यूरोप की ऊर्जा जरूरतों का नया समाधान! समुद्र में बना आर्टिफिशियल आइलैंड, 3.5 GW विंड पावर का होगा हब

ब्रसेल्स

 सौ बात की एक बात कि बिजली पैदा करने को लेकर यूरोप के देश बेल्जियम से एक ऐसी ख़बर आई जिस पर ज़्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया लेकिन सबको ध्यान देने की ज़रूरत है. बिजली पैदा करने के लिए दुनिया में क्या-क्या किया जा रहा है, इस पर सब को नज़र रखने की ज़रूरत है. क्योंकि दुनिया में ताक़त का खेल इसी आधार पर होता जा रहा है कि किसके पास कितनी ऊर्जा बनाने की कपैसिटी है. ईरान युद्ध में सारा खेल ही तेल के व्यापार को कंट्रोल करने का है. AI की जंग जो चल रही है, उसमें दुनिया के डेटा सेंटरों पर कंट्रोल करने के लिए बड़ी भारी मात्रा में बिजली की ज़रूरत पड़ेगी, ये सब देश समझ रहे हैं. ऊधर रूस और यूक्रेन युद्ध में यूरोप ने देख लिया कि उसके हाथ इसलिए बंधे हुए हैं क्योंकि उसको सर्दियों में अपने हीटिंग सिस्टम चलाने के लिए रूस की गैस की ज़रूरत पड़ती है. और यूरोप में अब जिस हिसाब से गर्मी पड़ने लग गई है तो वो ये भी समझ रहे हैं कि अब तो वहां भी AC लगाने पड़ेंगे आगे चल कर। 

अभी तक पंखे भी नहीं देखे थे उन्होंने. तो बिजली कहां से आएगी इतनी? कोयले से बना नहीं सकते क्योंकि कोयला जला-जला कर ही तो 100 साल में दुनिया का ये हाल हो गया है कि दुनिया भर में गर्मी बढ़ गई है. यूरोप दूसरों को नसीहत दे रहा है कि कोयला मत जलाओ तो ख़ुद कैसे जला लेगा? तेल और गैस के लिए या तो रूस के सामने झुकना पड़ता है या अरब देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. परमाणु बिजली के लिए यूरेनियम की मारामारी है. सोलर बिजली के लिए ज़मीन भी चाहिए जो यूरोप के कई देशों में उतनी है नहीं और बड़ी बात ये कि सूरज तो वहां निकलता ही कितने दिन है साल में? तो यूरोप के कई देश बनाते हैं बिजली हवा से। 

हवा से मतलब विंडमिल से. पवन चक्कियों से. वो देखा है ना आपने बड़ा से पंखा लगा देते हैं ऊंचाई पर और वो हवा से चलता है तो नीचे चक्की चलती है और उससे बिजली बनाते हैं. लेकिन उसके लिए क्या चाहिए? एक तो बहुत सारी पवन चक्कियां एक साथ लगाने के लिए ख़ाली मैदान चाहिएं जहां खुली हवा तेज़ी से चलती हो. इतनी ज़मीन कहां से लाएं एक साथ? और ज़मीन पर पवन चक्कियां लगा दें तो खेती नहीं कर सकते वहां फिर. वो अलग नुक़सान है. क्योंकि अगर पवन चक्कियां वहां लगाएं जहां पर भी थोड़ी-बहुत जगह मिले तो वो तो कर सकते हैं लेकिन फिर ये दूर-दूर लगे पंखों से बिजली बनाकर एक जगह लाने के लिए इतना सारी केबल लगानी पड़ेगी, नहीं तो उसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कैसे करेंगे? और यूरोप के बेल्जियम जैसे देशों के पास तो वैसे भी इतनी सारी खुली ज़मीन नहीं है एक साथ. तो जानते हैं बेल्जियम क्या कर रहा है?

