IFFCO का सफर: किसानों के लिए वरदान और भारत की सबसे बड़ी सहकारी समिति बनने की कहानी

नई दिल्ली

अमूल और आईएफएफसीओ को वर्ल्ड कोऑपरेटिव मॉनिटर की ग्लोबल लिस्ट में पहला और दूसरा स्थान मिला है. ये पल भारत के लिए बेहद खास है. आपको बता दें कि आईएफएफसीओ (Indian Farmers Fertilizer Cooperative Limited) भारत में स्थित दुनिया का सबसे बड़ा फर्टिलाइजर कॉपरेटिव फेडरेशन है. ये भारत की सबसे बड़ी मल्टी-स्टेट सहकारी समिति है, जो देशभर के किसानों को फर्टिलाइजर और कृषि सेवाएं उपलब्ध कराती है. 1967 में स्थापित IFFCO के साथ आज 35,000 से अधिक सहकारी समितियां जुड़ी हुई हैं.

यह संस्था सिर्फ खाद बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों के जीवन के कई पहलुओं को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभा रही है.

कब हुई आईएफएफको की शुरुआत?

आईएफएफको का ऑपरेटिंग स्ट्रचर काफी खास है. साल 1960 के दशक में भारत के सहकारी क्षेत्र की भूमिका बहुत बड़ी थी. उस समय देश में इस्तेमाल होने वाले लगभग 70 प्रतिशत खाद का वितरण सहकारी संस्थाओं के जरिए होता था. इन संस्थाओं के पास खाद बांटने की अच्छी व्यवस्था तो थी, लेकिन खुद उत्पादन की कोई सुविधा नहीं थी.

इसलिए उन्हें खाद की आपूर्ति के लिए सरकारी या निजी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था. इस समस्या को दूर करने और देश में बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखकर एक नई सहकारी संस्था बनाने का विचार आया. यह एक अनोखी पहल थी, जिसमें देश के किसानों ने अपनी सहकारी समितियों के माध्यम से एक ऐसी संस्था बनाई जो उनके हितों की रक्षा कर सके.

भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (IFFCO) इसी सोच का नतीजा है. जब 1967 में इसकी शुरुआत हुई थी, तब सिर्फ 57 सहकारी समितियां इससे जुड़ी थीं. आज यह संख्या बढ़कर 39,800 से भी ज्यादा हो गई है. आईएफएफको को 3 नवंबर 1967 को एक मल्टी-यूनिट कोऑपरेटिव सोसाइटी के रूप में रजिस्टर किया गया था.
आईएफएफको का मुख्य काम

बाद में 1984 और 2002 में आए मल्टीस्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटी एक्ट के तहत इसे एक बहुराज्यीय सहकारी संस्था के रूप में मान्यता मिली. आईएफएफको का मुख्य काम किसानों के लिए उर्वरक (खाद) का उत्पादन और वितरण करना है. इसके उपविधानों में संस्था की गतिविधियों का एक सही स्ट्रचर तय किया गया है, जिससे यह अपने सहकारी सिद्धांतों के साथ काम करती है.
किसानों की भलाई को दी प्राथमिकता

आईएफएफको को एक खाद कंपनी के बजाय एक ऐसी संस्था के रूप में देखा जाता है जो ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था और समाज दोनों को गहराई से प्रभावित करती है. इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह किसानों की भलाई को अपनी प्राथमिकता में रखती है. आईएफएफको ने कई ऐसे काम किए जो उस समय नए और जोखिम भरे माने जाते थे, लेकिन बाद में उन्होंने किसानों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया. उदाहरण के तौर पर, आईएफएफको देश की पहली ऐसी संस्था थी जिसे ग्रामीण इलाकों में सामान्य बीमा का लाइसेंस मिला. इस बीमा योजना के तहत किसानों को खाद की खरीद के साथ बीमा कवरेज भी दिया गया, जिससे उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा मिली.
मोबाइल कनेक्टिविटी से लेकर बीमा का दिया फायदा

बीमा के अलावा, आईएफएफको ने ग्रामीण विकास के कई दूसरे क्षेत्रों में भी कदम बढ़ाए. इसने गांव-स्तर पर कृषि केंद्र बनाए, जहां से किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक और खेती के उपकरण आसानी से मिल सकें. इससे किसानों को दूर शहरों में जाकर सामान लेने की जरूरत नहीं रही और उनकी लागत भी कम हुई. आईएफएफको ने समय के साथ तकनीक को भी अपनाया. उसने एयरटेल के साथ मिलकर किसानों के लिए मोबाइल कनेक्टिविटी बढ़ाने की पहल की, ताकि वे बाजार की जानकारी, मौसम की रिपोर्ट और कृषि सलाह सीधे अपने फोन पर पा सकें.

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी आईएफएफको ने बड़ा काम किया है. इसके सामाजिक वनीकरण कार्यक्रम के तहत करीब 36,000 हेक्टेयर जमीन पर जंगल तैयार किए गए, जिससे पर्यावरण संतुलन बना और ग्रामीण इलाकों में हरियाली बढ़ी. आईएफएफको ने किसानों कीो आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया. इसने पाकिस्तान फाइनेंस जैसी संस्थाओं से सीख लेकर किसानों को वित्तीय सहयोग देने की शुरुआत की. प्राकृतिक आपदाओं के समय, जैसे गुजरात भूकंप में, आईएफएफको ने राहत सामग्री, मेडिकल सहायता और जरूरतमंद परिवारों को छात्रवृत्तियां देकर मदद की. किसानों की भलाई के लिए इसने एनसीडीएक्स जैसे कमोडिटी एक्सचेंज से भी जुड़कर उनके लिए नए अवसर तैयार किए.

आईएफएफको सिर्फ एक सहकारी संस्था नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की रीढ़ है. इसकी सोच किसानों की भलाई, आत्मनिर्भरता और सतत विकास पर टिकी है. किसानों के हित में की गई लगातार मेहनत ने आईएफएफको को आज भारत की सहकारी आंदोलन की मिसाल बना दिया है.

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