सिंधूर बरसी पर भारत का सख्त संदेश: आजादी के बाद पहली बार रोका रावी का पानी

नई दिल्‍ली
 दशकों से रावी की लहरें अपनी ही मिट्टी को प्यासा छोड़कर सरहद पार उस मुल्क की ओर बह जाती थीं जिसने दोस्ती के बदले हमेशा दगा दिया. लेकिन अब वक्त बदल चुका है. ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ पर भारत ने पानी की एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच दी है जिसने भूगोल और किस्मत दोनों को बदल कर रख दिया. शाहपुर कंडी बैराज के कपाट क्या खुले मानो हिमालय की गोद से निकला नीर भारत की संप्रभुता का शंखनाद करने लगा. पहली बार रावी का पानी अपनी पुरानी राह छोड़ पूरी ठसक के साथ कठुआ के उझ बैराज की ओर मुड़ गया. यह सिर्फ पानी का बहाव नहीं, पाकिस्तान के लिए एक सख्त संदेश है कि अब भारत के हक की एक बूंद भी मुफ्त में सीमा पार नहीं जाएगी. जहां कल तक जम्मू-कश्मीर की कंडी बेल्ट की धरती प्यास से चटक रही थी, वहां आज रावी की गर्जना किसानों के चेहरों पर मुस्कान और पाकिस्तान के हलक में खुश्की बनकर उतरी है। 

आजादी के बाद पहली बार पाक नहीं जाएगा रावी का पानी
पंजाब के पठानकोट जिले में बने शाहपुर कंडी डैम से एक ऐतिहासिक शुरुआत हुई है. पहली बार रावी नदी के पानी को उज्ह बैराज तक डायवर्ट करने का काम शुरू कर दिया गया है. आजादी के बाद यह पहला मौका है जब रावी नदी के पानी का इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर और पंजाब में बड़े स्तर पर किया जाएगा। 

भारत ने सिंधु जल संधि के तहत अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग करते हुए दशकों के इंतजार के बाद रावी नदी का वह पानी जो अब तक बहकर पाकिस्तान चला जाता था, उसे पूरी तरह रोककर जम्मू-कश्मीर की प्यासी धरती की ओर मोड़ दिया गया है. शाहपुर कंडी बैराज परियोजना के पूरे होने के साथ ही रावी का पानी पहली बार कठुआ स्थित उझ बैराज तक पहुंच गया है. यह घटनाक्रम न केवल कृषि के लिहाज से क्रांतिकारी है बल्कि सामरिक दृष्टि से भी भारत की एक बड़ी जीत मानी जा रही है. ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ के अवसर पर मिली यह सफलता भारत की जल सुरक्षा नीति को एक नई ऊंचाई प्रदान करती है. कठुआ और सांबा के कंडी बेल्ट में आज दिवाली जैसा माहौल है क्योंकि अब यहां के खेतों को मानसून के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा। 

पंजाब में 5000 हैक्‍टेयर जमीन पर 12 महीने सिंचाई
अब तक रावी नदी का अधिकांश पानी जम्मू-कश्मीर और पंजाब की सीमा से होकर पाकिस्तान चला जाता था, जबकि भारत के सीमावर्ती इलाकों के किसान सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर रहते थे. खासकर उज्ह बैराज में केवल बरसात के मौसम में 2 से 3 महीने तक ही पानी रहता था और उसके बाद बैराज लगभग सूख जाता था. लेकिन शाहपुर कंडी डैम बनने के बाद तस्वीर बदलनी शुरू हो गई है. डैम से उज्ह बैराज तक बनाई गई नई नहर के जरिए अब पानी पहुंचाया जा रहा है. इससे किसानों को लगभग पूरे साल सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो सकेगा। 

इस परियोजना से पंजाब की करीब 5000 हेक्टेयर जमीन को सिंचाई का लाभ मिलेगा, जबकि जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों की लगभग 32 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को सीधा फायदा पहुंचेगा. इसके साथ ही इस परियोजना से 206 मेगावाट बिजली उत्पादन भी किया जाएगा, जिससे ऊर्जा क्षेत्र को भी मजबूती मिलेगी। 

पाकिस्‍तान जाने वाली सभी 6 नदियों के पानी का हो रहा इस्‍तेमाल
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने इंडस वॉटर ट्रीटी को “केप्ट इन एबेयंस” रखने का फैसला लिया, जिसके बाद अब भारत अपने हिस्से के पानी का इस्तेमाल रणनीतिक और विकासात्मक जरूरतों के अनुसार कर रहा है. अब केवल रावी, सतलुज और ब्यास ही नहीं बल्कि चिनाब, झेलम और इंडस नदी के पानी के उपयोग को लेकर भी भारत ने अपनी परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है. पहले भारत को इन नदियों पर काम करने के लिए कई शर्तों और पाकिस्तान के साथ सूचना साझा करने की प्रक्रिया का पालन करना पड़ता था लेकिन अब कई वर्षों से लंबित परियोजनाओं को मंजूरी देकर तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। 

विकास की नई धारा

· ऐतिहासिक उपलब्धि: शाहपुर कंडी बैराज से पानी का प्रवाह शुरू होने के बाद रावी का पानी पहली बार आधिकारिक तौर पर उझ बैराज तक पहुंचा है.

· सिंचाई की बड़ी सौगात: इस परियोजना से जम्मू-कश्मीर और पंजाब की लगभग 37,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो सकेगी.

· जम्मू-कश्मीर को मुख्य लाभ: कुल सिंचित भूमि में से 32,000 हेक्टेयर हिस्सा अकेले जम्मू-कश्मीर में आता है, जिससे केंद्र शासित प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था को भारी मजबूती मिलेगी.

· कंडी क्षेत्र का कायाकल्प: कठुआ और सांबा जिले के कंडी बेल्ट के किसान जो दशकों से पानी की किल्लत झेल रहे थे अब साल भर सिंचाई की सुविधा का लाभ उठा पाएंगे.

· पाकिस्तान की मुश्किलें: भारत द्वारा अपने हिस्से का पानी रोकने से पाकिस्तान के कई इलाकों में जल संकट गहराने की आशंका है जो अब तक मुफ्त के पानी पर निर्भर थे.

ऑपरेशन सिंदूर और जल कूटनीति
भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर और सिंधु जल संधि (1960) के प्रावधानों के तहत रावी, ब्यास और सतलुज के पानी पर अपने पूर्ण नियंत्रण को प्रभावी ढंग से लागू किया है. शाहपुर कंडी परियोजना का पूरा होना भारत की उस दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है जहां उसने तय किया कि अपने हक की एक बूंद भी सीमा पार नहीं जाने दी जाएगी। 

सामरिक दृष्टि से, यह परियोजना पाकिस्तान पर दबाव बनाने का एक सॉफ्ट पावर टूल भी है. पाकिस्तान जो अब तक रावी के सरप्‍लस पानी का उपयोग कर रहा था अब उसे अपनी कृषि नीतियों पर दोबारा से विचार करना होगा. वहीं भारत के लिए यह कदम खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा मील का पत्थर है। 

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