योगी कैबिनेट फुल होने के बाद, BJP की 2024 की तैयारी और चुनावी स्थिति पर सवाल

लखनऊ 
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में दूसरा कैबिनेट विस्तार रविवार किया गया है. 6 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई गई तो दो राज्य मंत्रियों को प्रमोशन दिया गया. मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक संदेश देने कवायद की गई है, क्योंकि 2024 में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 'पीडीए' फॉर्मूले से बीजेपी को पीछे धकेल दिया था। 

राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कुल आठ नेताओं को मंत्री पद की शपथ दिलाई, जिनमें छह नए चेहरे शामिल हैं. बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी और सपा के बागी विधायक मनोज कुमार पांडे को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है तो कृष्णा पासवान, कैलाश सिंह राजपूत, सुरेंद्र दिलेर और हंसराज विश्वकर्मा ने राज्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। 

योगी मंत्रिमंडल विस्तार में अजीत सिंह पाल और सोमेंद्र तोमर ने राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में शपथ ली. ये दोनों ही नेता पहले से योगी सरकार में राज्यमंत्री थे, जिन्हें अब प्रमोशन देकर अब स्वतंत्र प्रभार मंत्री बनाया गया है. इस तरह से योगी मंत्रिमंडल अब पूरी तरह फुल हो चुका है, लेकिन सवाल यह है कि कैबिनेट विस्तार से बीजेपी के बिगड़े सियासी समीकरण को कितनी मजबूती मिल पाएगी? 

कैबिनेट के जरिए बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग
योगी मंत्रिमंडल का विस्तार कर बीजेपी ने दलित, पिछड़े और ब्राह्मण समाज केतबकों को बड़ा संदेश दे दिया है. योगी सरकार से नाराज माने जा रहे ब्राह्मण समाज से मनोज पांडेय को मंत्री बना कर बीजेपी ने उन्हें लुभाने का प्रयास किया है. इसी तरह भूपेंद्र चौधरी को पश्चिमी यूपी के जाट समाज को जोड़े रखने का दांव है तो सोमेंद्र तोमर को राज्यमंत्री पद से प्रमोशन स्वतंत्र प्रभार देकर गुर्जर समाज को सियासी संदेश दिया है। 

कैबिनेट विस्तार में दलित चेहरे को तौर पर कृष्णा पासवान और सुरेंद्र दिलेर को राज्यमंत्री बनाया गया, जिनके जरिए गैर जाटव दलित वोटों को साधने की कवायद की है. कृष्णा पासवान पासी समुदाय से हैं तो सुरेंद्र दिलेर वाल्मीकि समुदाय से आते हैं. इन दोनों ही नेताओं दलित प्रतिनिधित्व के रूप में कैबिनेट में जगह दी है ताकि दलित समाज के विश्वास को बनाए रखा जा सके। 

वहीं, लोधी, पाल और विश्वकर्मा जैसी पिछड़ी जातियों पर भी फोकस किया गया. पाल समुदाय से आने वाले अजीत सिंह पाल को राज्यमंत्री से प्रमोशन कर स्वतंत्र प्रभार मंत्री बना दिया गया है. इसी तरह लोधी जाति से आने वाले कैलाश सिंह राजपूत बनाए गए हैं. हंसराज विश्वकर्मा को राज्यमंत्री के तौर पर शामिल कर ओबीसी की लोहार जाति को सियासी संदेश दिया है। 

बीजेपी ने दिया सियासी संदेश,  राह में कांटे ही कांटे? 
योगी कैबिनेट विस्तार के जरिए बीजेपी ने राजनीतिक रूप से इसका सबसे बड़ा संदेश दिया है. बीजेपी ने जिस तरह से मंत्रिमंडल में ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, लोध, पासवान और पाल समाज की नुमाइंदगी दी है, उसके जरिए ओबीसी की उन्हीं जातियों पर फोकस किया है, जो पहले से ही बीजेपी के साथ जुड़ी हुई हैं. सपा के पीडीए फॉर्मूले के साथ 2024 में नहीं गई थी। 

