्रेटेड ट्रेड सॉल्यूशंस वेबसाइट के डेटा के अनुसार, 2024 में अमेरिका ने 1.6 बिलियन डॉलर मूल्य का जो चावल इम्पोर्ट किया, उसमें भारत का हिस्सा लगभग 26% था। सीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका के लिए भारतीय चावल एक जरूरत हैं। ट्रंप का टैरिफ भारत को नुकसान नहीं पहुंचा पाएगा।

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