योगी सरकार की बड़ी पहल, छोटे जिलों में भी हाई रिस्क गर्भवती महिलाओं को मिल रहा बेहतर इलाज

योगी सरकार की पहल से मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को मिली नई ताकत, अब छोटे जिलों में संभाले जा रहे हाई रिस्क केस

– सीएम योगी के निर्देश पर शुरू हुई आरआरटीसी योजना से हाई रिस्क प्रसव का स्थानीय स्तर पर सफल इलाज
 
– हैंड ऑन प्रशिक्षण के बाद डॉक्टर जटिल मामलों को रेफर करने के बजाय खुद कर रहे सुरक्षित उपचार
 
– सीतापुर में तीन महीने में 2,218 हाई रिस्क सहित सुरक्षित प्रसव, बिना रेफरल संभाले गए गंभीर केस 

लखनऊ, 
 योगी सरकार प्रदेश में मातृ मृत्यु दर कम करने व हर गर्भवती महिला को स्थानीय स्तर पर ही सुरक्षित प्रसव कराने के उद्देश्य से स्थानीय डॉक्टरों को हैंड आन ट्रेनिंग दे रही है, जिसका असर दिखने लगा है। ट्रेनिंग से मिले आत्मविश्वास से अब डॉक्टर हाई रिस्क वाले मामलों को रेफर नहीं कर रहे, बल्कि स्थानीय स्तर पर ही उनका इलाज कर रहे हैं। अब तक केजीएमयू व एएमयू के अधीन आने वाले आठ जिलों के डॉक्टरों को प्रशिक्षण देकर उनके कौशल का क्षमतावर्धन किया जा चुका है। अन्य जिलों के चिकित्सकों को बारी-बारी से ट्रेनिंग दिए जाने की तैयारी है। 

पहले चरण में प्रदेश के 20 मेडिकल कॉलेजों को आरआरटीसी सेंटर बनाया गया 
चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सचिव डॉ. पिंकी जोवल ने बताया कि प्रदेश में जिलास्तर पर डॉक्टर तो थे, लेकिन उनमें उच्च जोखिम (गंभीर एनिमिया, हाई ब्लड प्रेशर, शॉक, एंटी पार्टम हैमरेज, पोस्ट पार्टम हैमरेज, लंबी प्रसव पीड़ा, बाधित प्रसव) वाले केसों को संभालने का आत्मविश्वास नहीं था और वे ऐसे केसों को रेफर कर दिया करते थे। ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर वर्ष 2017 में रीजनल रिर्सोस एंड ट्रेनिंग सेटर (आरआरटीसी) कार्यक्रम डिजाइन किया गया और तय किया गया कि जच्चा-बच्चा का इलाज करने वाले जिलास्तरीय डॉक्टरों का क्षमता वर्धन किया जाए। पहले चरण में प्रदेश के 20 मेडिकल कॉलेजों को आरआरटीसी सेंटर बनाया गया और उनके माध्यम से आसपास के जिलों के डॉक्टरों के कौशल का क्षमतावर्धन किया गया। दूसरे चरण में अब हाईब्रिड माध्यम से डॉक्टरों का क्षमतावर्धन व हैण्ड आन प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

सीतापुर में पिछले तीन महीने में 2,218 सुरक्षित प्रसव कराए गये 
सीतापुर जिला महिला अस्पताल के प्रशिक्षण प्राप्त पांच डॉक्टर्स ने पिछले तीन महीने में 2,218 सुरक्षित प्रसव किये, जो प्रसव एक से एक हाई रिस्क वाले थे। किसी का हीमोग्लोबिन 2 मिलीग्राम, किसी का ब्लड प्रेशर 200 पार, किसी में प्रसव के दौरान की जटिलताएं आदि। इस पर न किसी को रेफर किया गया और न किसी सीनियर को फोन लगाया गया। खुद सभी केस संभाले और जच्चा-बच्चा दोनों की जिंदगी सुरक्षित की। महिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. कमलेश कुमारी ने बताया कि प्रशिक्षण बहुत ही व्यावहारिक है। हाई रिस्क के सभी कारणों (गंभीर एनिमिया, हाई ब्लड प्रेशर, एंटी पार्टम हैमरेज, लंबी प्रसव पीड़ा, बाधित प्रसव आदि) पर अलग- अलग प्रशिक्षण दिया गया। पहले इलाज के सारे तकनीकी पहलू बताए गए। उसके बाद विशेषज्ञों की मौजूदगी में इन हाईरिस्क केसों का इलाज किया गया और जहां पर चूक हो रही थी, वहां पर बताया गया। आज हम सभी डॉक्टर हर तरह के हाईरिस्क प्रसव को संभाल रहे हैं और बहुत मजबूरी में ही मरीज को रेफर करते हैं। 