बीजेपी गैर-यादव OBC की राजनीति से आगे बढ़कर अन्य पिछड़ी जाति पर काम कर रही है. 2024 लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी को जिन इलाकों और जातियों में नुकसान हुआ था, पार्टी अब उसी गैप को भरने की कोशिश कर रही है. पश्चिम यूपी में जाट समीकरण लोकसभा में पूरी तरह स्थिर नहीं दिखे थे. इसी तरह मायावती के कमजोर से होने से दलित वोट का एक हिस्सा समाजवादी पार्टी की ओर गया था। 

अखिलेश यादव ने पीडीए के जरिए पिछड़ी जातियों को भी साथ जोड़ने में कामयाब रहे. इसलिए इस विस्तार के जरिए इन सभी तबकों को संदेश दिया जा रहा है कि सत्ता में उनकी हिस्सेदारी है, लेकिन सवाल यही है कि अखिलेश यादव के 'पीडीए फॉर्मूले' को बीजेपी क्या काउंटर कर पाएगी। 

2024 के बिगड़े समीकरण कितना दुरुस्त होगा? 
बीजेपी ने योगी मंत्रिमंडल विस्तार में जिस तरह ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, लोध, पासवान और पाल समाज की नुमाइंदगी दी है, उससे 2024 में बीजेपी के अलग होने वाली जातियों को क्या फिर से बीजेपी जोड़ पाएगी? ये इसीलिए भी कहा जा रहा है कि 2019 की तुलना में बीजेपी 2024 में 62 सीटों से घटकर 33 सीट पर सिमट गई थी। 

सपा 37 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रही तो उसकी सहयोगी कांग्रेस को 6 सीटें मिली थी. 2024 के चुनाव नतीजे को विधानसभा क्षेत्र के लिहाज से देखें तो सपा और कांग्रेस को करीब 128  विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी. बीजेपी के साथ जुड़ा रहा कुर्मी, मौर्य जैसे ओबीसी वोटर के साथ-साथ राजपूत और दलित वोटर भी छिटक गए थे. इसके चलते ही बीजेपी लोकसभा चुनाव में सपा से पीछे रह गई थी। 

बीजेपी ने कुर्मी समाज के विश्वास को जीतने के लिए पकंज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, लेकिन मौर्य और राजपूत समाज को साधने की कवायद कैबिनेट के जरिए नहीं हो सकी. इसीलिए बृजभूषण शरण सिंह और विधायक आशा मौर्य का दर्द छलक उठा. आशा मौर्य ने कहा कि लगता है पार्टी को अब मौर्य समाज की आवश्यकता नहीं रह गई और बाहर से आए दलबदलुओं को प्राथमिकता दी गई है। 

वहीं, बृजभूषण सिंह कैबिनेट विस्तार से नाखुश दिखे. माना जा रहा था कि वे अपने बेटे प्रतीक भूषण के लिए मंत्री पद चाहते थे. किसी ठाकुर चेहरे को जगह न मिलने पर उन्होंने 'X' पर शायराना अंदाज में निशाना साधा कि शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है, जिस शाख पर बैठे हो वह टूट भी सकती है. उनके इस पोस्ट को लेकर साफ समझा जा सकता है कि किस तरह से नाराज हैं. मौर्य और ठाकुर वोटों को साधे रखने के लिए बीजेपी ने कोई सियासी दांव नहीं चल रही है। 

