उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टले, 2027 के बाद वोटिंग कराने के पीछे क्या है रणनीति?

लखनऊ 

उत्तर प्रदेश की 'गांव की सरकार' लखनऊ के गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है. यूपी के पंचायत चुनाव को 2027 विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था, लेकिन योगी सरकार के फैसले के बाद सियासी सस्पेंस गहरा गया है. कार्यकाल समाप्त होने पर प्रधानों को ही ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त करने के सरकार के निर्णय लिए जाने के बाद कहा जाने लगा है कि 2027 के बाद ही सूबे में पंचायत चुनाव हो सकेंगे। 

योगी सरकार ने पंचायत चुनाव के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का निर्णय लिए जाने के साथ ही पंचायत चुनाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई थी. आयोग की सिफारिशें आने, सीटों का आरक्षण तय किए जाने और राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव संपन्न कराने की प्रक्रिया में ही नौ महीने से अधिक समय लगेंगे। 

यूपी में जब आरक्षण की प्रक्रियाएं पूरी होंगी तो उस समय प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी रहेगी. यही वजह है कि योगी सरकार ने सोमवार को ग्राम प्रधान के कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें ही प्रशासक नियुक्त कर दिया है. इसके चलते ही माना जा रहा है कि यूपी में पंचायत चुनाव अब विधानसभा चुनाव के बाद ही हो सकेंगे। 

योगी सरकार ने प्रधानों को बनाया प्रशासक
उत्तर प्रदेश में साल 2021 में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव हुए थे, जिसमें 58,189 ग्राम प्रधान चुने गए थे. इन प्रधानों का कार्यकाल मंगलवार यानी 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा था, लेकिन समय पर चुनाव नहीं होने के चलते योगी सरकार ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय लिया.  इस फैसले के बाद माना जा रहा है कि ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों को भी सरकार प्रशासक बनाने का निर्णय जल्द ही ले सकती है। 

 उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को ही छह महीने के लिए प्रशासक बनाने का निर्णय पहली बार हुआ है, इससे पहले जब भी समय पर पंचायत चुनाव नहीं हो पाते थे, तो सहायक विकास अधिकारी को ग्राम पंचायत का प्रशासक बनाया जाता रहा है, लेकिन पहली बार ग्राम प्रधान को नियुक्त किया गया है. हालांकि प्रधान अब प्रशासक बनकर भी कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे. विशेष स्थितियों में निर्णय के प्रस्ताव जिलाधिकारी उस पर स्वीकृति के बाद कर सकेंगे। 

विधानसभा चुनाव के बाद ही पंचायत चुनाव
ग्राम प्रधान के बाद बीडीसी, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और जिला पंचायत अध्यक्ष को भी योगी सरकार प्रशासक नियुक्त कर सकती है, क्योंकि इनके भी कार्यकाल खत्म हो रहे हैं. यूपी में मौजूदा ग्राम पंचायतों का कार्यकाल मई से जुलाई 2026 के बीच खत्म हो रहा है. नियम के मुताबिक चुनाव हो जाने चाहिए थे, लेकिन योगी कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' फॉर्मूले के तहत हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय समर्पित पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है, जो सूबे में आरक्षण का निर्धायण करेगी। 

ओबीसी आयोग को उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में रैपिड सर्वे कर पिछड़ों के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक आंकड़ों की जांच करने के लिए 6 महीने का समय दिया गया है. इस तरहह नवंबर 2026 तक तो ओबीसी आयोग की रिपोर्ट आएगी. इसके बाद सीटों का नए सिरे से आरक्षण तय होगा और मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) को दुरुस्त किया जाएगा. जब ये पूरी प्रक्रिया खत्म होगी, तब तक साल 2026 बीत चुका होगा और दहलीज पर खड़ा होगा 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव. ऐसे में विधानसभा चुनाव के बाद ही पंचायत चुनाव हो सकेंगे। 

यूपी में पंचायत चुनाव की तैयारी कर रहे भावी प्रधानों, बीडीसी सदस्यों और जिला पंचायत अध्यक्ष पद के दावेदारों को बहुत बड़ा झटका लगा है. चर्चा थी कि साल 2026 के मध्य तक पंचायत चुनाव का बिगुल फूंक दिया जाएगा, लेकिन अब जो सियासी और कानूनी समीकरण बने हैं, उसने साफ कर दिया है कि यूपी में पंचायत चुनाव अब 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे। 

योगी सरकार ने क्यों कदम पीछे खींच लिए?
योगी सरकार अगर समय रहते हुए पंचायत चुनाव करा सकती थी. लेकिन ओबीसी आयोग के गठन में देरी किए जाने के चलते मामला फंस गया. कोर्ट के हस्ताक्षेत्र के बाद ही योगी सरकार ने ओबीसी आयोग का गठन किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनाव को टालने के पीछे सिर्फ कानूनी पेच नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सियासी रणनीति भी है। 

मार्च 2027 में उत्तर प्रदेश में सत्ता का 'महामुकाबला' यानी विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल विधानसभा के फाइनल से ठीक पहले पंचायत चुनाव का भारी जोखिम नहीं उठाना चाहती है.  इसकी एक बड़ी वजह यह है कि पंचायत चुनाव के नतीजो को 2027 के चुनाव से जोड़ा जाता. साल 2021 के पंचायत चुनाव में बीजेपी को सपा से कड़ी टक्कर मिली थी और कई जिलों में निर्दलीयों का बोलबाला रहा था. योगी सरकार नहीं चाहती कि 2027 के मुख्य चुनाव से ऐन पहले किसी भी तरह का 'एंटी-इंकंबेंसी' या नकारात्मक संदेश जनता के बीच जाए। 

पंचायत चुनाव किसी पार्टी के सिंबल पर कम और स्थानीय रसूख, परिवार और चेहरे पर ज्यादा लड़े जाते हैं. एक-एक सीट पर बीजेपी या सपा के कई-कई कार्यकर्ता ताल ठोक देते हैं., अगर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले टिकट न मिलने पर कार्यकर्ता बागी हो गए, तो इसका सीधा नुकसान 2027 के मुख्य चुनाव में उठाना पड़ सकता है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पहले ही पंचायत चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। 

बीजेपी और सपा में शह-मात का खेल
योगी सरकार के इस कदम पर अब यूपी की सियासत गरमा गई है. मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि बीजेपी को अपनी जमीन खिसकने का अहसास हो गया है, इसलिए वो ओबीसी आरक्षण और सर्वे के बहाने चुनाव को टाल रही है. सरकार के ही सहयोगी दलों (जैसे ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद) के बयानों से भी पहले ही यह संकेत मिल रहे थे कि बिना पूरी तैयारी के चुनाव कराना मुमकिन नहीं है। 

उत्तर प्रदेश में अब 'गांव की सरकार' का फैसला, लखनऊ की 'बड़ी सरकार' बनने के बाद ही होगा. योगी सरकार ने बेहद चतुराई से कानूनी पेच का सहारा लेकर 2027 के सेमीफाइनल को टाल दिया है, ताकि पूरा फोकस सीधे फाइनल यानी विधानसभा चुनाव पर किया जा सके. अब देखना यह होगा कि गांवों के विकास पर इसका क्या असर पड़ता है और विपक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच कितना भुना पाता है। 

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