China Tension: पड़ोसी देश की नई चाल से ड्रैगन परेशान, भारत को मिल सकता है बड़ा रणनीतिक फायदा

नई दिल्ली

पश्चिम एशिया में जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उनसे दुनिया के तमाम देश सतर्क हो गए हैं. जिस तरह से संप्रभु देश पर अटैक किए जा रहे हैं, उनसे अन्‍य देशों में डर का भाव पैदा हो रहा है. इसका असर ग्‍लोबल लेवल पर स्‍पष्‍ट तौर पर देखा जा सकता है. हथियार खरीदने या फिर उसे डेवलप करने पर इन्‍वेस्‍टमेंट काफी बढ़ चुका है. सालों से शांति और डिफेंसिव डिफेंस पॉलिसी (सुरक्षात्‍मक रक्षा नीति) पर चलने वाले देश भी अब अपने सिस्‍टम को दुरुस्‍त करने में जुट गए हैं. उनमें जापान का नाम सबसे टॉप पर है. दशकों से शांतिपूर्ण और डिफेंसिव अप्रोच वाली नीति पर चलने वाला जापान अब अपनी इस नीति से इतर चलता हुआ दिख रहा है. हाल में जापान की ओर से दो मिसाइलों का परीक्षण किया गया है. इनमें से एक मिसाइल की रेंज तो 1600 किलोमीटर बताई जा रही है. इससे इंडो-पैसिफिक रेंज में पावर बैलेंस की स्थिति बनने की संभावना प्रबल हो गई है. दूसरी तरफ, चीन के लिए यह खबर कतई अच्‍छी नहीं है, क्‍योंकि निकट भविष्‍य में उसकी मनमानियों पर रोक लग सकती है. सामरिक रूप से यह स्थिति भारत के लिए काफी अच्‍छी साबित हो सकती है, क्‍योंकि भारत और जापान के बीच ऐतिहासिक रूप से अच्‍छे संबंध हैं. भारत के बॉर्डर इलाके में चीन अपना नापाक मंसूबा समय-समय पर दिखाता रहा है, ऐसे में हिंद-प्रशांत में सैन्‍य रूप से मजबूत दोस्‍त के होने से तस्‍वीर बदल सकती है। 

जापान ने अपनी रक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देते हुए लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल सिस्‍टम्‍स के सफल परीक्षण किए हैं. ‘एशिया टाइम्‍स’ की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी टॉमहॉक (Tomahawk) क्रूज मिसाइल और स्वदेशी अपग्रेडेड टाइप-12 मिसाइल के परीक्षणों को केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि जापान की सैन्य रणनीति में बड़े परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है. अब तक केवल रक्षात्मक सैन्य नीति अपनाने वाला जापान धीरे-धीरे ऐसी क्षमता विकसित कर रहा है, जिससे वह दुश्मन के ठिकानों पर जवाबी हमला भी कर सके. यह बदलाव हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर किया जा रहा है. जुलाई के अंतिम सप्ताह में जापान के रक्षा मंत्रालय ने दो महत्वपूर्ण टेस्‍ट किए. पहला परीक्षण जापान मैरीटाइम सेल्फ-डिफेंस फोर्स (JMSDF) ने अमेरिकी नेवी के सहयोग से प्रशांत महासागर में किया, जिसमें कोंगो क्‍लास के एजिस डिस्‍ट्रॉयर जेएस चोकाई (JS Chokai) से टॉमहॉक लैंड-अटैक क्रूज मिसाइल दागी गई. इसके साथ ही जापान सतह पर तैनात वॉरशिप से टॉमहॉक मिसाइल का प्रक्षेपण करने वाला तीसरा विदेशी देश बन गया। 

900 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइल
दूसरा परीक्षण गिफू एयर बेस पर किया गया, जहां जापान एयर सेल्फ-डिफेंस फोर्स (JASDF) ने F-2 लड़ाकू विमान से अपग्रेडेड टाइप-12 एयर-लॉन्च मिसाइल का फ्लाइट टेस्‍ट शुरू किया. इस नई मिसाइल की मारक क्षमता 900 किलोमीटर से अधिक बताई जा रही है, जबकि भविष्य में विकसित किए जा रहे वेरिएंट की रेंज 1,600 किलोमीटर तक हो सकती है. इन हथियारों को कम रडार पहचान वाली, नेटवर्क आधारित और लंबी दूरी तक सटीक हमला करने वाली प्रणाली के रूप में विकसित किया जा रहा है। 

