100 साल के अधिकतम बाढ़ स्तर के आधार पर फ्लड प्लेन जोन तय करेगा सिंचाई विभाग

 गाजीपुर

गंगा की धारा की अविरलता और स्वच्छता बनाए रखने के लिए सिंचाई विभाग ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पिछले 100 वर्षों में आई बाढ़ के अधिकतम स्तर का सीमांकन कर नदी के किनारे चेतावनी पिलर लगाए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य यह है कि लोग बाढ़ क्षेत्र में निर्माण न करें और नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित न हो। यह कार्य नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देश पर किया जा रहा है।

एनजीटी ने गंगा के फ्लड प्लेन जोन (एफपीजेड) को चिह्नित करने के लिए 100 वर्षों में बाढ़ के अंतिम पहुंच बिंदु का निर्धारण करने का आदेश दिया था। इसी के तहत सिंचाई विभाग पत्थर के पिलर स्थापित कर रहा है, जिन पर ‘100 वर्ष’, पिलर संख्या और एफपीजेड अंकित किया जा रहा है। वाराणसी से बलिया सीमा तक गंगा के दोनों किनारों पर लगभग एक हजार पिलर लगाए जा रहे हैं।

गाजीपुर में दोनों तरफ मिलाकर लगभग 175 किलोमीटर क्षेत्र में यह कार्य किया जा रहा है और इस पर करीब 50 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस पहल से लोगों को बाढ़ क्षेत्र की स्पष्ट जानकारी मिलेगी और अवैध निर्माण पर रोक लगाने में मदद मिलेगी।

सिंचाई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह कदम न केवल बाढ़ के खतरे को कम करेगा, बल्कि गंगा नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को भी संरक्षित करेगा। पिलर लगाने का कार्य तेजी से चल रहा है और इसे समय सीमा के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

इस कार्य के माध्यम से स्थानीय निवासियों को बाढ़ के संभावित खतरों के बारे में जागरूक किया जाएगा। पिलर पर अंकित जानकारी से लोग यह समझ सकेंगे कि बाढ़ के समय किन क्षेत्रों में रहना सुरक्षित नहीं है। इससे अवैध निर्माण पर भी अंकुश लगेगा, जो कि नदी के किनारे अव्यवस्थित तरीके से हो रहा है।

गंगा नदी भारतीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके संरक्षण के लिए उठाए गए इस कदम को व्यापक रूप से सराहा जा रहा है। स्थानीय प्रशासन ने भी इस पहल का समर्थन किया है और इसे गंगा की स्वच्छता और अविरलता के लिए एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

गंगा नदी के किनारे चेतावनी पिलर लगाने का कार्य न केवल बाढ़ प्रबंधन के लिए आवश्यक है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इससे न केवल नदी की धारा को सुरक्षित रखा जाएगा, बल्कि स्थानीय समुदायों को भी बाढ़ के खतरों से बचाने में मदद मिलेगी।इस पहल से गंगा नदी के किनारे रहने वाले लोगों को एक नई दिशा मिलेगी, जिससे वे सुरक्षित और संरक्षित रह सकेंगे।

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