राजा लालबहादुर की प्रतिमा हटाकर बसाई कॉलोनी, चिल्ड्रन पार्क जमीन घोटाले का खुलासा

खैरागढ़.

शहर में नजूल और मेंटेनेंस खसरा की जमीन पर कथित अवैध प्लाटिंग का मामला अब बड़े खुलासे में बदलता जा रहा है। सरकारी दस्तावेज, जांच प्रतिवेदन और पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि जिस जमीन पर कभी बच्चों का पार्क हुआ करता था, उसी जमीन को धीरे-धीरे टुकड़ों में बांटकर बेच दिया गया और वहां पूरी कॉलोनी और बड़े कॉम्प्लेक्स खड़े हो गए।

मामला राजनांदगांव-कवर्धा मेन रोड पर पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस के सामने स्थित प्लॉट नंबर 114 और 115 का है। पुराने सरकारी रिकॉर्ड में प्लॉट नंबर 114 को “एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क” और प्लॉट नंबर 115 को पार्क की बाड़ी के रूप में दर्ज बताया गया है। आजादी से पहले इस क्षेत्र को “अल्फ्रेड पार्क” कहा जाता था। स्वतंत्रता के बाद यह स्थान राजा लालबहादुर सिंह के नाम से पहचाना जाने लगा और वहां उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गई थी। स्थानीय लोगों के अनुसार बाद में राजा लालबहादुर सिंह की प्रतिमा को वहां से हटाकर डोंगरगढ़ स्थित “लाल निवास” में स्थापित कर दिया गया। इसके बाद धीरे-धीरे पूरी जमीन निजी हाथों में जाती चली गई और छोटे-छोटे हिस्सों में बिकने लगी।

सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि पहले यह जमीन राजा बहादुर वीरेंद्र बहादुर सिंह के नाम दर्ज थी। वर्ष 1974 में यह जमीन उनकी अवयस्क नातिन स्मृति देवी सिंह के नाम चढ़ गई। इसके बाद वर्षों तक जमीन के हिस्से अलग-अलग लोगों को बेचे जाते रहे। जांच प्रतिवेदन के अनुसार करीब एक लाख वर्गफीट से अधिक भूमि को लगभग 22 टुकड़ों में बांटा गया और 17 लोगों के नाम पर दर्ज कर दिया गया। बाद में इनमें से कई हिस्सों की दोबारा बिक्री भी हुई।

नगर एवं ग्राम निवेश विभाग से स्वीकृत नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस जमीन को सरकारी रिकॉर्ड में नजूल और मेंटेनेंस खसरा की भूमि बताया गया है, उसे आखिर निजी प्लॉटिंग में कैसे बदल दिया गया। जांच रिपोर्ट में साफ उल्लेख है कि जमीन का वैधानिक उपविभाजन नहीं कराया गया था और नगर एवं ग्राम निवेश विभाग से किसी प्रकार का ले-आउट भी स्वीकृत नहीं हुआ था। यानी कॉलोनी काटने की कानूनी अनुमति ही नहीं ली गई थी। इसके बावजूद जमीन की रजिस्ट्री, नामांतरण और निर्माण कार्य लगातार चलते रहे। जांच दस्तावेजों में यह भी दर्ज है कि करीब 85 हजार वर्गफीट से ज्यादा जमीन बिक चुकी है और वहां बड़े मकान, कॉम्प्लेक्स और अन्य निर्माण खड़े हो चुके हैं। कुछ हिस्सों में अब भी निर्माण कार्य जारी है।

सार्वजनिक जमीन की अनुमति किसने दी?
मामले को और गंभीर इसलिए माना जा रहा है, क्योंकि प्रशासनिक स्तर पर अवैध प्लाटिंग की जानकारी पहले से मौजूद थी। जांच रिपोर्ट में उल्लेख है कि संबंधित विभागों को इस जमीन के संबंध में जानकारी दी गई थी, फिर भी पंजीयन और नामांतरण की प्रक्रिया नहीं रुकी। अब खैरागढ़ में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बच्चों के पार्क और सार्वजनिक उपयोग की जमीन को निजी कॉलोनी में बदलने की अनुमति किसने दी? और जब जमीन मेंटेनेंस खसरा में दर्ज थी, तब वर्षों तक उसकी खरीदी-बिक्री और निर्माण कैसे चलता रहा? यह मामला अब सिर्फ जमीन विवाद नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी जमीनों की सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और संगठित भू-कारोबार की बड़ी जांच का विषय बन चुका है।

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