दमे की बीमारी में एलर्जी से बचना जरुरी

महानगरों में बढ़ते प्रदूषण ने स्वच्छ हवा, पानी, रोशनी और हरियाली को किताबी बातें बना दिया है। प्रदूषण के कारण ही सांस की बीमारी एक आम समस्या बन चुकी है। बड़ी संख्या में पेड़-पौधों के कटाव से वातावरण दूषित होता है। सांसों की एलर्जी अर्थात दमा भी इसी दूषित वातावरण की ही देन है। आज न केवल बड़े बल्कि छोटे-छोटे बच्चे और नवजात शिशु भी सांस की घुटन से राहत पाने के लिए अपने साथ नेबुलाइजर रखने को विवश हैं।

दमा के बारे में अलग-अलग डॉक्टर अलग-अलग राय रखते हैं। कुछ डॉक्टरों के अनुसार यह श्वास का स्नायुविक रोग रेसपीरेटरी न्यूरोसिस है तो कुछ कहते हैं कि यह रोग रक्त में एलर्जी और टॉक्सिन्स उत्पन्न हो जाने से होता है। जो वायु हम ग्रहण करते हैं वह नाक, गला, फैंरिक्स और वायुनली से होते हुए श्वासनली के द्वारा फेफड़ों में पहुंचती है और जब हम सांस छोड़ते हैं तो इसी प्रकार वायु शरीर से बाहर निकल जाती है। वायु का यह स्वतंत्र ग्रहण और निष्कासन ही हमारी श्वसन क्रिया का आधार है।

दमा को एलर्जी का ही एक प्रकार माना जाता है। कोई भी ऐसा पदार्थ जो शरीर के लिए हानिकारक हो, एलर्जी कहलाता है। जब यह पदार्थ हमारे शरीर में प्रवेश करता है तो शरीर इसका विरोध करता है। जब एलर्जीकारक हमारी श्वसन नली में प्रवेश करता है तो फेफड़ों के बचाव के लिए हमारी श्वसन व्यवस्था उसे बीच में ही रोकने का प्रयास करती है, इससे सांस लेने में कष्ट होता है। जो एलर्जी पहले से ही सिस्टम में प्रवेश कर चुकी होती है उससे बलगम और खांसी होती है और गले में सूजन आ जाती है और उसी से श्वास नली में रुकावट आ जाती है और सांस लेने में कठिनाई होती है। इस स्थिति के बार-बार उत्पन्न होने की दशा में इसे दमा की संज्ञा दी जाती है। दमा कोई बीमारी नहीं अपितु एक एलर्जी तथा वंशानुगत रोग है।

सांस लेने में तकलीफ होना, दम घुटना, श्वास लेते समय सीटी जैसी आवाज होना, अक्सर छाती का दबाव या भारीपन महसूस होना, खांसते समय पसीना आना, चेहरे पर पीलापन, हाथ-पैर ठंडे रहना व्यायाम आदि करने से सांस फूल जाना, आदि कुछ ऐसे लक्षण हैं जिसके द्वारा दमा की पहचान संभव है। लगातार या बार-बार खांसी हो या दो सप्ताह से भी अधिक समय से खांसी ठीक न हो रही हो तो भी तुरंत डॉक्टर से परामर्श करना उचित होता है अन्यथा आगे चलकर आपको दमे का सामना करना पड़ सकता है।

दमे का दौरा अचानक और वह भी प्रायः मध्यरात्रि के बाद ही होता है। रक्त के प्लाज्मा कोर्टिसोल लेवल में प्रतिकूल परिवर्तन आने से फेफड़ों की नलिकाओं में ऐंठन पैदा हो जाती है और रोगी को दमे का दौरा पड़ जाता है। दौरे के समय रोगी को लेटने में कठिनाई होती है इसलिए वह बैठकर ही अपना समय व्यतीत करता है।

दमा के उपचार के लिए ज्यादातर इन्हेलर दवाएं दी जाती हैं। दवा देने की अन्य विधियां भी हैं जैसे पंप के पाउडर सूंघने देना और सोल्यूशन नेबुलाइजर में दवा का धुआं बनाकर उस धुएं को इनहेल करने देना। इसके अतिरिक्त गोलियों व इंजेक्शन के रूप में भी दवा दी जाती है।

