हाईकोर्ट सख्त! गिरिबाला की बेल खारिज, CBI को गिरफ्तारी की खुली छूट

भोपाल

 भोपाल के चर्चित ट्विशा शर्मा संदिग्ध मौत मामले में रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह पर गिरफ्तारी का खतरा मंडराने लगा है। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। कोर्ट ने बुधवार को कई घंटों की बहस के बाद देर रात आदेश जारी किया। जबलपुर हाईकोर्ट के जस्टिस देवनारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने पूर्व जज गिरिबाला सिंह को भोपाल को कोर्ट से मिली अग्रिम जमानत निरस्त कर दी। इसी के साथ अब CBI पूर्व जज गिरिबाला को कभी भी गिरफ्तार कर सकती है।

ट्विशा शर्मा के पिता नवनिधि शर्मा ने हाईकोर्ट में ​अग्रिम जमानत निरस्त करने की याचिका लगाई थी। मध्यप्रदेश सरकार ने भी पूर्व जज गिरिबाला पर सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया। बुधवार को दिन में पौने तीन घंटे की बहस के बाद रिजर्व किया गया हाईकोर्ट का ऑर्डर गुरुवार को रात्रि एक बजे के बाद बाहर आया। दरअसल, कोर्ट ने बुधवार को शाम पांच बजकर 20 मिनट पर ही साफ कर दिया था कि आदेश पारित करेंगे।

हाईकोर्ट में बुधवार की सुनवाई में सीबीआई ने दोनों मामलों में पक्षकार बनाए जाने और संशोधन के लिए आवेदन दायर किए, जिन्हें कोर्ट ने स्वीकार किया था। मामला ट्विशा सिंह की संदिग्ध मौत और दहेज प्रताड़ना से जुड़ा है।

ट्विशा की शादी नौ दिसंबर, 2025 को गिरिबाला सिंह के बेटे अधिवक्ता समर्थ सिंह से हुई थी। 12 मई, 2026 को ट्विशा की मौत फांसी पर लटकी अवस्था में हुई। बाद में कटारा हिल्स थाने में एफआईआर दर्ज हुई। 10वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भोपाल ने गिरिबाला सिंह को अग्रिम जमानत दी थी, जिसे चुनौती दी गई।

सास गिरिबाला सिंह के विरुद्ध भी स्पष्ट आरोप
हाई कोर्ट ने कहा कि वाट्सऐप चैट्स और गवाहों के बयानों में सास गिरिबाला सिंह के विरुद्ध भी स्पष्ट आरोप हैं। हाई कोर्ट ने यह भी माना कि जमानत मिलने के बाद आरोपित जांच में सहयोग नहीं कर रही थीं। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि जमानत आदेश तथ्यों की अनदेखी पर आधारित हो तो उसे निरस्त किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा ने 15 मई, 2026 को दी गई अग्रिम जमानत को निरस्त करते हुए आदेश दिया। दोनों याचिकाएं स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत निरस्त कर दी।

पूर्व जज को गिरफ्तार कर सकेगी CBI
हाईकोर्ट के आदेश के बाद पूर्व जज गिरिबाला सिंह को गिरफ्तार किया जा सकेगा। मामले की जांच कर रही CBI उन्हें कभी भी गिरफ्तार कर सकती है।

12 मई की रात हुई थी ट्विशा की संदिग्ध हालात में मौत

12 मई की रात भोपाल के कटारा हिल्स में ट्विशा की संदिग्ध हालात में मौत हुई थी। ससुराल पक्ष इसे आत्महत्या बता रहा है, जबकि मायके पक्ष ने पति और ससुराल वालों पर हत्या का आरोप लगाया है।

24 मई को भोपाल AIIMS में दिल्ली AIIMS की टीम ने ट्विशा की डेड बॉडी का दोबारा पोस्टमॉर्टम किया। इसके बाद शाम को मौत के 12 दिन बाद भदभदा श्मशान घाट में ट्विशा का अंतिम संस्कार किया गया। भाई मेजर हर्षित ने उन्हें मुखाग्नि दी।

आरोपियों ने ट्विशा की छवि खराब करने की कोशिश की
हाईकोर्ट कोर्ट ने कहा कि आरोपी पक्ष ने जांच में पूरा सहयोग भी नहीं किया। आरोपी ने मीडिया में बयान देकर ट्विशा की छवि खराब करने की कोशिश की, जो जांच को प्रभावित करने वाला व्यवहार माना जा सकता है। मामले की जांच CBI को सौंप दी गई है, इसलिए जांच एजेंसी को पक्षकार बनाना जरूरी है।

चोटें केवल शव को नीचे उतारने के दौरान नहीं आई थीं
कोर्ट ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि शरीर पर फांसी के अलावा अन्य चोटों के निशान भी पाए गए थे। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार ये चोटें केवल शव को नीचे उतारने के दौरान नहीं आई थीं। इसी बिंदु को अदालत ने मामले में महत्वपूर्ण माना और कहा कि इन परिस्थितियों में गहन जांच की आवश्यकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्विशा शर्मा के परिवार और अन्य गवाहों के बयानों में स्पष्ट रूप से आरोप लगाए गए हैं कि सास और पति उस पर गर्भपात का दबाव डाल रहे थे। साथ ही दहेज की मांग और मानसिक प्रताड़ना के आरोप भी लगातार सामने आए हैं।

कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह मान लिया था कि केवल विवाह के सात साल के भीतर हुई मौत के आधार पर अग्रिम जमानत खारिज नहीं की जा सकती। ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना था कि आरोपी पक्ष ट्विशा के खाते में पैसे भेजता था।

व्हाट्सऐप चैट्स में मुख्य शिकायत पति के खिलाफ दिखाई देती है। इन्हीं आधारों पर अग्रिम जमानत दी गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड और सबूतों की गहराई से जांच करने पर अलग तस्वीर सामने आती है।

हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत पर क्या-क्या कहा ?

