पकौड़ी विक्रेता की बेटी शिवानी साहू ने जर्मनी में हॉकी से बनाई पहचान

दौसा
दौसा जिले के छोटे से कस्बे मंडावर की मिट्टी से निकली एक बेटी आज जर्मनी के हॉकी मैदानों पर भारत का नाम रोशन कर रही है। जिस लड़की के गांव में कभी न खेल का मैदान था और न एस्ट्रोटर्फ, आज वही खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है। दौसा जिले के मंडावर की 23 वर्षीय शिवानी साहू … एक ऐसा नाम, जो आज जर्मनी की महिला रीजनल लीग में अपने खेल का दम दिखा रही है।

लेकिन इस सफलता की शुरुआत किसी बड़े शहर या आधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स से नहीं, बल्कि एक छोटे से गांव की मिट्टी से हुई। शिवानी ने प्राथमिक शिक्षा मंडावर में ही प्राप्त की। गांव में न हॉकी का मैदान था, न एस्ट्रोटर्फ और न ही खेल की आधुनिक सुविधाएं। बावजूद इसके उन्होंने हॉकी जैसे चुनौतीपूर्ण और महंगे खेल को अपना सपना बनाया।

साल 2013 में सामने आई प्रतिभा
साल 2013 में जर्मनी की हॉकी कोच एंड्रिया मंडावर के गढ़ हिम्मत सिंह क्षेत्र में खिलाड़ियों को तैयार करने पहुंचीं। उन्होंने आसपास के गांवों में प्रतिभाओं की तलाश शुरू की और वहीं से शिवानी की प्रतिभा दुनिया के सामने आई। शिवानी ने जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक शानदार प्रदर्शन किया। राजस्थान और महाराष्ट्र की जूनियर व सब-जूनियर टीमों का हिस्सा रहीं और राजस्थान की राष्ट्रीय टीम की कप्तानी भी की। साल 2019 में शिवानी का चयन मुंबई स्थित नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में प्रशिक्षण के लिए हुआ। यहां उन्होंने अपने खेल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

साल 2023 में भारतीय टीम का हिस्सा बनीं
महाराष्ट्र की ओर से राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेलते हुए दो कांस्य और एक रजत पदक जीता। पुणे विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते हुए भी कांस्य पदक अपने नाम किया। साल 2023 में शिवानी भारतीय टीम का हिस्सा बनीं। इसके बाद उन्होंने जर्मनी, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और भारत में कई अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले। भारतीय टीम में वह स्ट्राइकर की भूमिका निभाती हैं और अपनी तेज़ रफ्तार व आक्रामक खेल के लिए जानी जाती हैं। वर्तमान में शिवानी जर्मनी की महिला रीजनल लीग चैंपियनशिप में खेल रही हैं।
लेकिन इस सफलता के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी छिपी है।

पिता लगाते हैं पकौड़ी का ठेला
शिवानी के पिता सीताराम साहू मंडावर बस स्टैंड पर पकौड़ी का ठेला लगाकर परिवार चलाते थे। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। हॉकी स्टिक की कीमत करीब 20 हजार रुपये और जूते 10 हजार रुपये तक होते थे। शुरुआती दौर में यह सामान कोच की मदद से उपलब्ध कराया गया। आज हालात बदल चुके हैं। एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता खेलने पर शिवानी को चार से पांच लाख रुपये तक की राशि मिलती है। इसी बदलाव का परिणाम है कि जो पिता बस स्टैंड पर पकौड़ी के ठेला लगाते थे वे अब ऑयल मिल का व्यवसाय संचालित कर रहे हैं।

बच्चों को देती हैं हॉकी की ट्रेनिंग
खिलाड़ी होने के साथ-साथ शिवानी अब जर्मनी में सुबह-शाम खुद अभ्यास करती हैं और दोपहर में 20 से 25 बच्चों को हॉकी प्रशिक्षण भी देती हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय होती है। उन्होंने बैचलर ऑफ फिजिकल एजुकेशन की पढ़ाई पूरी कर ली है। अब जर्मनी की एक यूनिवर्सिटी ने उन्हें लगभग 16 से 17 लाख रुपये लागत वाले मास्टर इन स्पोर्ट्स साइंस, एक्सरसाइज एंड साइकोलॉजी कोर्स के लिए पूर्ण छात्रवृत्ति की पेशकश की है। पढ़ाई के साथ अन्य खर्च भी विश्वविद्यालय वहन करेगा।

मंडावर की मिट्टी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय हॉकी तक का सफर आसान नहीं था। आर्थिक तंगी, संसाधनों की कमी और सुविधाओं के अभाव के बावजूद शिवानी साहू ने अपने सपनों को टूटने नहीं दिया। आज उनकी सफलता सिर्फ दौसा ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान की बेटियों के लिए यह संदेश है कि अगर इरादे मजबूत हों तो गांव की पगडंडियों से भी दुनिया के सबसे बड़े खेल मैदानों तक पहुंचा जा सकता है।

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