मैहर बैंड की संगीत परंपरा को जीवंत रखने और भावी पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाने के उद्देश्य से गुरुकुल की हो रही स्थापना

भोपाल

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की गहरी सांस्कृतिक अभिरुचि और प्रदेश की अनमोल धरोहरों को वैश्विक पटल पर स्थापित करने के दृढ़ संकल्प के फलस्वरूप मध्यप्रदेश की संगीत विरासत को एक और ऐतिहासिक गौरव प्राप्त हुआ है। माँ शारदा की नगरी की धरोहर और विश्वविख्यात 'मैहर वाद्यवृंद' (मैहर बैंड) को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) की सूची में सम्मिलित कर लिया गया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव की लोक-संस्कृति और कलाओं को अक्षुण्ण रखने की नीति के अंतर्गत संस्कृति विभाग द्वारा उठाए गए प्रभावी कदमों का ही यह सुखद परिणाम है। अपर मुख्य सचिव संस्कृति, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व और सामान्य प्रशासनशिव शेखर शुक्ला ने मैहर बैंड के प्रतिभावान कलाकारों एवं शासकीय संगीत महाविद्यालय, मैहर को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं प्रेषित की हैं। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहरों में से 'भगोरिया नृत्य' और 'गोंड चित्रकला' को भी इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सूची में स्थान मिल चुका है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की कला-संस्कृति के प्रति अनुराग के अनुरूप प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने के लिए संस्कृति विभाग द्वारा निरंतर कार्य किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में विभाग की इस सांस्कृतिक यात्रा में पूर्व में सात 'गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड' भी प्राप्त हो चुके हैं। मैहर बैंड की इस अनूठी संगीत परंपरा को जीवंत रखने और आगामी पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग द्वारा शासकीय संगीत महाविद्यालय, मैहर के माध्यम से एक 'गुरुकुल' की स्थापना भी की जा रही है। इस गुरुकुल पद्धति से प्रशिक्षित होकर युवा कलाकार मैहर बैंड के अनूठे संगीत, रागों और इसकी गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा को और अधिक समृद्ध कर सकेंगे।

'मैहर बैंड' का गौरवशाली इतिहास

स्वर और साधना के अद्भुत संगम 'मैहर बैंड' का इतिहास बेहद गौरवशाली और अनूठा है। इसकी स्थापना वर्ष 1918 में महान संगीत मनीषी उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब ने मैहर रियासत के तत्कालीन महाराजा बृजनाथ सिंह जूदेव की प्रेरणा से की थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में यह विश्व का पहला ऐसा शास्त्रीय वाद्यवृंद (ऑर्केस्ट्रा) है, जिसने संगीत प्रेमियों को एक नए वितान से परिचित कराया। बीते 108 वर्षों के अपने सुदीर्घ और यशस्वी सफर में इस बैंड ने अपनी मौलिकता और शास्त्रीय गरिमा को जीवंत रखा है। धरोहर के रूप में इसके कलाकारों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस अनमोल वाद्यवृंद की परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ संजोकर रखा है। मैहर बैंड की सबसे बड़ी विशेषता इसके दुर्लभ वाद्ययंत्र और उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब द्वारा तैयार की गई विशेष शास्त्रीय बंदिशें हैं। इस वाद्यवृंद में सितार, सरोद, इसराज, वायलिन, चेलो, सितार-बैंजो, हारमोनियम और तबला जैसे पारंपरिक एवं पाश्चात्य वाद्यों का अनूठा मेल है। इनमें सबसे अनोखा और मुख्य आकर्षण 'नलतरंग' है। खाँ साहब ने बंदूक की नालियों (बैरल) को काटकर, उन्हें कलात्मक ढंग से स्वरबद्ध कर 'नलतरंग' जैसे अद्भुत और मधुर शास्त्रीय वाद्य का आविष्कार किया था। पूरी दुनिया में मैहर बैंड के अलावा यह वाद्य कहीं और नहीं पाया जाता, जो वैश्विक संगीत जगत में कौतूहल और आकर्षण का केंद्र है।

मैहर वाद्यवृंद की राष्ट्रीय ख्याति का शंखनाद वर्ष 1924 में लखनऊ के केसर बाग में आयोजित प्रतिष्ठित 'भातखंडे समारोह' से हुआ था, जहाँ इसकी अद्वितीय प्रस्तुति ने समूचे भारतवर्ष को चमत्कृत कर दिया था। तब से लेकर आज तक इस बैंड ने देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित संगीत मंचों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। संगीत और कला के प्रति इसके अमूल्य योगदान को देखते हुए मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा वर्ष 2016 में इसे सर्वोच्च 'शिखर सम्मान' से भी विभूषित किया जा चुका है। वर्तमान में संस्कृति विभाग के संरक्षण में यह वाद्यवृंद भारतीय शास्त्रीय संगीत की अनवरत बहती रसधारा के रूप में विश्व पटल पर मध्यप्रदेश का मस्तक ऊंचा कर रहा है।

 

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