इंदौर की भागीरथपुरा महिला ने 36 मौतों के बीच 72 दिन संघर्ष किया, 16 दिन वेंटिलेटर और 22 दिन ICU में रहीं

इंदौर 

67 वर्षीय पार्वती कोंडला ने न सिर्फ मौत को मात दी, बल्कि उस दुर्लभ जीबीएस (गिलियन-बैरे-सिंड्रोम) को भी हराया जिसने उनके शरीर को लकवाग्रस्त कर दिया था। 19.50 लाख का बिल, 72 दिनों का अस्पताल का संघर्ष और परिवार की अटूट श्रद्धा ने मिलकर यह नामुमकिन जीत हासिल की है।

28 दिसंबर को पार्वती पति भेरूलाल कोंडला को सामान्य उल्टी-दस्त की शिकायत हुई। लगा कि मामूली इंफेक्शन है, लेकिन दूषित पानी में मौजूद कैम्पीलोबैक्टर जेजुनी बैक्टीरिया ने उनके नर्वस सिस्टम पर हमला कर दिया।

उसी दिन उन्हें स्कीम 78 स्थित विवेक मेमोरियल अस्पताल में भर्ती किया। यहां उसकी हालत खराब होती गई और आईसीयू में रेफर करना पड़ा। जब हालत और खराब हुई तो 2 जनवरी को बॉम्बे हॉस्पिटल में रेफर किया।

उन्हें GBS सिंड्रोम हो गया था, जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम अपनी ही नसों को खत्म करने लगता है। देखते ही देखते शरीर का एक हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया और किडनियों ने काम करना बंद कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि जीबीएस सिंड्रोम के कारण लकवा भी हो सकता है।

हालत बिगड़ने पर उन्हें शैल्बी से बॉम्बे हॉस्पिटल रैफर किया गया। डॉक्टरों ने कह दिया था कि बचने की उम्मीद सिर्फ 3-4% है। वे 16 दिन वेंटिलेटर और 22 दिन ICU में रहीं। जब फेफड़ों ने साथ छोड़ दिया, तो डॉक्टरों ने गले में छेद (ट्रेकोस्टोमी) कर सांस लेने का रास्ता बनाया। 18 दिनों तक वे पूरी तरह बेहोश रहीं।

शासन की निगरानी में यह स्पेशल केस
भागीरथपुरा का यह एक ऐसा है कि जिसे शासन द्वारा बारीकी से मॉनिटरिंग किया जा रहा है। खुद मंत्री कैलाश विजयवर्गीय 72 दिनों में कई बार उनकी हालत जानने हॉस्पिटल पहुंचे और परिजन को ढांढस बंधाया कि वे किसी की बात की चिंता न करें।

उन्होंने परिवार को आश्वस्त किया कि 72 दिनों के इलाज का 19.50 लाख रुपए का खर्च शासन चुकाएगा।

48 दिन बाद 9 मार्च को डिस्चार्ज हुईं पार्वती
48 दिनों में पार्वती को एचडीयू में रेफर किया गया। इसके बाद बहुत ही धीरे-धीरे उनके स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। यह देख डॉक्टरों को भी और उम्मीदें बढ़ी। 6 मार्च को डॉक्टरों ने उसका ट्रेकोस्ट्रीमिया सिस्टम बंद किया। फिर ट्यूब फीडिंग से लिक्विड डाइट शुरू की।

इस दौरान पार्वती ने उसे ग्रहण करना शुरू किया तो और सुधार आया। वह परिवार के लोगों को न केवल पहचाने लगी बल्कि बीच-बीच में जवाब देने की कोशिश भी की। 9 मार्च को उन्हें डिस्चार्ज किया गया। अब सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी की टीम उनकी मॉनिटरिंग कर रही है।

अब घर पर जारी है 'रिकवरी' की दूसरी जंग
बेटे प्रदीप ने कहा कि मां की रिकवरी किसी चमत्कार से कम नहीं है। डॉक्टर कह चुके थे कि अब सब भगवान भरोसे है, लेकिन मां की इच्छाशक्ति और डॉक्टरों की मेहनत ने उन्हें वापस लौटा दिया।

प्रदीप ने कहा कि फिजियोथेरेपिस्ट, केयर टेकर और दवाओं का खर्च महीने का 60-70 हजार रुपए आ रहा है, जिसके लिए हमने शासन से मदद की गुहार लगाई है।

अब वे हाथ उठाने लगी हैं और परिजनों को पहचान कर जवाब देने की कोशिश करती हैं। भले ही पार्वती जी घर आ गई हैं, लेकिन संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। उन्हें दिन भर में 9 बार लिक्विड डाइट दी जाती है। 6 बार दूध-प्रोटीन और 3 बार अन्य लिक्विड डाइट ट्यूब के जरिए दी जाती है।

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