पांडेय और चौधरी बीजेपी के कितन काम आएंगे? 
ब्राह्मण बीजेपी के साथ पहले ही मजबूती से खड़ा है और मनोज पांडेय मंत्री बनकर क्या खिसकते हुए ब्राह्मण समाज को जोड़े रख पाएंगे, ये सवाल इसीलिए है कि सपा में रहते हुए ब्राह्मणों को अखिलेश के करीब नहीं ला सके थे. अखिलेश से बगावत करने का भले ही उन्हें इनाम मिल गया है, लेकिन ब्राह्मण चेहरे के तौर पर उनकी स्वीकार्यता अपने क्षेत्र से बाहर नहीं है। 

पश्चिम यूपी के समीकरण को साधने के लिए जरूर जाट समुदाय से आने वाले भूपेंद्र चौधरी को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है, लेकिन उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए ही जाट बहुल मुजफ्फरनगर, कैराना, नगीना जैसी सीट बीजेपी हारी है. जाट समाज के वोटों के लिए आरएलडी के साथ भी बीजेपी ने हाथ मिला रखा है. सपा के गुर्जर समाज पर फोकस को देखते हुए जरूर बीजेपी ने सोमेंद्र तोमर को राज्यमंत्री से स्वतंत्र प्रभार सौंप दिया हो, लेकिन क्या गुर्जरों को बीजेपी से जोड़े रख पाएंगे? 

वहीं, कष्णा पासवान कैलाश सिंह राजपूत क्या अपने-अपने समाज के वोटों को बीजेपी के पीछे लामबंद कर पाएंगे. यह बात इसीलिए कही जा रही है कि 2024 में पासी वोटर बीजेपी से छिटकर सपा-कांग्रेस के साथ गया है, जिसके चलते ही अवध क्षेत्र में पूरी तरह सफाया हो गया. लोध वोटर खिसकने से कन्नौज, हमीरपुर और एटा जैसी सीट हार गई. बीजेपी का लोध वोटर परंपरागत वोटर रहा है, लेकिन अब छिटक रहा है। 

अखिलेश के पीडीए का काउंटर प्लान कहां है? 
योगी मंत्रिमंडल के जरिए बीजेपी ने भले ही दलित और
ओबीसी की जातियों को प्रतिनिधित्व देने की कवायद की हो, पर सपा के पीडीए फॉर्मूले का काउंटर दांव नहीं तलाश सकी है. यूपी में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत ही कमजोरी बन गई है. योगी आदित्यनाथ की व्यक्तिगत छवि, कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाएं हैं, लेकिन अब पार्टी समझ रही है कि केवल केंद्रीय योजनाएँ और हिंदुत्व पर्याप्त नहीं होंगे, सामाजिक समीकरण उतना ही अहम है। 

यूपी में बीजेपी बंगाल मॉडल को तीन स्तरों पर लागू करने कर चुनावी जंग फतह करना चाहती है. सबसे पहले महिला वोट बैंक. बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में यूपी में महिला मतदाताओं के बीच मजबूत आधार बनाया है. कैबिनेट में महिला चेहरों को महत्व देना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा है. इसके अलावा अति पिछड़ा वर्ग पर फोकस। 

उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने निषाद, मौर्य, कुशवाहा, विश्वकर्मा, प्रजापति, लोधी, पाल, बिंद जैसे समूहों पर फोकस बढ़ा रही है. इसका उद्देश्य सपा के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति के मुकाबले तैयार करने का, पर जिस तरह से मौर्य और ठाकुर समाज के बीच नाराजगी दिखी है, उसकी सियासी काट तलाशनी होगी। 

बीजेपी ने कैबिनेट के जरिए क्षेत्रीय संतुलन साधना. यूपी में पश्चिम, बुंदेलखंड, अवध, पूर्वांचल और केंद्रीय यूपी के संतुलन पर ध्यान दिया जा रहा है.पूर्वांचल से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और कई वरिष्ठ मंत्री आते हैं. ऐसे में इस बार अवध और पश्चिम का प्रतिनिधित्व बढ़ाया गया है, लेकिन बीजेपी को अपने कोर वोटबैंक को भी ख्याल रखने का दांव चलना होगा? 

 

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