भोपाल
शिक्षा, सामाजिक उद्यमिता, साहित्य, विज्ञान संचार और भारतीय भाषाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए संतोष चौबे को बाबू दिनेश सिंह विश्वविद्यालय, गढ़वा, झारखंड द्वारा मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया जाएगा। विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में 21 सितंबर 2026 को उन्हें यह सम्मान प्रदान किया जाएगा। समारोह विश्वविद्यालय के गुरुपद संभवन रामजी ऑडिटोरियम में आयोजित होगा।
विश्वविद्यालय की अकादमिक काउंसिल और गवर्निंग बॉडी ने शिक्षा, साहित्य, सामाजिक उद्यमिता, विज्ञान संचार और रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में चौबे के विशिष्ट योगदान को मान्यता देते हुए इस सम्मान के लिए उनका चयन किया है। विश्वविद्यालय के अनुसार, यह उपाधि उनके उल्लेखनीय योगदान और उपलब्धियों के प्रति सम्मान और सराहना का प्रतीक है।
शिक्षा और सामाजिक उद्यमिता के क्षेत्र में चार दशक से अधिक का योगदान
संतोष चौबे ने वर्ष 1985 में ऑल इंडिया सोसायटी फॉर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कंप्यूटर टेक्नोलॉजी (आईसेक्ट) की स्थापना की। इसका उद्देश्य शहरी और ग्रामीण भारत के बीच डिजिटल विभाजन को कम करना तथा शिक्षा और तकनीक की पहुंच को व्यापक बनाना था। उनके नेतृत्व में आईसेक्ट ने ग्रामीण, आदिवासी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में शिक्षा, कौशल एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण, तकनीकी शिक्षा और वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में व्यापक कार्य किया।
एनआईटी, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियर चौबे ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव और सशक्तीकरण के माध्यम के रूप में आगे बढ़ाया। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उनके मार्गदर्शन में रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय बिलासपुर, डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय वैशाली, डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय खंडवा, एआईएसईसीटी विश्वविद्यालय हजारीबाग और स्कोप ग्लोबल स्किल्स यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों का विकास हुआ। इन संस्थानों में शिक्षा को कौशल विकास, शोध, नवाचार, उद्यमिता और उद्योगोन्मुखी शिक्षा से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है।
हिंदी में विज्ञान संचार के अग्रणी हस्ताक्षर
संतोष चौबे की पहचान एक प्रतिष्ठित विज्ञान लेखक और विज्ञान संचारक के रूप में भी रही है। उनकी वर्ष 1986 में प्रकाशित पुस्तक ‘कंप्यूटर: एक परिचय’ ने हिंदी में तकनीकी शिक्षा और कंप्यूटर जागरूकता के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने साहित्य और विज्ञान के बीच संवाद को मजबूत करते हुए कविता, कथा, उपन्यास और लोकप्रिय विज्ञान लेखन के क्षेत्र में निरंतर कार्य किया है।
साहित्य की विविध विधाओं में सक्रिय
कवि, कथाकार और उपन्यासकार संतोष चौबे हिंदी के उन साहित्यकारों में हैं, जिन्होंने साहित्य और विज्ञान दोनों क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय भूमिका निभाई है। उनके छह कथा-संग्रह—‘हल्के रंग की कमीज’, ‘रेस्त्रां में दोपहर’, ‘नौ बिंदुओं का खेल’, ‘बीच प्रेम में गांधी’, ‘प्रतिनिधि कहानियां’ तथा ‘मगर शेक्सपियर को याद रखना’—प्रकाशित एवं चर्चित हैं।
उनके चार उपन्यास ‘राग केदार’, ‘क्या पता कामरेड मोहन’, ‘जल तरंग’ और ‘सपनों की दुनिया में ब्लेकहोल’ प्रकाशित हुए हैं। उनके कविता-संग्रहों में ‘कहीं और सच होंगे सपने’, ‘कोना धरती का’, ‘इस अ-कवि समय में’ और ‘घर बाहर’ शामिल हैं। उनकी कहानियों का मंचन भारत भवन और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली सहित विभिन्न मंचों पर हो चुका है और उनकी रचनाएं देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।
भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। विश्वविद्यालय की मानद उपाधि के लिए तैयार प्रशस्ति-पत्र में उनके साहित्यिक और वैज्ञानिक लेखन के साथ भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति को बढ़ावा देने के प्रयासों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित
शिक्षा, विज्ञान, नवाचार, सामाजिक उद्यमिता और साहित्य के क्षेत्र में संतोष चौबे के योगदान को विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से मान्यता मिली है। उन्हें राष्ट्रीय नवाचार पुरस्कार, श्वाब फाउंडेशन सोशल एंटरप्रेन्योर ऑफ द ईयर अवॉर्ड और राष्ट्रीय साक्षरता पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।