वीरांगना अवंती बाई महिला अस्पताल में मातृ मृत्यु दर 80 से 90 प्रतिशत तक घटी
डॉ. कमलेश ने बताया कि प्रशिक्षण के बाद उनके अंदर भी मरीज की स्थिति देखकर जल्दी से फैसला लेने का आत्मविश्वास आया है और स्वयं कई गंभीर मरीजों को बचा पाईं। आज से पांच साल पहले जिला महिला अस्पताल में दिन भर में दो से तीन सीजेरियन प्रसव होते थे। अब औसतन 10 से 12 प्रसव रोजाना होते हैं। लोगों का सरकारी अस्पताल के प्रति इतना विश्वास बढ़ा है कि लखीमपुर, शाहजहांपुर, बरेली, बहराइच, गोण्डा व हरदोई तक से महिलाएं यहां प्रसव कराने आती हैं। मुख्य चिकित्सा अधीक्षिका डॉ. सुनीता कश्यप ने स्वीकारा कि ट्रेनिंग के बाद अस्पताल के डॉक्टरों में जच्चा-बच्चा को संभालने का विश्वास बढ़ा है। वीरांगना अवंती बाई महिला अस्पताल, लखनऊ के चिकित्सा अधिकारी डॉ. देशबंधु गुप्ता ने बताया कि उनके अस्पताल में 10 डॉक्टरों ने यह ट्रेनिंग की है और इसका सीधा फायदा यह दिखता है कि अस्पताल में मातृ मृत्यु दर 80 से 90 प्रतिशत तक घटी है। उन्होंने बताया कि व्यक्तिगत तौर पर अब वह दो-तीन मिनट में किसी भी केस में फैसला ले लेते हैं और मरीज का इलाज शुरू कर देते हैं। ट्रेनिंग के बाद आत्मविश्वास बढ़ा है। अब अंदर से विश्वास है कि कोई भी केस संभाल लूंगा। पहले सीनियर से पूछकर ही फैसले लेता था। 

हैण्ड ऑन प्रशिक्षण से डॉक्टरों का बढ़ा आत्मविश्वास
आरआरटीसी की नोडल अधिकारी डॉ. सीमा टंडन ने बताया कि गर्भवती महिलाओं का इलाज करने वाले प्रदेश के डॉक्टरों की क्षमतावर्धन करने व उनकी जानकारी को अपडेट करने के लिए यह कार्यक्रम 2017 में लागू किया गया था ताकि वे पोस्टपार्टम हैमरेज व एक्लम्पसिया जैसी जटिलताओं को स्थानीय स्तर पर संभाल सकें। हाईब्रिड माध्यम से केजीएमयू के अधीन आने वाले पांच जिलों सीतापुर, बहराइच, बलरामपुर, गोण्डा व श्रावस्ती के डॉक्टरों व अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अधीन आने वाले हाथरस, कासगंज व अलीगढ़ जिला अस्पताल के डाक्टरों को प्रशिक्षित किया गया। अब दूसरे मंडलों के डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई जा रही है। आरआरटीसी की मेंटर क्वीन मैरी अस्पताल की विभागाध्यक्ष डॉ. अंजू अग्रवाल ने कहा कि डॉक्टरों को हैण्ड आन प्रशिक्षण दिए जाने से निश्चित तौर पर उनमें आत्मविश्वास बढ़ा है और वे जटिल केस भी अपने जिलों में संभालने लगे हैं। पहले ऐसे बहुत से केस हमारे पास आते थे। उन्होंने कहा कि यह ट्रेनिंग सभी डॉक्टरों की होनी चाहिए। फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) से बहुत से मामले उनके अस्पताल आते हैं जिनका वहीं इलाज किया जा सकता है। बस डॉक्टरों में आत्मविश्वास आने की बात है। इसके बाद वे वहीं पर बहुत से जटिल केसों का इलाज कर लेंगे।

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