देसी फाइटर जेट तेजस एमके-1ए: लाइट वेट और किफायती, भारत का 200 जेट खरीदने का फैसला

 नई दिल्ली 
दुनिया में अमेरिकी 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट एफ-35 की तूती बोलती है. इस फाइटर जेट की क्षमता को आज की तारीख में कोई भी देश चुनौती नहीं दे सकता है. इसके बाद राफेल, सुखोई-57, चीनी जे-35, यूरो फाइटर जैसे फाइटर जेट्स आते हैं. ये सभी ए+ या ए श्रेणी के जेट्स हैं. लेकिन, इन फाइटर जेट्स को खरीदने से ज्यादा बड़ी टेंशन इनको उड़ाने में होती है. इन विमानों को उड़ाना हर किसी के बस की बात नहीं हैं. यानी ये सफेद हाथी हैं जिनको खरीदने से ज्यादा टेंशन पालने की होती है.

आज दुनिया बदल रही है. युद्ध के तरीके बदल रहे हैं. जमीनी की जगह हवाई जंग का महत्व बढ़ गया है. हर देश अब अपनी एयरफोर्स को मजबूत करने में जुटी है. ऐसे में भारत भी पूरी शिद्दत से अपनी एयरफोर्स को मजबूत करने में जुटा है. इस वक्त भारतीय एयरफोर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती फाइटर जेट्स की कमी को पूरा करना है. एयरफोर्स को फाइटर जेट्स के 42 स्क्वड्रन की जरूरत है, लेकिन उसके पास ऑपरेशनल केवल 30 स्क्वाड्रन हैं. एक स्क्वाड्रन में 18 विमान होते हैं. इसके अलावा आने वाले समय में कई स्क्वाड्रन रिटायर होने वाले हैं. ऐसे में यह अंतर और बढ़ने वाला है.

भारत ने देसी फाइटर जेट्स पर क्यों जताया भरोसा?

ऐसे में इस कमी को पूरा करने के लिए भारत ने देसी फाइटर जेट्स तेजस पर भरोसा जताया है. सरकार ने अब तक तेजस एमके-1 फाइटर जेट के 180 यूनिट का आर्डर दे दिया है. इसके अलावा कुछ ट्रेनर विमान भी हैं. अब इन विमानों की सप्लाई भी शुरू होने वाली है. इस विमान को एचएएल ने बनाया है. अनुमान है कि चीजें पटरी पर आने के बाद एचएएल हर साल इसकी 24 यूनिट की आपूर्ति कर सकता है.

मार्केट में राफेल, एफ-35 जैसे विमान तो तेजस को तरजीह क्यों?

तेजस एमके-1 के ऑर्डर बुक देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है जब चीन और पाकिस्तान जैसे हमारे दुश्मन पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स की ओर बढ़ रहे हैं तो हमने तेजस की इतनी तरजीह क्यों दी है. तेजस एमके-1 एक 4+ का लाइट वेट फाइटर जेट है. हमारे मन में यही सवाल है कि क्या बदलने समय के अनुसार इसकी सार्थकता है. हम आगे इसी सवाल पर जबाव खोजेंगे.

    तेजस क्यों है एयरफोर्स की पसंद?

    तेजस एमके-1 का ऑपरेशन कॉस्ट काफी कम है. एक शॉर्टी यानी 45 मिनट के एक उड़ान पर इसमें 1200-1400 किलो फ्यूल खर्च होता है. इस पर प्रति फ्लाइट ऑवर 4 से 8 हजार डॉलर का कुल खर्च आता है. दूसरी ओर राफेल पर 16 से 31 हजार डॉलर प्रति घंटे का खर्च आता है. वहीं एफ-35 की बात करें तो यह खर्च 35 से 42 हजार डॉलर प्रति घंटे तक पहुंच जाता है. इस तरह इस बात को समझना आसान हो जाता है कि ऑपरेशन लागत ही वह सबसे बड़ा कारण है जिससे एयरफोर्स ने तेजस एमके-1 को तरजीह दी है.

