UP में राज्यसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज, टिकटों पर मंथन और नए चेहरों की तलाश

लखनऊ 

उत्तर प्रदेश की सियासत में आने वाले दिन बेहद सरगर्मियों से भरे रहने वाले हैं. अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से ठीक पहले राज्य में राज्यसभा की 10 सीटों पर चुनाव होंगे. राज्यसभा चुनाव ने राज्य की राजनीतिक हलचल को चरम पर पहुंचा दिया है. इस चुनाव को केवल संसद के ऊपरी सदन का समीकरण बदलने के तौर पर नहीं, बल्कि 2027 के महामुकाबले से पहले भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच सेमीफाइनल के रूप में देखा जा रहा है. जिन 10 सांसदों का कार्यकाल पूरा हो रहा है, उनमें भाजपा के हरदीप सिंह पुरी, अरुण सिंह, बृजलाल, नीरज शेखर, सीमा द्विवेदी, गीता शाक्य, बनवारी लाल वर्मा और दिनेश शर्मा शामिल हैं. वहीं समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव और रामजी गौतम का कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है। 

आइए समझते हैं कि इस बार उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों का पूरा गणित क्या है, किसका पत्ता साफ होने जा रहा है और दोनों दल किस रणनीति पर काम कर रहे हैं. भाजपा के मौजूदा सांसदों में से कई ऐसे चेहरे हैं जिनका कार्यकाल खत्म हो रहा है, लेकिन पार्टी को दोबारा राज्यसभा भेजना मजबूरी है. हालांकि, पार्टी इस बार कई नए चेहरों को मौका देने की तैयारी में भी है. इससे कुछ मौजूदा सांसदों का पत्ता साफ होना लगभग तय माना जा रहा है. वहीं, समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव भी इस बार कम से कम दो नए वफादारों जिसमें पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक चेहरों को दिल्ली भेजने की तैयारी में हैं। 

राज्यसभा की 10 सीटों के लिए किसका दावा कितना मजबूत?
विधानसभा में वर्तमान संख्या बल को देखें तो भाजपा और उसके सहयोगियों के पास करीब 290 विधायक हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के पास लगभग 102 विधायक हैं. ऐसे में गणित भाजपा के पक्ष में दिखाई देता है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा 8 सीटें जीतने की रणनीति पर काम कर सकती है, जबकि सपा के लिए 2 सीटें सुरक्षित मानी जा रही हैं. सबसे ज्यादा चर्चा उन नेताओं को लेकर है जिनकी दोबारा राज्यसभा वापसी हो सकती है. केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और और पूर्व आईपीएस बृजलाल के नाम फिर से चर्चा में हैं. जबकि, संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले अरुण सिंह का पत्ता कट सकता है. बीजेपी सामाजिक समीकरणों और 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति को ध्यान में रखते हुए कई नए चेहरों को भी मौका दे सकती है। 

संख्याबल और संभावित जीत

यूपी विधानसभा में 403 सदस्य हैं.
एनडीए (बीजेपी + सहयोगी): 290-294 MLAs
सपा + सहयोगी: 103-105 (सपा 101-102 + कांग्रेस 2)
अन्य बसपा 1, JD(L) आदि, कुछ खाली

एक सीट जीतने के लिए लगभग 37 वोट चाहिए. ऐसे में मौजूदा गणित के आधार पर बीजेपी/एनडीए 7-8 सीटें आसानी से जीत सकती हैं. सपा 2 सीटें और अधिकतम 3 जीत सकती हैं, अगर बागी न हों और गठबंधन मजबूत हो। 

सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपने कोर ‘PDA’ फॉर्मूले को मजबूत करने के लिए किसी बड़े अति-पिछड़े या दलित चेहरे को उच्च सदन भेज सकते हैं. वहीं बीजेपी भी पश्चिम से लेकर पूर्व तक के जातीय संतुलन को साधने वाले नेताओं पर दांव लगाएगी. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह राज्यसभा चुनाव दोनों पार्टियों के लिए नाक का सवाल बन चुका है. जो भी पार्टी उम्मीद से ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब होगी, वह राज्य में यह नैरेटिव बनाने में सफल रहेगी कि ‘हवा’ उसके पक्ष में बह रही है. बगावत या क्रॉस वोटिंग के जरिए यदि किसी दल ने दूसरे को पटखनी दी, तो विरोधी खेमे के कैडर का मनोबल टूट जाएगा। 

बीजेपी और सपा का सीट गणित
उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायकों की मौजूदा संख्या के आधार पर ही राज्यसभा की इन 10 सीटों का फैसला होगा. एक राज्यसभा सीट को जीतने के लिए तय प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता होती है. बीजेपी अपने मजबूत संख्याबल और सहयोगी दलों जैसे रालोद, सुभासपा, अपना दल के दम पर कम से कम 7 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है. पार्टी इसके लिए अतिरिक्त वोटों का इंतजाम करने और विपक्षी खेमे में सेंधमारी की रणनीति पर भी काम कर सकती है. वहीं समाजवादी पार्टी के पास पिछले चुनावों के मुकाबले विधायकों की संख्या बेहतर है. कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद सपा आसानी से 3 सीटें अपने दम पर जीतने की स्थिति में है. यदि विपक्ष एकजुट रहता है और कुछ असंतुष्ट विधायक साथ आते हैं, तो सपा चौथी सीट के लिए भी कड़ा मुकाबला पेश करेगी। 

किसका चमकेगा भाग्य और किसका कटेगा टिकट?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इस बार दोनों ही दल किसी भी ऐसे चेहरे को दोबारा मौका नहीं देना चाहेंगे जो आगामी विधानसभा चुनाव में जमीन पर जातीय या क्षेत्रीय समीकरणों को फिट न बैठता हो. जो नेता पिछले कुछ समय से संगठन में निष्क्रिय रहे हैं या जिनका स्थानीय स्तर पर विरोध है, उनका टिकट कटना तय माना जा रहा है. बीजेपी कुछ बुजुर्ग नेताओं को मार्गदर्शक मंडल या संगठन में भेजकर नए और युवा चेहरों को मैदान में उतार सकती है। 

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