सेना की तैयारी में खुलासा: भारत का डिफेंस स्ट्रैटेजी चीन-पाक और तुर्की के लिए चुनौतीपूर्ण

नई दिल्ली

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने अपने डिफेंस सिस्‍टम को अपग्रेड और मजबूत करने में जुटा है. दुनिया के तमाम देश अब ऐसे वेपन सिस्‍टम डेवलप करने लगे हैं, जिससे घर बैठे हजारों किलोमीटर दूर स्थित टार्गेट को तबाह किया जा सके. इसके तहत लंबी दूरी की मिसाइल्‍स डेवलप किए जा रहे हैं. इसे आमतौर पर इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) भारत भी इसमें पीछे नहीं है. अग्नि सीरीज के तहत कई मिसाइलें विकसित की गई हैं, जिनका रेंज 2000 किलोमीटर से 5500 किलोमीटर तक है. अभी तक अग्नि-5 तक मिसाइल बनाई गई हैं. अग्नि-5 को आईसीबीएम का दर्जा हासिल है. अब इसी सीरीज में एक और महाबली तैयार किया जा रहा है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत के फ्यूचर डिफेंस प्‍लान को डिकोड किया है. उन्‍होंने अग्नि-VI को डेवलप करने की बात कही है. अग्नि-VI की जद में चीन, पाकिस्‍तान के साथ तुर्की जैसे देश भी होंगे. एक्‍सपर्ट का तो यह भी मानना है कि अग्नि-VI की रेंज में अमेरिका भी होगा.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अग्नि-VI मिसाइल को लेकर बड़ी बात कही है. उन्‍होंने अग्नि-VI के डेवलपमेंट पर काम चलने की बात कही है. अग्नि-V के रेंज को देखते हुए डिफेंस एक्‍सपर्ट का मानना है कि अग्नि-VI की मारक क्षमता 10000 से 12000 किलोमीटर तक हो सकती है. यदि ऐसा है तो अग्नि-VI की जद में पूरा चीन, पाकिस्‍तान और तुर्की जैसे देश आ जाएंगे. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने सीधे तौर पर पाकिस्‍तान का साथ दिया था. यह वही तुर्की है, जिसकी मदद करने में भारत ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी. बता दें कि कुछ साल पहले तुर्की में विनाशकारी भूकंप आया था, जिसमें व्‍यापक पैमाने पर तबाही मची थी. अग्नि-VI के डेवलप होने के बाद पाकिस्‍तान के दोनों जिगरी यार इसकी जद में आ जाएंगे.
अग्नि-VI है बहुत खास

DRDO के पूर्व प्रमुख वीके सारस्वत ने कहा था कि अग्नि-VI एक फ़ोर्स मल्टीप्लायर साबित होगी. रिपाोर्ट की मानें तो अग्नि-VI का वजन 65–70 टन हो सकता है. यह अग्नि-V से भारी होगी. अग्नि-V का पहला परीक्षण अप्रैल 2012 में किया गया था. डॉ. सारस्वत ने एयरो इंडिया-2013 में कहा था कि अग्नि-VI की मारक क्षमता (रेंज) बताई नहीं जा सकती है. उन्होंने कहा था कि DRDO ने इसके डिज़ाइन का काम पूरा कर लिया है और अब हार्डवेयर बनाने पर काम चल रहा है. अग्नि-V की रेंज 5,000 किलोमीटर से ज्‍यादा है. उन्होंने यह भी बताया था कि विमान से लॉन्च की जाने वाली एंटी-रेडिएशन मिसाइल (शत्रु के राडार सिस्टम को नष्ट करने वाली) भी एक महत्वाकांक्षी परियोजना है और हाल ही में प्रदर्शित की गई पानी के नीचे से लॉन्च होने वाली मिसाइल BO5/K-15 भी इसी सीरीज का हिस्सा है.

डिफेंस मिनिस्‍टर राजनाथ सिंह ने S-400 एयर डिफेंस सिस्‍टम और पांचवीं पीढ़ी के Su-57 फाइटर जेट खरीद पर भी भारत की रणनीति का खुलासा किया है. 

S-400 और Su-57 की खरीद पर क्‍या बोले राजनाथ

दरअसल, केंद्र सरकार ने रक्षा सशक्तीकरण और स्वदेशी उत्पादन को लेकर कई अहम संकेत दिए हैं. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि रूसी S-400 एयर डिफेंस सिस्‍टम की जरूरत बनी हुई है. उन्‍होंने कहा कि रूस की तरफ से यदि इसे उपलब्ध कराया गया तो भारत भविष्‍य में इसकी और यूनिट्स खरीद सकता है. इस बीच, रूसी उन्नत लड़ाकू विमान Su-57 के भारत में उत्पादन पर बातचीत अभी भी चल रही है. बता दें कि सुखोई-57 पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट है. दूसरी तरफ, डीआरडीओ भी एडवांस्‍ड वेपन सिस्‍टम को तेजी से डेवलप करने में जुटा है. अग्नि-VI बैलिस्टिक मिसाइल के साथ ही न्यूक्लियर कैपेबल सैन्य पनडुब्बी का विकास और सेनाओं के थिएटर स्तरीय कमान स्‍ट्रक्‍चर (theaterization) पर काम जारी है. रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो न्यूक्लियर सबमरीन से देश की मैरीटाइम सिक्‍योरिटी को अत्‍यधिक मजबूती मिलेगी.

ड्रोन और फाइटर जेट इंजन

ड्रोन तकनीक पर भारत ने पिछले कुछ वर्षों में भारी निवेश और विकास देखा है. डिफेंस मिनिस्‍टर कहते हैं कि स्वदेशी ड्रोन प्लेटफ़ॉर्म पर तेज काम चल रहा है जो दोनों भूमिकाओं (निगरानी (surveillance) और स्‍ट्राइक) को अंजाम दे सकेंगे. ये आधुनिक यूएवी (Unmanned Aerial Vehicles) सीमापार खतरों का पता लगाने के लिए आईटीसी (intelligence, targeting, and connectivity) और तात्कालिक कार्रवाई में सहायक होंगे. विशेषज्ञ यह भी जोड़ते हैं कि स्वदेशी विकास से निर्भरता कम होगी और सप्‍लाई चेन पर नियंत्रण बढ़ेगा. राजनाथ सिंह ने फाइटर जेट को देश में ही डेवलप करने को लेकर भी बड़ी बात कही है. उन्‍होंने बताया कि अगले एक साल के भीतर देश में प्रयोग में आने वाले सभी फाइटर जेट इंजनों का उत्पादन भारत में ही होगा. इसके लिए आवश्यक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को एक्‍वीसीजन कॉन्‍ट्रैक्‍ट को अनिवार्य शर्त बनाया जा रहा है, ताकि विशेषज्ञता और विनिर्माण क्षमताएं घरेलू उद्योग में सुदृढ़ हों. इससे आत्मनिर्भरता के साथ-साथ रोजगार और स्पेयर-पार्ट्स की उपलब्धता भी सुनिश्चित होगी.

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