राजस्थान यूनिफॉर्म सिविल कोड: शादी, तलाक और संपत्ति नियमों में बड़े बदलाव की संभावना

जयपुर
जयपुर की एक बुजुर्ग महिला वर्षों से अपने पैतृक घर के एक हिस्से पर हक की लड़ाई लड़ रही है। दूसरी तरफ, एक युवती अदालतों के चक्कर काटते हुए यह साबित करने में लगी है कि शादी के बाद भी उसे बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए। कहीं एक महिला अपने पति की दूसरी शादी के खिलाफ न्याय चाहती है, तो कहीं लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाला एक जोड़ा सामाजिक पहचान की तलाश में है।

अब राजस्थान में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता की तैयारी के साथ इन तमाम कहानियों का भविष्य बदल सकता है।

सरकार ने बढ़ाया पहला बड़ा कदम
राज्य सरकार ने यूसीसी लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित कमेटी कानून का मसौदा तैयार करेगी। लेकिन यह सिर्फ एक नया कानून नहीं होगा, बल्कि राजस्थान के करोड़ों लोगों की निजी जिंदगी को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा सामाजिक बदलाव साबित हो सकता है।

शादी के नियमों में बड़ा बदलाव
अगर यूसीसी लागू होती है तो सबसे बड़ा असर विवाह व्यवस्था पर दिखाई देगा। प्रदेश में किसी भी धर्म का व्यक्ति एक से ज्यादा शादी नहीं कर सकेगा। अभी अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू हैं, लेकिन नए कानून के बाद विवाह के नियम एक समान हो सकते हैं। इसका मतलब यह होगा कि शादी केवल सामाजिक या धार्मिक रस्म नहीं रहेगी, बल्कि कानूनी रूप से पंजीकृत संबंध बन जाएगी।

महिलाओं को मिल सकती है नई ताकत
विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे महिलाओं की स्थिति मजबूत होगी। आज भी कई मामलों में महिलाएं दूसरी शादी, भरण-पोषण और वैवाहिक अधिकारों को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ती हैं। एक समान कानून इन विवादों को कम कर सकता है। महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए अलग-अलग कानूनों की व्याख्या पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

बेटियों के अधिकारों की नई कहानी
यूसीसी का दूसरा बड़ा प्रभाव संपत्ति के अधिकारों पर पड़ सकता है। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में आज भी कई परिवारों में बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हिस्सा देने को लेकर अनिच्छा दिखाई देती है। हालांकि कानून पहले से अधिकार देता है, लेकिन व्यवहार में स्थिति अलग है। यूसीसी लागू होने के बाद संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर एक समान व्यवस्था बनने की संभावना है, जिससे बेटा और बेटी दोनों के अधिकारों को और स्पष्ट कानूनी मजबूती मिल सकती है।

लिव-इन रिलेशनशिप भी आएंगे कानूनी दायरे में
लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार ऐसे संबंधों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया जा सकता है। समर्थकों का कहना है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकार सुरक्षित होंगे, जबकि आलोचक इसे निजी जीवन में सरकारी दखल के रूप में देखते हैं। लेकिन इतना तय है कि पहली बार ऐसे रिश्ते कानूनी बहस के केंद्र में आ जाएंगे।

शादी और तलाक का रिकॉर्ड बनेगा जरूरी
शादी और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण भी आम लोगों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाएगा। आज भी प्रदेश में हजारों विवाह केवल सामाजिक और धार्मिक स्तर पर संपन्न होते हैं, जिनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं होता। बाद में संपत्ति, पहचान, भरण-पोषण या वैवाहिक विवादों के दौरान यही सबसे बड़ी समस्या बन जाती है। रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होने से ऐसे विवादों में कमी आ सकती है

परंपराओं और कानून के बीच संतुलन की चुनौती
हालांकि यूसीसी का रास्ता पूरी तरह आसान नहीं होगा। राजस्थान की सामाजिक संरचना बेहद विविध है। यहां अलग-अलग धर्म, समुदाय और परंपराएं सदियों से साथ-साथ चलती रही हैं। ऐसे में नया कानून लागू होने पर कई सवाल भी उठेंगे। क्या सभी समुदाय इसे समान रूप से स्वीकार करेंगे? क्या पारंपरिक रीति-रिवाजों और आधुनिक कानूनी व्यवस्था के बीच संतुलन बन पाएगा? यही वह चुनौती है जिस पर गठित कमेटी को सबसे ज्यादा काम करना होगा।

जनजातीय समुदायों के लिए अलग व्यवस्था संभव
सरकार ने संकेत दिए हैं कि स्थानीय जनजातीय समुदायों को उनकी सांस्कृतिक और संवैधानिक विशेषताओं के आधार पर नए कानून के दायरे से बाहर रखा जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो राजस्थान में यूसीसी का स्वरूप अन्य राज्यों से कुछ अलग भी हो सकता है।

दूसरे राज्यों के अनुभवों पर भी नजर
उत्तराखंड पहले ही यूसीसी लागू कर चुका है। गुजरात और असम भी इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। अब राजस्थान इस बहस का नया केंद्र बनने जा रहा है। लेकिन यहां सवाल सिर्फ कानून का नहीं है। सवाल उन महिलाओं का है जो बराबरी चाहती हैं। उन बेटियों का है जो अपने हिस्से का सम्मान मांगती हैं। उन परिवारों का है जो वर्षों से अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं के बीच उलझे हुए हैं।

विधानसभा से घर-घर तक पहुंचेगी बहस
आने वाले महीनों में जब कमेटी अपनी रिपोर्ट देगी और विधानसभा में इस पर बहस होगी, तब सिर्फ एक विधेयक पर चर्चा नहीं होगी। चर्चा इस बात पर होगी कि क्या राजस्थान अपनी सामाजिक संरचना में एक ऐसा बदलाव स्वीकार करने के लिए तैयार है, जो लोगों के निजी जीवन, पारिवारिक रिश्तों और अधिकारों की परिभाषा को नए सिरे से लिख सकता है।

एक कानून से कहीं बड़ी कहानी
फिलहाल यूसीसी एक प्रस्ताव है, लेकिन इसकी आहट ने प्रदेश में एक नई बहस शुरू कर दी है। यह बहस अदालतों से निकलकर घरों तक पहुंच चुकी है। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी कहानी है। आने वाले समय में यह तय होगा कि यूसीसी केवल कानून बनकर रह जाती है या फिर राजस्थान के सामाजिक इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत करती है।

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