बेल्जियम ने लगाया टापू वाला दिमाग
बेल्जियम ने देखा कि सबसे ज़्यादा खुली और तेज़ हवा बिना किसी रुकावट के कहां चलती है? दिन हो रात कौन-सी ऐसी जगह है जहां पवन चक्कियों के पंखे फ़र्र-फ़र्र चलते रहेंगे और बिजली बनाते रहेंगे? और ज़मीन भी नहीं छोड़ने पड़ेगी उनके लिए? समुद्र में. जी, बेल्जियम ने सोचा कि अगर समुद्र में पवन चक्कियां लगा दें तो? पानी में ताल बिछाकर बिजली ज़मीन तक ले आएंगे. लेकिन समुद्र में पवन चक्कियां लगाएंगे कहां? तैरते हुए प्लैटफ़ॉर्म पर तो लगा नहीं सकते क्योंकि वो तो हवा से डोल जाएंगे. तो बेल्जियम क्या कर रहा है कि समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है. जी, पूरा नया टापू समुद्र के अंदर. ये अपने आप में दुनिया का एक नया अजूबा बनाया जा रहा है.  वो समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है बिजली पैदा करने के लिए। 

कहां बन रहा यह आइलैंड?
नॉर्थ सी में, उत्तर सागर में, बेल्जियम अपने तट से क़रीब 45 km दूर एक आर्टिफ़िशियल एनर्जी आइलैंड बना रहा है. प्रिंसेस एलिज़ाबेथ आइलैंड के नाम से. ये दुनिया का पहला ऐसा टापू बन रहा है. और ये टापू बनाया कैसे जा रहा है वो असली समझने वाली बात है. जैसे बच्चों के खिलौने होते हैं ना जिनमें ब्लॉक जोड़-जोड़ कर कोई बिल्डिंग बनाई जाती है या कुछ भी बनाया जाता है? वैसे बना रहा है. सिमेंट के, कॉन्क्रीट के बड़े-बड़े ब्लॉक बना रहा है, बक्से बना रहा है. और इन बक्सों में समंदर में डाल दिया जाएगा और उनको जोड़कर पूरा टापू बना देंगे. द नेदरलैंड्स के फ़्लिसिंगेन बंदरगाह में 23 ऐसे बड़े-बड़े कॉन्क्रीट के डिब्बे बनाए गए हैं. बड़े-बड़े मतलब एक-एक डिब्बा क़रीब 58m लंबा है, 28m चौड़ा है और 23 से 32m ऊंचा है. 58x28x32 समझ रहे हैं आप? मतलब एक 7 मंज़िला बिल्डिंग समझ लीजिए चौड़ी वाली. दो को जोड़ दो एक फ़ुटबॉल के मैदान जितनी जगह से भी ज़्यादा घेर लें, इतने बड़े-बड़े डिब्बे हैं. और हर डिब्बे का वज़न कितना? हर एक का वज़न है क़रीब 22,000 टन। 

कैसे बन रहा आइलैंड
मतलब समझ लो कोई 15,000 गाड़ियों जितना वज़न एक डिब्बे का. इतना सिमेंट लगा कर बने हैं ये डिब्बे. और ये तो अभी ख़ाली डिब्बों की बात हो रही है. खोखले बनाए गए हैं. 23 ऐसे डिब्बे. और इनको उतार दिया गया है समुद्र में. इन भारी डिब्बों को जहाज़ों से खींचकर समुद्र में ले जाया गया और वहां समुद्र के तल में डुबो दिया गया. और अब इनकी दीवारों के अंदर भरी जाएगी रेत. क़रीब बीस लाख क्यूबिक मीटर रेत भरी जा रही है. और ऐसे बनाया जा रहा है समुद्र के अंदर एक 6 हेक्टेयर का ठोस टापू. 6 हेक्टेयर मतलब लगभग 15 एकड़ का टापू बनेगा. मतलब समझ लो फ़ुटबॉल के 12 मैदानों जितना. उस पर बंदरगाह बनाया जाएगा, हेलीपैड बनाया जाएगा. और एक साथ 250 से ज़्यादा पवन चक्कियां लगाई जाएंगी, उनकी टर्बआइन लगाई जाएंगीं जिससे बिजली बनेगी और तारें बिछाई जाएंगी तट तक. डिब्बे समुद्र में उतार दिये गए हैं. बाक़ी काम में 5 साल लग जाएंगे. 2031 से बिजली मिलना शुरू हो जाएगी बेल्जियम को इससे। 