तेजस फाइटर वर्ल्ड का ऑल्टो क्यों

दुनिया के तमाम एक्सपर्ट्स के मुताबिक एक एफ-35 फाइटर जेट पर उसके पूरे लाइफ साइकिल में 20 से 45 करोड़ डॉलर का खर्च आता है. यह खर्च हथियारों की लोडिंग, उसकी उड़ान के घंटे, मेंटेनेशन सहित कई अन्य चीजों पर निर्भर करता है. ऐसे में अगर इन सभी लागत का औसत लिया जाए तो समझ में आ जाता है कि भारत ने बेहद समझादी का परिचय दिया है. एक राफेल या एफ-35 पर होने वाले खर्च से करीब छह से आठ गुना कम खर्च तेजस एमके-1 पर होता है. अब आप समझ गए होंगे कि हमने इस तेजस को फाइटर जेट की दुनिया का ऑल्टो क्यों कह रहे हैं. कार की दुनिया में ऑल्टो केवल एक मॉडल का नाम नहीं है बल्कि यह किफायत का पर्याववाची भी है.

तो क्या तेजस एमके-1 से भारत की जरूरतें पूरी होगी?

यह बहुत अच्छा सवाल है. आमतौर पर सस्ती चीजों को लेकर हमारे मन में एक ही सवाल उठता है कि यह कितना टिकाऊ है. आपका चिंतित होना लाजिमी भी है. क्योंकि देश चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों से घिरा हुआ है. इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पहले हमें भारत और पाकिस्तान के साथ लगने वाली सीमा को लेकर थोड़ी बात करनी होगी. दरअसल, पाकिस्तान 1947 से पहले भारत का हिस्सा था. वह कोई चांद से उतरा देश नहीं है. सरहद के उस पार की स्थिति-परिस्थिति के बारे में हमें बखुबी पता है. भारत की सीमा से 100-200 मील के दायरे में अधिकतर पाकिस्तान सिमट जाता है. उसका सबसे प्रमुख शहर लाहौर, रावलपिंडी, राजधानी इस्लामाबाद तो भारत की सीमा के बहुत करीब हैं. ऐसे में इनको बड़े आसानी से तेजस एमके-1 जैसे फाइटर जेट से कवर किया जा सकता है.

इस बात को आप इससे और अच्छी तरह समझ सकते हैं कि अगर आपको शहरी इलाके में 50-100 किमी की दूरी तय करनी है तो आपको बहुत महंगी बड़ी करोड़ों रुपये की गाड़ी नहीं खरीदनी चाहिए. बशर्ते आप गाड़ी जरूरत को ध्यान में रखकर खरीद रहे हैं न कि शौकिया तौर पर. इससे आपकी जेब पर पेट्रोल का खर्च कम पड़ता है और आप कार की भी सवारी करते हैं. ऐसे में भारत ने पाकिस्तान और उसके साथ लगने वाली सीमाई इलाकों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए ही तेजस-एमके-1 की खरीद की है. इस इलाके में तेजस भी करीब-करीब वही काम करेगा जो काम राफेल या फिर एफ-35 जैसे विमान करेंगे, लेकिन दोनों के ऑपरेशन कॉस्ट में जमीन आसमान का अंतर है. इससे भारत एक बड़ी धनराशि की बचत कर उसे अन्य चीजों पर खर्च कर सकता है.

अब बात करते हैं चीन सीमा की

चीन एक विशाल देश है. उसके साथ लगने वाली सीमा भी बेहद दुर्गम है. ऐसे में हमें इस बात की स्वीकार करने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए कि तेजस एमके-1 उसके खिलाफ बहुत प्रभावी साबित नहीं होगी. इसी कारण भारत ने इसके लिए अलग रणनीति अपनाई है. वह देसी तेजसे-एमके-2 और एम्का प्रोग्राम पर काम कर रहा है. इसके साथ ही राफेल, सुखोई-30 जैसे फाइटर जेट्स हैं. ये मीडियम से हाई रेंज के एयरक्राफ्ट हैं. भारत इस कैटगरी में और फाइटर जेट्स खरीदने की योजना पर काम कर रहा है.

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