OBC आरक्षण बढ़ाने की तैयारी: बेंगलुरु में कांग्रेस का बड़ा दांव, बिहार में सियासी गर्मी तेज

बेंगलुरु
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने पिछड़ा वर्ग को रिझाने के लिए शिक्षा, नौकरियों और अन्य क्षेत्रों में आरक्षण की 50% की सीमा को तोड़ने का संकल्प लिया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कांग्रेस की ओबीसी परिषद की बैठक में इसका ऐलान किया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की ओबीसी सलाहकार परिषद की दो दिवसीय बैठक बेंगलुरु में आयोजित की गई थी। आज बैठक का दूसरा और आखिरी दिन है। कांग्रेस द्वारा गठित ओबीसी सलाहकार परिषद को देश भर में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों पर रणनीति बनाने का काम सौंपा गया है।

परिषद की बैठक में केंद्र से तेलंगाना जाति सर्वेक्षण के मॉडल के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तावित जातिगत गणना कराने का आह्वान किया गया। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के नेतृत्व में यहां हुई दो दिवसीय बैठक में इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया। सिद्धरमैया ने परिषद में पारित प्रस्तावों को ‘बेंगलुरु घोषणा’ नाम देते हुए कहा,‘‘जनगणना में प्रत्येक व्यक्ति और जाति के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक, रोज़गार, राजनीतिक पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए।’’ उन्होंने कहा कि दूसरा प्रस्ताव आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा को समाप्त करने का था, जिससे शिक्षा, सेवा, राजनीतिक और अन्य क्षेत्रों में ओबीसी के लिए उपयुक्त आरक्षण सुनिश्चित हो सके। सिद्धरमैया ने बुधवार को बेंगलुरु में हुई परिषद की बैठक की अध्यक्षता की।

निजी शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण
सिद्धरमैया ने कहा कि बैठक में पारित तीसरे प्रस्ताव में कहा गया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) के अनुसार निजी शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण होना चाहिए। सलाहकार परिषद ने सर्वसम्मति से ‘न्याय योद्धा’ राहुल गांधी को समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाने के लिए धन्यवाद दिया। सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘राहुल जी के दृढ़ निश्चय ने मनुवादी मोदी सरकार को भारत में जातिगत गणना की न्यायोचित और संवैधानिक मांग के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया। भारत के सभी पिछड़े वर्गों की ओर से, परिषद हृदय से उनकी सराहना करता है और इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए राहुल गांधी के योगदान को श्रेय देता है।’’

जातिगत गणना मील का पत्थर
जातिगत गणना को लेकर केंद्र द्वारा किये गए फैसले को मील का पत्थर बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यह भारतीय संविधान द्वारा परिकल्पित सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक छोटा सा कदम है। सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘न्याय योद्धा राहुल गांधी जी के साहसी और अडिग नेतृत्व में, भारत सामाजिक सशक्तिकरण के अंतिम संवैधानिक उद्देश्य को साकार करने और प्राप्त करने के लिए नियत है, जिससे हमारे महान राष्ट्र में एक समतावादी और समान समाज का निर्माण होगा।’’

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने परिषद से राष्ट्रव्यापी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक जाति जनगणना पूरी करने के लिए मौजूदा सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति बनाने का आग्रह करते हुए कहा कि पिछड़े वर्गों के लिए 75% आरक्षण या जाति जनगणना के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष किया जाना चाहिए। उन्होंने निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की वकालत की।

…तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र नहीं रह सकता
सिद्धारमैया ने जोर देकर कहा कि अगर अल्पसंख्यकों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) सहित अन्य हाशिए पर पड़े समुदायों की बात नहीं सुनी जाती, तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र नहीं रह सकता। ओबीसी परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "अगर ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों – यानी अहिंदा समुदायों – की सिर्फ़ गिनती की जाती है, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी जाती, तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र नहीं रह सकता।"

यह सिर्फ आरक्षण की लड़ाई नहीं: सिद्धारमैया
उन्होंने आगे कहा, "यह सिर्फ आरक्षण की लड़ाई नहीं है। यह उन लोगों के लिए सम्मान, पहचान और असली ताकत की लड़ाई है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से इससे वंचित रखा गया है।" अहिंदा कन्नड़ में अल्पसंख्यातरु, हिंदुलिदावरु और दलितरु (अल्पसंख्यक, ओबीसी, एससी) का संक्षिप्त रूप है। कर्नाटक के सामाजिक न्याय के संघर्ष से उपस्थित लोगों को अवगत कराते हुए, मुख्यमंत्री ने 2015 में कंथराज समिति सहित विभिन्न समितियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों का उल्लेख किया, जिन्होंने 1.3 करोड़ परिवारों का सर्वेक्षण किया था। हालांकि, उन्होंने कहा कि भाजपा ने रिपोर्ट को चार साल तक रोके रखा।

सिद्धारमैया ने आगे कहा, "कर्नाटक सामाजिक न्याय की लड़ाई में अग्रणी रहा है: 1918 में मिलर समिति, 1921 में 75 प्रतिशत आरक्षण, हवानूर आयोग (1975) ने पिछड़े वर्ग के उत्थान की वैज्ञानिक नींव रखी, 1995 में ओबीसी राज्य अधिनियम, 2015 में कंथराज आयोग, जिसने 1.3 करोड़ परिवारों का सर्वेक्षण किया। लेकिन भाजपा ने हर प्रगतिशील कदम को रोका या लटकाकर रखा। इसमें कंथराज रिपोर्ट को 4 साल तक रोके रखना भी शामिल है।"

 

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