उच्च शिक्षा मंत्री परमार का बड़ा बयान: भारतीय दृष्टिकोण से जनजातीय अध्ययन को मिलेगी नई दिशा, विश्वविद्यालयों में मजबूत होंगे शोध

भारतीय दृष्टिकोण से जनजातीय अध्ययन को मिलेगी नई दिशा, विश्वविद्यालयों में सशक्त होंगे शोध एवं पाठ्यक्रम : उच्च शिक्षा मंत्री परमार

स्वतंत्रता संग्राम से लेकर वन संपदा संरक्षण तक, राष्ट्र निर्माण में जनजातीय समाज का योगदान अतुलनीय
मध्यप्रदेश भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय में जनजातीय अध्ययन संबंधी पाठ्यक्रम विकास पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

भोपाल 

उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार ने कहा कि जनजातीय समाज केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान ही नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और सभ्यता का जीवंत संरक्षक है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम, वन क्षेत्रों की सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखने में जनजातीय समाज का योगदान अतुलनीय रहा है। आवश्यकता है उनके इतिहास, ज्ञान, संस्कृति और जीवन-दर्शन को भारतीय दृष्टिकोण से शोध एवं शिक्षा की मुख्यधारा में प्रतिष्ठित किया जाए। मंत्री परमार गुरुवार को पलाश रेसीडेंसी स्थित सभागार में मध्यप्रदेश भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय द्वारा "जनजातीय अध्ययन संबंधी पाठ्यक्रम के विकास" विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।

उच्च शिक्षा मंत्री परमार ने कहा कि लंबे समय तक जनजातीय समाज पर हुआ अधिकांश लेखन औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित रहा, जिसके कारण अनेक भ्रांतियाँ और गलत धारणाएँ स्थापित हुईं। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में जनजातीय अध्ययन को नए सिरे से परिभाषित करते हुए उनके वास्तविक इतिहास, सांस्कृतिक वैभव, पारंपरिक ज्ञान और जीवन मूल्यों का प्रमाणिक दस्तावेजीकरण किया जाए। सभी को जनजातीय समाज के योगदान के राष्ट्रीय महत्व को समझने की आवश्यकता है।

मंत्री परमार ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षा को भारतीयता से जोड़ने का सशक्त माध्यम है। इसी भावना के अनुरूप विश्वविद्यालयों में ट्राइबल स्टडीज़ (Tribal Studies) के अंतर्गत रोजगारोन्मुखी, शोधपरक एवं बहुआयामी पाठ्यक्रम विकसित किए जाएँ, जिन्हें यूजीसी, यूपीएससी एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की आवश्यकताओं से भी जोड़ा जा सके। उन्होंने कहा कि जनजातीय अध्ययन के लिए पृथक अध्ययन केंद्र, उत्कृष्ट शोध, नवाचार और विषय विशेषज्ञों का सशक्त नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को जनजातीय अंचलों में जाकर स्थानीय समाज के बीच अध्ययन करना चाहिए तथा उनकी भाषा, लोक परंपराओं, कृषि पद्धतियों, लोक चिकित्सा, पर्यावरण संरक्षण, लोक कला और जीवन शैली का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण करना चाहिए। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से ही जनजातीय समाज के विकास का स्थायी मॉडल तैयार किया जा सकता है।

मंत्री परमार ने कहा कि जनजातीय युवाओं को केवल डिग्री तक सीमित न रखकर कौशल विकास, स्टार्टअप, उद्यमिता, प्लेसमेंट, इंटर्नशिप और शोध से जोड़ना होगा। विश्वविद्यालयों, जनजातीय कार्य विभाग, उद्योग जगत तथा स्थानीय समुदायों के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित कर ऐसे पाठ्यक्रम विकसित किए जाएँ, जो विद्यार्थियों को रोजगार एवं स्वरोजगार के लिए सक्षम बनाएँ।

मंत्री परमार ने कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में उपलब्ध वनोपज एवं स्थानीय उत्पादों के मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, विपणन और बाजार से जोड़ने की दिशा में भी विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। इससे जनजातीय समाज की आय में वृद्धि होगी और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को नई गति मिलेगी।

मंत्री परमार ने कहा कि देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर द्वारा प्रारंभ किए गए जनजातीय अध्ययन के पाठ्यक्रम अनुकरणीय हैं। मध्यप्रदेश भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय भी इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल कर रहा है तथा भविष्य में उज्जैन और जबलपुर सहित अन्य विश्वविद्यालयों में भी जनजातीय अध्ययन के पाठ्यक्रम प्रारंभ करने की योजना है। उन्होंने परिणाम आधारित शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण शोध, सतत मूल्यांकन तथा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम निर्माण पर विशेष बल दिया।

मध्यप्रदेश भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. मिलिंद दांडेकर ने कहा कि जनजातीय समाज पर अधिकांश अध्ययन विदेशी दृष्टिकोण से किए गए, जिसके कारण अनेक मिथक स्थापित हुए। भारतीय दृष्टि पर आधारित शोध एवं अध्ययन के माध्यम से इन भ्रांतियों को दूर करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जनजातीय अध्ययन का सुदृढ़ पाठ्यक्रम तैयार कर वास्तविक इतिहास एवं सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाएगा।

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई ने विश्वविद्यालय में संचालित जनजातीय अध्ययन के स्नातक, स्नातकोत्तर, एमबीए एवं पीएचडी कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया कि यह विश्वविद्यालय देश का पहला विश्वविद्यालय है, जिसने इस क्षेत्र में व्यापक शैक्षणिक कार्यक्रम प्रारंभ किए। उन्होंने जनजातीय समाज के बीच जाकर प्रत्यक्ष अध्ययन एवं शोध की आवश्यकता पर बल दिया।

प्रो. रविंद्र कान्हेरे ने कहा कि जनजातीय समाज की भाषा, संस्कृति, सामाजिक संरचना एवं स्थानीय आवश्यकताओं को समझे बिना विकास योजनाएँ अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकतीं। उन्होंने जनजातीय भाषाओं के संरक्षण, देवनागरी में उनके प्रलेखन, पेसा अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन तथा जनजातीय क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान पर विशेष बल दिया।

संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में "जनजातीय अध्ययन और शोध का स्थापित विमर्श : इमेज वर्सेस रियालिटी" विषय पर वनवासी कल्याण आश्रम, नागपुर के वैभव सुरंगे तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष हर्ष चौहान ने अपने विचार व्यक्त करते हुए भारतीय दृष्टिकोण पर आधारित जनजातीय अध्ययन एवं शोध को सशक्त बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए। इस अवसर पर विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलगुरु, विषय विशेषज्ञ, शिक्षाविद्, शोधार्थी एवं प्राध्यापकगण उपस्थित थे।

 

More From Author

विक्रम उद्योगपुरी में निवेश और रोजगार को मिलेगी नई गति

पैलेट गन पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- विशेष परिस्थितियों में इस्तेमाल का अधिकार; सरकार को इलाज कराने के निर्देश

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

RO No. 13910/15

city24x7.news founded in 2021 is India’s leading Hindi News Portal with the aim of reaching millions of Indians in India and significantly worldwide Indian Diaspora who are eager to stay in touch with India based news and stories in Hindi because of the varied contents presented in an eye pleasing design format.