पीएम मोदी साइप्रस यात्रा तुर्की और पाक के लिए एक रणनीतिक संदेश है, भारत की खुली चुनौती

नई दिल्ली
दो प्राचीन सभ्यताओं वाले देश भारत और साइप्रस भले ही भौगोलिक रूप से दूर हों, लेकिन उनके बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध सदियों से चले आ रहे हैं। इसी सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साइप्रस यात्रा पर जा रहे हैं। यह 23 वर्षों बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा है। यह न केवल इन संबंधों को नया आयाम देगी, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक कूटनीति में भारत की बढ़ती भूमिका को भी दर्शाती है। यह यात्रा विशेष रूप से तुर्की और पाकिस्तान के लिए एक रणनीतिक संदेश है, जो भारत के खिलाफ एकजुट होकर क्षेत्रीय तनाव को बढ़ावा दे रहे हैं।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नींव पर टिके भारत-साइप्रस संबंध
ऐसा माना जाता है कि भारत और साइप्रस के बीच संबंध प्राचीन काल से चले आ रहे हैं। साइप्रस, भूमध्य सागर में स्थित एक छोटा द्वीपीय देश, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र रहा है। प्राचीन काल में भारतीय व्यापारी और बौद्ध मिशनरी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में सक्रिय थे, जिससे सांस्कृतिक और धार्मिक आदान-प्रदान हुआ। आधुनिक काल में, भारत और साइप्रस ने 1960 में राजनयिक संबंध स्थापित किए, जब साइप्रस को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली।

दोनों देशों ने स्वतंत्रता के बाद से ही एक-दूसरे का समर्थन किया है। साइप्रस ने भारत के परमाणु परीक्षण (1998) और कश्मीर मुद्दे पर हमेशा भारत के पक्ष का समर्थन किया है। दूसरी ओर, भारत ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत साइप्रस की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन किया है, विशेष रूप से 1974 के तुर्की आक्रमण के बाद, जब तुर्की ने उत्तरी साइप्रस पर कब्जा कर लिया और इसे 'तुर्की गणराज्य उत्तरी साइप्रस' (TRNC) घोषित किया। इसे केवल तुर्की ही मान्यता देता है।

1974, 1983, 1984 के UNSC प्रस्तावों में तुर्की को साइप्रस से अपनी उपस्थिति और सेना वापस लेने के लिए कहा गया, तथा तथाकथित TRNC की स्थापना को "कानूनी रूप से अमान्य" बताया गया। भारत ने साइप्रस का समर्थन किया था। पाकिस्तान एकमात्र देश था जिसने 1983/1984 के UNSC साइप्रस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया था।

साइप्रस का भारत के लिए रणनीतिक महत्व
साइप्रस, अपनी छोटी आबादी (लगभग 10 लाख) और सीमित क्षेत्र के बावजूद, भारत के लिए कई कारणों से महत्वपूर्ण है साइप्रस, पूर्वी भूमध्य सागर में एक रणनीतिक स्थान पर स्थित है, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ता है। यह क्षेत्र ऊर्जा संसाधनों, विशेष रूप से प्राकृतिक गैस के लिए महत्वपूर्ण है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, साइप्रस के साथ ऊर्जा सहयोग को बढ़ावा दे सकता है। इसके अलावा, साइप्रस यूरोपीय संघ (EU) का सदस्य है और 2026 में EU काउंसिल की अध्यक्षता करेगा।

भारत, जो EU के साथ अपने व्यापार और रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रहा है, साइप्रस के माध्यम से यूरोप में अपनी पैठ बढ़ा सकता है। भारत और साइप्रस के बीच रक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग बढ़ रहा है। साइप्रस ने आतंकवाद के खिलाफ भारत का समर्थन किया है, और दोनों देश समुद्री सुरक्षा और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग कर सकते हैं। साइप्रस एक वित्तीय केंद्र है और भारतीय कंपनियों के लिए निवेश का आकर्षक गंतव्य हो सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापार, पर्यटन, और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं हैं। साइप्रस और तुर्की के बीच 1974 से तनाव है, जब तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर लिया। भारत, साइप्रस और ग्रीस के साथ त्रिपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देकर तुर्की के क्षेत्रीय प्रभाव को संतुलित कर सकता है।

इतिहास गवाह है
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और प्रथम साइप्रस राष्ट्रपति आर्कबिशप मकारियोस तृतीय ने संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख व्यक्ति थे। मकारियोस बांडुंग सम्मेलन में एकमात्र यूरोपीय नेता थे। यह सम्मेलन एशिया और अफ्रीका के देशों के नेताओं की एक बैठक थी, जहां उन्होंने शीत युद्ध में तटस्थ रहने के लिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी थी। साइप्रस के राष्ट्रपति मकारियोस ने 1962 में आजादी मिलने के बाद भारत का दौरा किया और चीनी आक्रमण के बाद भारत को अपने देश का समर्थन देने की पेशकश की थी।

