सांची में अब 12 महीने बुद्ध के शिष्यों के पवित्र अवशेषों के दर्शन, केंद्र के निर्देश पर बढ़ी तैयारियां

 रायसेन
 भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्यों- सारिपुत्र और महामोग्गलान के सांची में रखे पवित्र अस्थि कलशों के दर्शन अभी वर्ष में केवल दो दिन होते हैं, लेकिन यह व्यवस्था बदलने वाली है। बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र इन अस्थि कलशों के दर्शन आम श्रद्धालुओं को वर्ष में प्रतिदिन कराने की तैयारी है। इसके लिए केंद्र सरकार के निर्देश पर राज्य सरकार ने इन पवित्र कलशों की संरक्षक महाबोधि सोसाइटी आफ श्रीलंका एंड सांची और रायसेन जिला प्रशासन को प्रस्ताव दिया है।

अब सालभर हो सकेंगे सारिपुत्र और महामोग्गलान के अस्थि कलशों के दर्शन
    भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्यों- सारिपुत्र और महामोग्गलान के सांची में रखे पवित्र अस्थि कलशों के दर्शन अभी वर्ष में केवल दो दिन होते हैं, लेकिन यह व्यवस्था बदलने वाली है। बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र इन अस्थि कलशों के दर्शन आम श्रद्धालुओं को वर्ष में प्रतिदिन कराने की तैयारी है। इसके लिए केंद्र सरकार के निर्देश पर राज्य सरकार ने इन पवित्र कलशों की संरक्षक महाबोधि सोसाइटी आफ श्रीलंका एंड सांची और रायसेन जिला प्रशासन को प्रस्ताव दिया है।

दरअसल, केंद्र सरकार चाहती है कि आम श्रद्धालुओं के साथ ही देश-विदेश से आने वालों के लिए इन अस्थि कलशों के दर्शन की व्यवस्था सदैव उपलब्ध रहे। हालांकि पवित्र अस्थि कलशों के धार्मिक-ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए महाबोधि सोसायटी इस प्रस्ताव पर अमल से पहले सुरक्षा व्यवस्था को लेकर निश्चिंत हो जाना चाहती है। इसके लिए सोसायटी की ओर से केंद्र और राज्य सरकार को लिखा गया है। वहीं, जिला प्रशासन अपने स्तर पर तैयारियां शुरू कर रहा है।

बता दें कि 1952 में इन अस्थि कलशों को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित सांची के चेतियागिरी बौद्ध विहार में रखा गया था, तब से इन्हें वर्ष में केवल नवंबर के आखिरी शनिवार-रविवार को ही तलघर से बाहर निकाला जाता रहा। इस दिन सांची में मेला लगता है और देश-विदेश से बौद्ध धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में दर्शन पूजन के लिए पहुंचते हैं।

थाईलैंड भी भेजे गए थे अस्थि कलश
2024 में पहली बार इन पवित्र अवशेषों को पहली बार देश से बाहर थाइलैंड भेजा गया था। इस साल उन्हें 10 दिन के लिए मंगोलिया भेजा गया था। भोपाल में पांच से आठ अगस्त तक हुए ब्रिक्स देशों के संस्कृति मंत्रियों के सम्मेलन के दौरान संस्कृति विभाग के आग्रह पर परंपरा तोड़कर इन अस्थि कलशों को बाहर निकाला गया था। सांची पहुंचे ब्रिक्स सम्मेलन के प्रतिनिधिमंडल ने उनके दर्शन किए।

इसलिए महत्वपूर्ण हैं बुद्ध के ये दो शिष्य
    सारिपुत्र: इनको बुद्ध का 'प्रज्ञा में सर्वोच्च' (अग्गपञ्ञा) शिष्य माना गया है। उनका मूल नाम उपतिस्स था। बौद्ध ग्रंथों में उन्हें धम्म के प्रमुख व्याख्याकार के रूप में चित्रित किया गया है। बुद्ध के परिनिर्वाण से पहले ही उनका निधन हो गया था।

    महामोग्गलान: (महामौद्गल्यायन) बुद्ध के दूसरे प्रमुख शिष्य थे। उनका मूल नाम मोग्गलान था। बौद्ध परंपरा उन्हें 'ऋद्धि/अलौकिक शक्तियों में सर्वोच्च' शिष्य मानती है। उन्हें ध्यान और आध्यात्मिक साधना में असाधारण उपलब्धियों के लिए जाना जाता है।

नेहरु-मुखर्जी की कोशिशों से सांची लौटी थी विरासत
    ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में सांची के स्तूप संख्या- तीन को सारिपुत्र और महामोग्गलान की स्मृति में बनाया गया था। इसमें उनके अस्थि कलश रखे थे। 1851 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संस्थापक जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम ने स्तूप की खुदाई की थी, तब यह अस्थि कलश मिले थे, उनको पहचाना गया था।

    1866 में इन पवित्र अवशेषों को इंग्लैंड के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में रख दिए गए। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु, महाबोधि सोसाइटी आफ इंडिया के तत्कालीन अध्यक्ष श्यामाप्रसाद मुखर्जी और महाबोधि सोसाइटी आफ श्रीलंका की कोशिशों से इन्हें इंग्लैंड से वापस लाकर पहले कोलंबो और 1952 में सांची के चेतियागिरी विहार में स्थापित कर दिया गया।

 

More From Author

Vande Mataram पर बड़ा बदलाव! 15 अगस्त को लाल किले पर गूंजेगा राष्ट्रगीत, नए कानून से मिली कानूनी सुरक्षा

Maruti Cars पर अगस्त ऑफर की बरसात! Grand Vitara, Baleno समेत इन कारों पर हजारों की बचत

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

RO No. 13944/210

city24x7.news founded in 2021 is India’s leading Hindi News Portal with the aim of reaching millions of Indians in India and significantly worldwide Indian Diaspora who are eager to stay in touch with India based news and stories in Hindi because of the varied contents presented in an eye pleasing design format.