अमेरिका से 400 टॉमहॉक की खरीद
जापान फिलहाल अमेरिका से 400 टॉमहॉक मिसाइलें खरीद रहा है. इन्हें अंतरिम व्यवस्था के रूप में शामिल किया जाएगा, जबकि वित्त वर्ष 2027 तक स्वदेशी लंबी दूरी की स्टैंडऑफ मिसाइलों को सेवा में शामिल करने की योजना है. आधिकारिक तौर पर टोक्यो अभी भी अपनी रक्षात्मक नीति को बरकरार रखने की बात कहता है, लेकिन नई क्षमताओं को देखते हुए कई रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि जापान अब केवल हमले को रोकने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दुश्मन के सैन्य ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई करने में भी सक्षम होना चाहता है। 

चीन की मनमानी पर लगाम
इस बदलाव का सबसे अधिक असर चीन के साथ रणनीतिक संतुलन पर पड़ सकता है. हाल के महीनों में जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी द्वारा परमाणु हथियारों पर चर्चा की संभावना जताने और प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची द्वारा ताइवान को जापान की संप्रभुता से जुड़ा सुरक्षा मुद्दा बताए जाने के बाद बीजिंग की चिंताएं और बढ़ गई हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यदि जापान पहली बार हमला करने की क्षमता विकसित करता है, तो चीन भी अपनी परमाणु और सैन्य रणनीति में बदलाव कर सकता है, जिससे क्षेत्र में सामरिक अस्थिरता बढ़ने का खतरा रहेगा. हालांकि, केवल लंबी दूरी की मिसाइलें हासिल कर लेना पर्याप्त नहीं है. जापान के पास अभी स्वतंत्र ‘किल चेन’ यानी लक्ष्य की पहचान, निगरानी, हमला और नुकसान के आकलन की पूरी क्षमता नहीं है. इस पूरी प्रक्रिया के लिए वह अभी भी अमेरिकी खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) सिस्‍टम पर काफी हद तक निर्भर है. यदि किसी संकट के दौरान अमेरिका और जापान के बीच समन्वय में कमी आती है या चीन कम्‍यूनिकेशन और मॉनिटरिंग मेकेनिज्‍म को बाधित करने में सफल होता है, तो जापान की नई मिसाइल क्षमता का प्रभाव सीमित हो सकता है। 

जापान की चुनौतियां
जापान के सामने एक अन्य बड़ी चुनौती हथियारों के प्रोडक्‍शन और स्‍टोरेज की है. रक्षा विश्लेषकों के अनुसार देश का रक्षा उद्योग अभी सीमित उत्पादन क्षमता वाला है और कई महत्वपूर्ण पुर्जों के लिए विदेशों पर निर्भर है. अमेरिका में टॉमहॉक मिसाइलों के उत्पादन में तेजी लाने में भी कई वर्ष लग सकते हैं. वैश्विक संघर्षों और बढ़ती मांग के कारण इन मिसाइलों की आपूर्ति में लगभग 47 महीने तक का समय लग सकता है. इसके अलावा जापान ने F-35 लड़ाकू विमान, आधुनिक F-15 और एजिस वॉरशिप जैसे महंगे प्लेटफॉर्म पर अधिक निवेश किया है, जबकि पर्याप्त संख्या में मिसाइलों और इंटरसेप्टर का भंडार अभी भी चुनौती बना हुआ है। 

युद्ध पर क्‍या कहता है जापान का संविधान
रणनीतिक स्तर पर भी कई प्रश्न बने हुए हैं. जापानी संविधान और वॉर डिफेंस पॉलिसी के तहत सैन्य बल का उपयोग केवल आत्मरक्षा के लिए किया जा सकता है. सरकार का तर्क है कि यदि किसी सशस्त्र हमले के जवाब में न्यूनतम आवश्यक बल का प्रयोग किया जाए तो दुश्मन के क्षेत्र में हमला भी संवैधानिक हो सकता है. लेकिन विपक्षी दलों और सत्तारूढ़ गठबंधन के सहयोगी कोमेतो का कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि जवाबी कार्रवाई केवल वास्तविक हमले के बाद होगी या दुश्मन की तैयारी को भी हमले का आधार माना जाएगा. उनका तर्क है कि अस्पष्ट नियम भविष्य में पूर्व-निवारक हमलों का रास्ता खोल सकते हैं और जापान को अमेरिकी नेतृत्व वाले सैन्य अभियानों में अधिक गहराई से शामिल कर सकते हैं। 

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