2026 में बाजार पर दबाव, एफपीआई ने अब तक 36,500 करोड़ रुपए किए निकाले

मुंबई 

इस सप्ताह भारतीय शेयर बाजार में 2.5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। इसकी मुख्य वजह मुनाफावसूली, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और अमेरिका की टैरिफ नीति को लेकर बढ़ी वैश्विक चिंताएं रहीं। इस सप्ताह के दौरान सभी सेक्टोरल इंडेक्स लाल निशान में बंद हुए। इनमें रियल्टी सेक्टर सबसे ज्यादा गिरा, जिसमें 11.33 प्रतिशत की गिरावट आई। इसके अलावा कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, टेलीकॉम और कंज्यूमर डिस्क्रेशनरी सेक्टर भी 5 प्रतिशत से ज्यादा टूटे। हफ्ते के दौरान निफ्टी में 2.51 प्रतिशत की गिरावट आई और आखिरी कारोबारी दिन यह 0.95 प्रतिशत फिसलकर 25,048 पर बंद हुआ। वहीं सेंसेक्स आखिरी दिन 769 अंक यानी 0.94 प्रतिशत गिरकर 81,537 पर बंद हुआ। पूरे हफ्ते में सेंसेक्स 2.43 प्रतिशत नीचे रहा।

स्मॉल और मिडकैप शेयरों पर दबाव ज्यादा देखने को मिला, जिसमें निफ्टी मिडकैप 100 में 4.58 प्रतिशत, तो वहीं निफ्टी स्मॉलकैप 100 में 5.81 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

बैंक निफ्टी भी कमजोर रहा और यह एक अहम सपोर्ट लेवल 58,800 के नीचे फिसल गया, जिससे बाजार में नकारात्मक संकेत मिले।
विशेषज्ञों के अनुसार, हफ्ते की शुरुआत में कुछ आईटी और बैंकिंग कंपनियों के अच्छे तिमाही नतीजों से बाजार को थोड़ी राहत मिली थी, लेकिन बाद में कई कंपनियों के कमजोर नतीजों ने निवेशकों की धारणा को फिर से कमजोर कर दिया।दुनिय भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव खासकर अमेरिका की तरफ से ग्रीनलैंड और टैरिफ को लेकर सख्त बयान, ने वैश्विक बाजारों को परेशान किया। इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ा और बिकवाली बढ़ गई।

इसके अलावा, वैश्विक बॉन्ड यील्ड बढ़ने और अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुराने टैरिफ मामलों की समीक्षा को लेकर अनिश्चितता ने निवेशकों में जोखिम लेने की प्रवृत्ति को और भी सीमित कर दिया।
1 जनवरी 2026 से अब तक, सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में 4 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है। इस दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने करीब 36,500 करोड़ रुपए के शेयर बेचे हैं।
इस बीच भारतीय रुपया भी कमजोर होकर लगभग 92 रुपए प्रति डॉलर के पास पहुंच गया, जिससे आयात महंगा होने और महंगाई बढ़ने की चिंता बढ़ी है।
निवेशक अब केंद्रीय बजट 2026 और अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर आने वाले संकेतों पर नजर बनाए हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट से पहले कुछ समय के लिए बाजार में तेजी की छोटी लहर देखने को मिल सकती है, क्योंकि कई विदेशी निवेशकों की शॉर्ट पोजिशन पहले से बनी हुई है।
हालांकि, बाजार में स्थायी सुधार तभी आएगा जब वैश्विक हालात बेहतर होंगे, कंपनियों के नतीजे अच्छे आएंगे और बजट से निवेशकों को भरोसा मिलेगा।

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