इतना ही नहीं, 1964 में, जब साइप्रस आंतरिक संकट में घिरा हुआ था, तब भारत ने पीड़ितों को मानवीय सहायता भेजी। भारत ने साइप्रस के शहरों के खिलाफ "तुर्की विमानों द्वारा की गई कार्रवाई" की भी निंदा की। कुल मिलाकर साइप्रस भारत का भरोसेमंद मित्र रहा है। इसने यूएनएससी की स्थायी सदस्यता के लिए भारत का समर्थन किया है। साइप्रस ने 2019 में पुलवामा आतंकी हमले की निंदा की थी। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत को समर्थन दिया था। यहां तक कि साइप्रस ने यूरोपीय संघ की बैठक में पहलगाम हमले का मुद्दा उठाया। साइप्रस ने लेबनान (2006/ऑपरेशन सुकून) और लीबिया (2011/ऑपरेशन सेफ होमकमिंग) से भारतीयों को निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रधानमंत्री मोदी की साइप्रस यात्रा: एक रणनीतिक कदम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस यात्रा 15-17 जून को कनाडा में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन से पहले हो रही है। यह एक सुनियोजित कूटनीतिक कदम है। यह यात्रा न केवल भारत-साइप्रस संबंधों को मजबूत करेगी, बल्कि तुर्की और पाकिस्तान के लिए एक स्पष्ट संदेश भी देगी।

यह यात्रा 2002 के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली साइप्रस यात्रा है, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने साइप्रस का दौरा किया था। इससे पहले, इंदिरा गांधी 1983 में साइप्रस गई थीं। 23 वर्षों के अंतराल के बाद यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्च-स्तरीय संपर्क को पुनर्जनन देगी।

तुर्की-पाकिस्तान गठजोड़ के खिलाफ जवाब
तुर्की ने हाल के वर्षों में भारत के खिलाफ पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया है, विशेष रूप से कश्मीर मुद्दे पर और 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे सैन्य अभियानों के दौरान। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोआन ने पाकिस्तान के साथ इस्लामी एकजुटता का प्रदर्शन किया और भारत की नीतियों की आलोचना की। भारत की साइप्रस यात्रा तुर्की के लिए एक कूटनीतिक चेतावनी है, क्योंकि साइप्रस तुर्की का सबसे संवेदनशील मुद्दा है।

1974 में तुर्की के आक्रमण के बाद साइप्रस दो हिस्सों में बंट गया। भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का समर्थन किया है, जो साइप्रस की एकता और क्षेत्रीय अखंडता की वकालत करते हैं। मोदी की यात्रा इस स्थिति को और मजबूत करेगी, जिससे तुर्की को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर असहजता होगी। भारत साइप्रस और ग्रीस के साथ त्रिपक्षीय सहयोग को बढ़ा रहा है। 2023 में मोदी की ग्रीस यात्रा, जो 40 वर्षों में पहली थी, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। साइप्रस यात्रा इस गठजोड़ को और मजबूत करेगी, जो तुर्की के क्षेत्रीय प्रभाव को संतुलित करने में मदद करेगा।

तुर्की को क्यों लगेगी मिर्ची?
तुर्की और साइप्रस के बीच तनाव 1974 के आक्रमण से शुरू हुआ, जब तुर्की ने उत्तरी साइप्रस पर कब्जा कर लिया। तुर्की ने इस क्षेत्र को 'तुर्की गणराज्य उत्तरी साइप्रस' घोषित किया, लेकिन इसे केवल तुर्की ही मान्यता देता है। साइप्रस और तुर्की के बीच पूर्वी भूमध्य सागर में प्राकृतिक गैस के अधिकारों को लेकर भी विवाद है।

भारत का साइप्रस के साथ खड़ा होना तुर्की की उत्तरी साइप्रस नीति को चुनौती देगा। भारत, एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में, साइप्रस के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय समर्थन को बढ़ा सकता है। तुर्की और पाकिस्तान के बीच गहरे संबंध हैं, जो इस्लामी एकजुटता और रक्षा सहयोग पर आधारित हैं। भारत की साइप्रस यात्रा तुर्की-पाकिस्तान गठजोड़ को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा है। तुर्की पूर्वी भूमध्य सागर में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। भारत का साइप्रस और ग्रीस के साथ सहयोग तुर्की के लिए एक रणनीतिक चुनौती है।

भारत की बदलती विदेश नीति
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति अधिक सक्रिय और रणनीतिक हो गई है। 'पड़ोसी पहले', 'एक्ट ईस्ट', और 'थिंक वेस्ट' जैसी नीतियों के तहत भारत ने अपने क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव को बढ़ाया है। साइप्रस यात्रा इस नीति का हिस्सा है, जो न केवल यूरोप में भारत की भूमिका को मजबूत करेगी, बल्कि तुर्की और पाकिस्तान जैसे देशों के खिलाफ रणनीतिक संतुलन भी बनाएगी।

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