न्यायपालिका में पारदर्शिता की जरूरत: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कॉलेजियम सुधार की वकालत की

नई दिल्ली 
भारत के नए मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने 24 नवंबर से अपना 15 महीने का कार्यकाल शुरू किया है। उन्होंने कॉलेजियम प्रक्रिया को और खोलने तथा लंबित मामलों से निपटने के लिए अपने रोडमैप पर चर्चा की है। उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में अपने 14 वर्षों के कार्यकाल के दौरान ड्रग्स की समस्या से निपटने के लिए दिए गए कई आदेशों के बारे में बात की। इसके साथ ही उन्होंने कॉलेजियम प्रणाली में सुधार की वकालत की। इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि जब 2015 के आसपास यह मामला उन्हें सौंपा गया था, तब पंजाब में ड्रग्स का खतरा अत्यधिक अनियंत्रित स्तर पर था। उन्होंने इसे धैर्य की वास्तविक परीक्षा बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक आदेश से हल होने वाला मामला नहीं था।

CJI को मास्टर ऑफ रोस्टर क्यों होना चाहिए?
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि CJI को मास्टर ऑफ रोस्टर कहा जाना सही है, लेकिन इस भूमिका को अक्सर गलत समझा जाता है। CJI सर्वोच्च न्यायालय का सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश होता है और यह वरिष्ठता न्यायिक भूमिका के साथ-साथ अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी लाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि मामले एकतरफा तरीके से सौंपे जाते हैं। व्यवहार में ये निर्णय अन्य न्यायाधीशों के साथ उनकी उपलब्धता, अनुभव के क्षेत्रों और न्यायालय के समग्र कामकाज को ध्यान में रखते हुए विचार-विमर्श के बाद लिए जाते हैं।

न्यायिक स्वतंत्रता पर जस्टिस कांत ने पूर्ण सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि यह हमारे देश में प्रभावी न्याय वितरण प्रणाली की आधारशिला है, और यह संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के साथ चलती है। उन्होंने कहा कि हमारी जिम्मेदारी पूरी तरह से संविधान और उन लोगों के प्रति है जिनकी यह रक्षा करता है। सोशल मीडिया पर जजों की हो री आलोचना पर चीफ जस्टिस ने कहा कि सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह स्वतंत्रता को बाधित करने वाला एक कठोर उपाय होगा। उन्होंने माना कि जब अदालत की कार्यवाही के संक्षिप्त अंश या 'स्निपेट्स' संदर्भ के बिना ऑनलाइन साझा किए जाते हैं, तो गलतफहमी लगभग अपरिहार्य होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आलोचना अक्सर अज्ञानता से उत्पन्न होती है और इसे नजरअंदाज किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि कर्तव्यों से ध्यान हटाकर सोशल मीडिया पर ध्यान केंद्रित करने से न्याय की गुणवत्ता प्रभावित होगी।

कॉलेजियम प्रणाली में सुधार
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कॉलेजियम प्रणाली का बचाव किया लेकिन स्वीकार किया कि किसी भी प्रणाली में सुधार की गुंजाइश हमेशा होती है। उम्मीदवारों के साथ व्यक्तिगत बातचीत एक स्वागत योग्य कदम है, जो कॉलेजियम के सदस्यों को उम्मीदवार का सीधे आकलन करने में मदद करता है। उन्होंने योग्यता, सत्यनिष्ठा और अनुभव पर और भी अधिक जोर देने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि अब नियुक्तियों में अनुमोदन और अस्वीकृति के लिए कारण बताने का प्रयास किया जाता है, जो अधिक खुलेपन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि प्रक्रिया अंतर्निहित रूप से जटिल है और प्रणाली की अखंडता बनाए रखने के लिए कुछ आंतरिक प्रक्रियाओं को सार्वजनिक डोमेन में पूरी तरह से नहीं रखा जा सकता है।

 

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