राजस्थान वन विभाग का बड़ा फैसला: लेपर्ड को मारने से पहले DNA जांच जरूरी

जयपुर

 राजस्थान में मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं के बीच राज्य वन विभाग ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। अब किसी भी लेपर्ड को 'आदमखोर' घोषित कर उसे मारने की अनुमति देना आसान नहीं होगा। चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन के.सी.ए. अरुणप्रसाद द्वारा जारी की गई नई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर में स्पष्ट किया गया है कि लेपर्ड को 'आदमखोर' श्रेणी में डालने के लिए अब पुख्ता वैज्ञानिक और कानूनी साक्ष्यों की आवश्यकता होगी।

बिना फॉरेंसिक जांच नहीं होगा फैसला
नई गाइडलाइन के अनुसार, यदि किसी लेपर्ड पर इंसानों पर हमला करने या उन्हें खाने का संदेह है, तो केवल अनुमान के आधार पर कार्रवाई नहीं की जाएगी। विभाग को अब निम्नलिखित प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी-

    डीएनए विश्लेषण: घटनास्थल पर मिले बालों, लार या अन्य नमूनों का मिलान संदिग्ध जानवर से करना होगा।
    फॉरेंसिक साक्ष्य: हमले के निशान और अन्य फॉरेंसिक एविडेंस की जांच अनिवार्य कर दी गई है।
    वैज्ञानिक निगरानी: हमले वाले क्षेत्र में ट्रैप कैमरे और ड्रोन के जरिए लेपर्ड के व्यवहार की निगरानी की जाएगी।

मारना नहीं, पकड़ना होगी पहली प्राथमिकता
SOP में यह भी साफ किया गया है कि अगर किसी लेपर्ड को 'आदमखोर' मान भी लिया जाता है, तब भी पहली प्राथमिकता उसे जीवित पकड़ने की होगी। उसे मारने का आदेश केवल अंतिम विकल्प के रूप में और चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन की लिखित अनुमति के बाद ही दिया जा सकेगा।

भीड़ पर लगेगी लगाम
अक्सर रेस्क्यू के दौरान उमड़ने वाली भीड़ लेपर्ड को हिंसक बना देती है। अब ऐसे संवेदनशील ऑपरेशन्स के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 (पूर्व में 144) लागू की जाएगी। पुलिस को भीड़ हटाने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के सख्त निर्देश दिए गए हैं ताकि वैज्ञानिक तरीके से जांच पूरी की जा सके।

हर जिले में रैपिड रिस्पांस टीमें होगी तैनात
वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि हैबिटेट के विखंडन के कारण लेपर्ड आबादी के करीब आ रहे हैं। इस नई नियमावली का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी बेगुनाह जानवर को महज लोगों के गुस्से या डर के कारण अपनी जान न गंवानी पड़े। अब हर जिले में रैपिड रिस्पांस टीमें तैनात रहेंगी, जो आधुनिक उपकरणों और वैज्ञानिक डेटा के आधार पर ऐसे संकटों का समाधान करेंगी।

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