अंतर्राज्यीय वन्यजीव तस्कर को हाईकोर्ट से झटका, याचिका खारिज

भोपाल 

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंड पीठ में गठित युगल पीठ ने स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स मध्यप्रदेश द्वारा मध्यप्रदेश के संरक्षित वन क्षेत्रों में काला हिरण, चिंकारा, सांभर, चीतल आदि वन्यजीवों का शिकार कर उनके अवयवों की तस्करी मुंबई (महाराष्ट्र) तक करने वाले संगठित गिरोह के सरगना की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका ख़ारिज कर दी है। याचिका की   सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि आरोपी द्वारा पूर्व में दायर धारा 439 सीआरपीसी के तहत जमानत आवेदन पहले ही निरस्त किया जा चुका है। न्यायालय ने यह भी माना कि आरोपी दो मृत काले हिरणों के साथ वीडियो क्लिप में पाया गया था तथा गिरफ्तारी की समस्त वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया है। इसलिए आरोपी की हिरासत को अवैध नहीं माना जा सकता और यह याचिका बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के रूप में स्वीकार्य नहीं है।

स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स मध्यप्रदेश द्वारा मध्यप्रदेश के संरक्षित वन क्षेत्रों में काला हिरण, चिंकारा, सांभर, चीतल आदि वन्यजीवों का शिकार कर उनके अवयवों की तस्करी मुंबई (महाराष्ट्र) तक करने वाले संगठित गिरोह के विरुद्ध वन अपराध प्रकरण क्रमांक 21 अगस्त 2025 को दर्ज किया गया था। प्रकरण की विवेचना में गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ तथा वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर यह सामने आया कि गिरोह पिछले कई वर्षों से मध्यप्रदेश में आकर स्थानीय सदस्यों के साथ मिलकर वन्य जीवों का शिकार कर रहा था। एसटीएसएफ द्वारा इस गिरोह के कुल 6 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें 4 आरोपी महाराष्ट्र तथा 2 आरोपी मध्यप्रदेश के हैं।

गिरोह के सदस्य साहब अंतुले को 27 अक्टूबर 2025 को मुंबई (महाराष्ट्र) से गिरफ्तार कर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, इंदौर के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। आरोपी की जमानत याचिका इंदौर खंडपीठ द्वारा 26 फरवरी 2026 को निरस्त कर दी गई थी। आरोपी पिछले 6 माह से जेल में निरुद्ध है। आरोपी द्वारा अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए इंदौर खंडपीठ की युगल पीठ के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। सुनवाई में न्यायालय ने कहा कि आरोपी द्वारा पूर्व में दायर धारा 439 सीआरपीसी के तहत जमानत आवेदन पहले ही निरस्त किया जा चुका है। न्यायालय ने यह भी माना कि आरोपी दो मृत काले हिरणों के साथ वीडियो क्लिप में पाया गया था तथा गिरफ्तारी की समस्त वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया है। इसलिए आरोपी की हिरासत को अवैध नहीं माना जा सकता और यह याचिका बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के रूप में स्वीकार्य नहीं है।

न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता न्यायिक आदेश के तहत वैध हिरासत में है तथा इस मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट लागू नहीं होती। प्रकरण में प्रस्तुत साक्ष्यों एवं विवेचना के आधार पर न्यायालय ने आरोपी की याचिका निरस्त कर दी। 

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