दवाइयों के अतिरिक्त कुछ छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखकर भी दमे को सुरक्षित व प्रभावशाली ढंग से नियंत्रण में रखा जा सकता है। जिन्हें धूल से एलर्जी है उनके लिए आवश्यक है कि वे इससे बचें इसके लिए घर के वातावरण को साफ-सुथरा रखें। घरों में मोटे पर्दे, गलीचे आदि न लगाएं। ऐसे में सफाई के लिए झाडू के स्थान पर वैक्यूम क्लीनर का प्रयोग करें क्योंकि यह धूल के महीन से महीन कण खींच लेता है। फर्श की सफाई गीले कपड़े से करें। पालतू जानवर न पालें और तेज सुंगध से बचें आदि।

विभिन्न रोगियों में एलर्जीकारक तत्व अलग अलग होते हैं। जो विभिन्न क्रियाओं से उनके भीतर प्रवेश कर सकते हैं जैसे धारा के पास रहना, आटा छानना गेहूं साफ करना आदि। इनसे भी दमे का दौरा पड़ सकता है। इसी प्रकार फूड एलर्जी का ध्यान रखना जरूरी है। खट्टी चीजें, तले हुए पदार्थ व दही न लें। जिन खाद्य पदार्थों में रंग का प्रयोग किया गया हो उनसे बचें। किसी भी दवा का लंबे समय तक सेवन करते रहना भी नुकसानदायक हो सकता है।

विभिन्न रोगियों पर किए परीक्षणों से डॉक्टरों ने यह निष्कर्ष भी निकाला है कि कई बार क्रोध, चिन्ता, डर, उत्तेजना या अधिक मेहनत करने के कारण हुई थकावट भी इस रोग को बढ़ा सकते हैं। ऐसे में आवश्यक है कि ऐसी स्थिति से बचा जाए। प्राकृतिक चिकित्सा के पक्षधरों का मानना है कि दोषपूर्ण खान-पान रहन-सहन, बढ़ती भौतिक सुख-सुविधाएं और घटता हुआ शारीरिक श्रम और व्यायाम से जी चुराने की प्रवृत्ति ही दमे के लिए उत्तरदायी है।

जलनेति, सुत्रनेति और कुंजल आदि क्रियाओं का दमे के उपचार में महत्वपूर्ण स्थान है। जलनेति और सूत्रनेति करने से नासामार्ग के अवरोध दूर हो जाते हैं और रोगी को सांस लेने में सुविधा होती है। ऊपरी श्वसन मार्ग को साफ करने के लिए ये क्रियाएं बहुत उपयोग होती हैं। ये क्रियाएं श्वसन मार्ग के संक्रमण को न्यूनतम करने का प्रयास करती हैं।

दूसरी क्रिया कुंजल है। इस क्रिया द्वारा सभी अनपचे खाद्य पदार्थों को रोगी के शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। प्रायः इस क्रिया के बाद अम्लीय गंध लिए हरा-पीला सा म्यूक्स जैसा स्राव निकलता है। इस क्रिया से भी रोगी को आराम मिलता है। इनके अतिरिक्त गहरी सांस लेना और प्राणायाम ऐसी क्रियाएं हैं जो दमा के रोगियों के लिए बहुत लाभकारी होती हैं।

दमा के रोगियों को अपने आहार तथा सांस में कठिनाई का रिकार्ड रखना चाहिए। एक या दो मास इस तरह का रिकार्ड रखने पर रोगी की यह ज्ञात हो जाता है कि कौन सी चीजें खाने पर उसकी तकलीफ बढ़ती है। इससे रोगी के आहार से आसानी से एलर्जीकारक चीजों को निकाला जा सकता है।

दमा के रोगी को तरोताजा अहसास व शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नियमित व्यायाम जैसे जॉगिंग, स्वीमिंग तथा योगासन आदि करने चाहिए। तैरने से श्वसन क्षमता में वृद्धि होती है। खुली हवा में घूमना-फिरना भी लाभकारी है इससे ताजी हवा फेफड़ों में पहुंचती है।

हालांकि इसका स्थाई इलाज सभव नहीं है लेकिन इसे नियंत्रण में रखना और कोई घातक अटैक होने से रोकना जरूरी है। सबसे अहम बात यह है कि दमा से संबंधित किसी भी लक्षण के दृष्टिगत होने पर उसे लापरवाही से न लें बल्कि तुरंत चिकित्सक से परामर्श करें।

 

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