कैसे बिजली पैदा होगी?
यानी समुद्र में लगने वाली सैकड़ों पवन च
क्कियों की बिजली को एक जगह इकट्ठा कर लिया जाएगा और फिर केबलों से ज़मीन तक पहुंचाया जाएगा. कितननी बिजली बनेगी, 3.5 GW बिजली बनने की उम्मीद है इससे. कोई ईंधन नहीं लगेगा. कोई कोयला नहीं, तेल नहीं, गैस नहीं. सिर्फ़ हवा से इतनी बिजली एक साथ एक ही जगह से बना ले जाएगी क्योंकि समुद्र में हवा बिना रुकावट से दिन-रात चलती रहती है. बेल्जियम को पीक बिजली की डिमांड होती है लगभग 9-10 GW और सर्दियों में हीटर चलते हैं तो लगभग 12 GW डिमांड हो जाती है. इस एक टापू से 3.5 GW मिल जाएगी मतलब पूरे देश की एक तिहाई ज़रूरत यहां से पूरी हो जाएगी. एक ही जगह से और ये फ़ॉर्मुला चल निकला तो सोचिए आगे बाक़ी देश भी क्या-क्या कर सकते हैं?

समंदर में कितनी बिजली बनेंगी
ज़मीन पर ये करने के लिए एक तो सैकड़ों पवन चक्कियां लगाने के लिए खेती की ज़मीन ख़ाली करनी पड़ेगी तो वो तो नुक़सान है ही. ऊपर से समुद्र में हवा ज़्यादा तेज़ चलती है और ज़्यादा स्थिर तरीक़े से चलती है, इसलिए एक ही क्षमता वाली पवन चक्की समुद्र में ज़मीन से कहीं ज़्यादा बिजली देती है. अगर वहां टापू पर 250 पवन चक्कियां लगानीं पड़ेंगी तो ज़मीन पर उतनी बिजली बनाने के लिए 350 पवन चक्कियां लगानी पड़ेंगीं. बेल्जियम बहुत छोटा और घना बसा हुआ देश है, ज़मीन उतनी है नहीं. पवन चक्कियों की आवाज़ भी होती है. और क़ुदरत के नज़ारे भी छुप जाते हैं पवन चक्कियां लगाने से. ख़ूबसूरत तो है ही सारा यूरोप. तो पवन चक्कियों के बड़े फ़ार्म लगाना वहां मुमकिन ही नहीं है। 

नॉर्थ सी बनेगा यूरोप का बिजलीघर
नॉर्थ सी यानी उत्तर सागर में हवा लगातार चलती है और तेज़ चलती है, इसलिए ये इलाक़ा पवन ऊर्जा के लिए दुनिया के सबसे अच्छे इलाक़ों में एक माना जाता है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप समझ चुका है कि गैस के लिए रूस पर निर्भर रहना ख़तरनाक है. आगे चलकर ये टापू ब्रिटेन के साथ भी केबल से जुड़ सकता है. और डेनमार्क के साथ भी जुड़ सकता है, ताकि पड़ोसी देशों को ये बिजली बेच भी सके. टापू को और बड़ा किया जा सकता है. मतलब नॉर्थ सी को यूरोप का बिजलीघर बनाया जा सकता है, पावरहाउस बनाया जा सकता है. सारा खेल ही पावर का है. और दुनिया देखिए क्या-क्या प्लैन बना रही है पावर के लिए. सौ बात की एक बात। 

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