    जमानत देना मामले की गंभीरता के हिसाब से सही नहीं था।
    ट्रायल कोर्ट ने केस डायरी और साक्ष्यों पर ठीक से विचार नहीं किया।
    आरोपी पक्ष चोटों का सही जवाब नहीं दे पाया।
    आरोपी पक्ष ने जांच में पूरा सहयोग नहीं किया।
    मीडिया में बयान देकर ट्विशा की छवि खराब करने की कोशिश।
    पोस्टमॉर्टम में फांसी के अलावा भी चोटें मिलीं।
    ये चोटें सिर्फ शव उतारने से नहीं हो सकतीं।
    गवाहों ने गर्भपात का दबाव और दहेज प्रताड़ना के आरोप लगाए।
    अग्रिम जमानत केवल खास हालात में दी जानी चाहिए।

आखिर में क्या बोला हाईकोर्ट?
अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की गंभीरता, उपलब्ध साक्ष्य और जांच की मौजूदा स्थिति को देखते हुए 15 मई 2026 को दी गई अग्रिम जमानत न्यायोचित नहीं थी। इसी के साथ कोर्ट ने 10वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, भोपाल द्वारा दिया गया अग्रिम जमानत आदेश रद्द (Quash) कर दिया और दोनों याचिकाएं स्वीकार कर लीं।

CBI और राज्य सरकार की दलीलें
    गर्भावस्था के बाद पति और सास ने ट्विशा पर चरित्र को लेकर शक किया।
    गर्भपात कराने का दबाव बनाया गया, जिसका उल्लेख व्हाट्सऐप चैट्स में है।
    ट्विशा ने अपने परिवार को लगातार मानसिक प्रताड़ना की जानकारी दी थी।
    आरोपी प्रभावशाली हैं और जांच को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।
    मामले की गंभीरता को देखते हुए हिरासत में पूछताछ (custodial interrogation) जरूरी है।

ट्विशा के पिता के वकील की दलीलें
    व्हाट्सऐप चैट्स में स्पष्ट है कि ट्विशा को मानसिक प्रताड़ना दी जा रही थी।
    पति गर्भ में पल रहे बच्चे पर शक करता था और गर्भपात का दबाव डालता था।
    ट्विशा ने कई बार मायके ले जाने की गुहार लगाई थी।
    परिवार को जांच और घटना की पूरी जानकारी नहीं दी गई।
    ट्रायल कोर्ट ने केस डायरी और महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर ठीक से विचार नहीं किया।
    CCTV फुटेज से छेड़छाड़ और जल्दबाज़ी में जमानत देने का आरोप।

आरोपी पक्ष की दलीलें
    ट्विशा ने आत्महत्या की थी।
    घटना के बाद उसे तुरंत एम्स ले जाया गया था।
    पुलिस ने उसी दिन मोबाइल और DVR जब्त कर लिए थे, इसलिए सहयोग न करने का आरोप गलत है।
    व्हाट्सऐप चैट्स में मुख्य आरोप पति पर हैं, सास पर नहीं।
    अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए असाधारण परिस्थितियां आवश्यक हैं, जो इस मामले में नहीं हैं।

आदेश के बाद मामले में क्या हो सकता है?

1. अग्रिम जमानत खत्म मानी जाएगी
हाईकोर्ट ने 15 मई 2026 को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। इसका मतलब है कि अब आरोपी गिरिबाला सिंह को गिरफ्तारी से मिलने वाली कानूनी सुरक्षा नहीं रहेगी।

2. CBI अब तेजी से आगे की कार्रवाई कर सकती है
चूंकि मामले की जांच अब CBI को सौंप दी गई है, इसलिए एजेंसी आगे कई अहम कदम उठा सकती है। इसमें आरोपी से पूछताछ, हिरासत में पूछताछ, मोबाइल चैट्स और डिजिटल सबूतों की जांच, CCTV फुटेज की पड़ताल, पोस्टमॉर्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट का गहराई से विश्लेषण शामिल हो सकता है।

3. गिरफ्तारी की संभावना बढ़ गई है
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि मामला गंभीर है और जांच अभी शुरुआती चरण में है। अदालत ने यह भी माना कि आरोपी पक्ष जांच में पूरा सहयोग नहीं कर रहा था। ऐसे में CBI आरोपी की गिरफ्तारी कर सकती है।

4. सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता खुला है
आरोपी पक्ष के पास अब भी सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार रहेगा। वे वहां स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल कर सकते हैं। साथ ही हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने और दोबारा जमानत देने की मांग भी कर सकते हैं।

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