तीजन बाई की सफलता की कहानी, पुरुष प्रधान मंच पर कपालिक शैली से रचा इतिहास

दुर्ग.

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव के साधारण परिवार में 8 अगस्त 1956 को तीजन बाई का जन्म हुआ। उन्होंने बचपन में नाना बृजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनकर पंडवानी सीखनी शुरू की। हालांकि, फिर उमेद सिंह देशमुख से उन्होंने विधिवत प्रशिक्षण लिया।

स्वभाव के विपरीत उन्हें शांत बैठकर पारंपरिक वेदमती शैली में गाना पसंद नहीं था। ऐसे में उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाली खड़े होकर गाने वाली कपालिक शैली को चुना। पद्म विभूषण तीजन बाई कपालिक शैली में गाने वाली पहली महिला पंडवानी गायिका थीं। 7 दशक पहले तक यह शैली एक तरह से लगभग पुरुषों के वर्चस्व वाली थी या यूं कहें कि महिलाओं के लिए वर्जित मानी जाती थी।

13 वर्ष की उम्र में पहले कार्यक्रम के मिले थे 10 रुपए
महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने दुर्ग जिले के चंद्रखुरी गांव में पहला सार्वजनिक कार्यक्रम किया, जिसके लिए उन्हें 10 रुपए पारिश्रमिक मिला था। लोगों के ताने और विरोध के बीच कपालिक शैली में अपने हाव-भाव और अभिनय से अपनी एक अलग पहचान बनाई।

भारत एक खोज में महाभारत के अंशों की दी थी प्रस्तुति
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने भारत एक खोज में महाभारत से जुड़े अंशों की प्रस्तुति दी थी। उनका अधिकांश गायन मंचीय प्रस्तुतियों और महाभारत के प्रसंगों पर आधारित रहा है। हालांकि, भारत सरकार, संगीत नाटक अकादमी या तीजन बाई ने कभी कार्यक्रमों की संख्या सार्वजनिक नहीं की।

इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी समेत कई देशों में पहुंचाई कला
1980 के दशक से उन्होंने भारत के लगभग सभी राज्यों में अपनी प्रस्तुतियां दीं। साथ ही, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, तुर्की, ट्यूनीशिया, साइप्रस, रोमानिया, मॉरीशस समेत अनेक देशों में कार्यक्रम किए। हालांकि, उनके आखिरी विदेश या देश के कार्यक्रम की अधिकृत जानकारी नहीं है।

छत्तीसगढ़ का पंडवानी लोकगायन क्या है?
महाभारत की कथाओं पर आधारित पंडवानी शैली असल में सिर्फ छत्तीसगढ़ राज्य का पारंपरिक लोकगायन ही नहीं, बल्कि कथावाचन, लोकनाट्य और अभिनय का भी मिश्रण है। जिसे संवाद, हाव-भाव और संगीत के जरिए प्रस्तुत किया जाता है। 

पांडवों की कथा में गायन
पंडवानी का शाब्दिक अर्थ पांडवों की वाणी या पांडवों की कथा है। इसमें कलाकार भीम, अर्जुन, द्रौपदी, कर्ण और अन्य पात्रों के प्रसंगों का मंचन करता है। मुख्य कलाकार के हाथ में एकतारा और तंबूरा होता है। कुछ कलाकार भीम की गदा, अर्जुन के धनुष और कभी अन्य प्रतीकों के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं।

पंडवानी लोकगायन की वेदमती और कपालिक दो शैलियां
पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां हैं। जिसमें कलाकार वेदमती शैली बैठकर शांत ढंग से कथा गाकर सुनाता है। जबकि कपालिक शैली में कलाकार खड़े होकर अभिनय, संवाद, हाव-भाव और नाटकीय अंदाज में प्रस्तुति देता है। यह अधिक ऊर्जावान और प्रभावशाली शैली माती जाती है। 

ऋतु वर्मा, उषा बारले और शांतिबाई आगे बढ़ा रहीं कला
तीजन बाई ने परंपरा को तोड़ा। जिसके बाद कई अन्य महिला कलाकारों ने पंडवानी की कपालिक शैली को आगे बढ़ाया। इनमें मुख्य रूप से ऋतु वर्मा, उषा बारले और शांतिबाई चेलक शामिल हैं, जो लोककला का सफलतापूर्वक मंचन कर रही हैं।

यह प्रमुख पुरस्कार और सम्मान

  • पद्म श्री 1988 में मिला।
  • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 1995
  • मानद डी लिट 2003
  • पद्म भूषण 2003
  • एम.एस. सुब्बुलच्मी शताब्दी पुरस्कार 2016
  • फुकुओका पुरस्कार जापान 2018
  • पद्म विभूषण 2019
  • अकादमी रत्न संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप 2023

इनके अलावा कई राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

More From Author

यूपी में तीसरी जीत का लक्ष्य, सांसद-विधायकों को बूथ स्तर तक सक्रिय रहने की नसीहत

सीएम डॉ. यादव ने किया 2500 करोड़ की अडाणी डिफेंस यूनिट का शिलान्यास, जानें क्या-क्या होगा फायदा?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

RO No. 13843/161

city24x7.news founded in 2021 is India’s leading Hindi News Portal with the aim of reaching millions of Indians in India and significantly worldwide Indian Diaspora who are eager to stay in touch with India based news and stories in Hindi because of the varied contents presented in an eye pleasing design format.