जगन्नाथ मंदिर के रहस्य, जिन्हें विज्ञान भी आज तक नहीं समझ पाया

हिंदू धर्म में ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर को बैकुंठ धाम माना गया है. हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. इस बार जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार को शुरू होगी. इस मंदिर और रथ यात्रा से जुड़े कई ऐसे चमत्कार और रहस्य हैं, जिनका जवाब आज के आधुनिक विज्ञान और तकनीक के पास भी नहीं है. आइए जानते हैं महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की इस रथ यात्रा और मंदिर से जुड़े वो अनसुने रहस्य, जो आज भी वैज्ञानिकों को हैरान करते हैं.

मूर्तियों का अधूरा रहने का रहस्य
जगन्नाथ मंदिर में स्थापित मूर्तियां अन्य हिंदू मंदिरों की तरह पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि नीम की लकड़ी (दारु) से बनी हैं और ये अधूरी हैं. इनके हाथ-पैर नहीं हैं. इसके पीछे एक बेहद भावुक पौराणिक कथा है.

कथा के मुताबिक, राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु की मूर्ति बनाने के लिए देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा जी से प्रार्थना की. विश्वकर्मा जी एक वृद्ध मूर्तिकार के रूप में प्रकट हुए और एक शर्त रखी कि वे बंद कमरे में मूर्ति बनाएंगे और जब तक मूर्तियां पूरी नहीं हो जातीं, कोई कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा. कई दिनों तक कमरे से कोई आवाज नहीं आई, तो रानी गुंडिचा को चिंता हुई कि वृद्ध मूर्तिकार भूख-प्यास से मर न गया हो. राजा ने रानी के कहने पर दरवाजा खुलवा दिया. शर्त टूटने के कारण विश्वकर्मा जी अंतर्ध्यान हो गए और मूर्तियां वैसी ही अधूरी रह गईं. तब आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी रूप में धरती पर रहना चाहते हैं, और तब से आज तक भगवान जगन्नाथ इसी अधूरे लेकिन अत्यंत मनमोहक रूप में पूजे जाते हैं.

मंदिर के शिखर पर हवा के विपरीत लहराता ध्वज
यह एक ऐसा भौतिक विज्ञान का नियम है जिसे जगन्नाथ मंदिर पूरी तरह चुनौती देता है. आमतौर पर हवा जिस दिशा में चलती है, कपड़ा या झंडा उसी दिशा में लहराता है. जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा लाल रंग का ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है. ऐसा क्यों होता है, इसका रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया.

इस 45 मंजिला ऊंची इमारत के शिखर पर स्थित ध्वज को हर दिन एक पुजारी बिना किसी सुरक्षा उपकरण के उल्टा चढ़कर बदलता है. मान्यता है कि अगर एक दिन भी ध्वज नहीं बदला गया, तो मंदिर अगले 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा.

सुदर्शन चक्र की अनोखी बनावट
मंदिर के शिखर पर अष्टधातु से बना एक भव्य सुदर्शन चक्र स्थापित है, जिसे नीलचक्र भी कहा जाता है. आप पुरी के किसी भी कोने में खड़े होकर जब इस चक्र को देखेंगे, तो इसका मुख हमेशा आपकी तरफ ही दिखाई देगा. इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि हर दिशा से यह आपके सामने नजर आता है.

समुद्र की लहरों की आवाज का गायब होना
पुरी का मंदिर समुद्र के बिल्कुल किनारे स्थित है, इसलिए बाहर लहरों की बहुत तेज आवाज आती है. जैसे ही आप मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार यानी सिंहद्वार के अंदर अपना पहला कदम रखते हैं, समुद्र की लहरों की आवाज पूरी तरह से गायब हो जाती है. आप मंदिर के अंदर कदम रखते ही एक अजीब सी शांति महसूस करेंगे. लेकिन जैसे ही आप सिंहद्वार से एक कदम बाहर आएंगे, लहरों का शोर फिर से सुनाई देने लगेगा.

पक्षी और विमान का न उड़ना
आज के समय में दुनिया की गगनचुंबी इमारतों या एयरपोट्स के पास से पक्षियों और विमानों का गुजरना आम बात है. जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से आज तक न तो कोई पक्षी उड़ता हुआ देखा गया है और न ही कोई हवाई जहाज या हेलिकॉप्टर इसके ऊपर से गुजरता है. यह मंदिर प्राकृतिक रूप से एक नो-फ्लाई जोन बना हुआ है.

दुनिया की सबसे बड़ी रसोई और प्रसाद का रहस्य
जगन्नाथ मंदिर की रसोई में भगवान का महाप्रसाद बनाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तनों को एक के ऊपर एक रखा जाता है. चूल्हे पर रखे इन 7 बर्तनों में से सबसे ऊपर वाले बर्तन का खाना सबसे पहले पकता है, उसके बाद उसके नीचे वाले का, और सबसे अंत में सबसे नीचे वाले बर्तन का खाना पकता है जो सीधे आग के संपर्क में होता है.

मंदिर में हर दिन हजारों-लाखों भक्त आते हैं, लेकिन यहां का प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता. मंदिर बंद होने के समय पर प्रसाद अपने आप पूरा खत्म हो जाता है, अन्न का एक भी दाना व्यर्थ नहीं जाता.

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