वैराग्य का अर्थ और मनुष्य की द्वंद्वात्मक भाषा का भ्रम

वैराग्य का अर्थ, जहां न राग रह गया, न विराग रह गया। जहां न किसी चीज का आकर्षण है, न विकर्षण है। न किसी चीज के प्रति खिंचाव है, न विपरीत भागना है। जहां न किसी चीज का बुलावा है, न विरोध है। जहां व्यक्ति थिर हुआ, सम हुआ, जहां पक्ष और विपक्ष एक से हो गए, वहां वैराग्य फलित होता है। लेकिन इसे विराग या वैराग्य क्यों कहते हैं? जहां वैराग्य भी नहीं है, वहां वैराग्य क्यों कहते हैं? क्योंकि कोई उपाय नहीं है। शब्द की मजबूरी है, और कोई बात नहीं है। आदमी के पास सभी शब्द द्वंद्वात्मक हैं, डायलेक्टिकल हैं। आदमी की भाषा में ऐसा शब्द नहीं है जो नॉन-डायलेक्टिकल हो, द्वंद्वात्मक न हो। मनुष्य ने जो भाषा बनाई है, वह मन से बनाई है। मन द्वंद्व है। इसलिए मनुष्य जो भी भाषा बनाता है, उसमें विपरीत शब्दों में भाषा को निर्मित करता है।

मजे की बात है कि हमारी भाषा बन ही नहीं सकती विपरीत के बिना। क्योंकि बिना विपरीत के हम परिभाषा नहीं कर सकते। अगर कोई आपसे पूछे कि अंधेरा यानी क्या? तो आप कहते हैं, जो प्रकाश नहीं है। कोई पूछे, प्रकाश क्या? तो आप कहते हैं, जो अंधेरा नहीं है। न आपको अंधेरे का पता है कि क्या है, न प्रकाश का पता है कि क्या है? अंधेरे को जब पूछते हैं, तो कह देते हैं, प्रकाश नहीं है। जब पूछते हैं, प्रकाश क्या है? तो कह देते है, अंधेरा नहीं है। यह कोई परिभाषा हुई? परिभाषा तो तभी हो सकती है, जब कम से कम एक का तो पता हो!
एक आदमी एक अजनबी गांव में गया। उसने पूछा कि 'अ' नाम का आदमी कहां रहता है? तो लोगों ने कहा, 'ब' नाम के आदमी के पड़ोस में। पर उसने कहा, मुझे 'ब' का भी कोई पता नहीं, 'ब' कहां रहता है? उन्होंने कहा, 'अ' के पड़ोस में। ऐसे ही आदमी से पूछो, चेतना क्या है? वह कहता है, जो पदार्थ नहीं है। उससे पूछो, पदार्थ क्या है? वह कहता है, जो चेतना नहीं। माइंड क्या है? मैटर नहीं। मैटर क्या है? माइंड नहीं। बड़े से बड़ा दार्शनिक भी इसको परिभाषा कहता है। यह डेफिनिशन हुई? यह तो धोखा हुआ, डिसेप्शन हुआ- परिभाषा न हुई। क्योंकि इसमें से एक का भी पता नहीं है।

आदमी को कुछ भी पता नहीं है, लेकिन काम तो चलाना पड़ेगा। इसलिए आदमी बेईमान शब्दों को रखकर काम चलाता है। उसके सब शब्द डिसेप्टिव हैं। उसके किसी शब्द में कोई भी अर्थ नहीं है। क्योंकि अपने शब्द में वह जिस शब्द से अर्थ बताता है, उस शब्द में भी उसको कोई अर्थ पता नहीं है। उसकी सब परिभाषाएं सर्कुलर हैं, वर्तुलाकार हैं। वह कहता है, बाएं यानी क्या? वह कहता है, जो दाएं नहीं है। और दाएं? वह कहता है, जो बाएं नहीं है। लेकिन इनमें से किसी को पता है कि बायां क्या है?

यह आदमी की भाषा डायलेक्टिकल है। डायलेक्टिकल का मतलब यह कि जब आप पूछें 'अ' क्या, तो वह 'ब' की बात करता है। जब पूछें 'ब' क्या, तो वह 'अ' की बात करने लगता है। इससे भ्रम पैदा होता है कि सब पता है। पता कुछ भी नहीं है, सिर्फ शब्द पता हैं। लेकिन बिना शब्दों के काम नहीं चल सकता। राग है तो विराग है। लेकिन तीसरा शब्द कहां से लाएं? और तीसरा शब्द ही सत्य है। वह कहां से लाएं?- ओशो

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