हिमाचल का पारंपरिक स्वाद: ठंड से बचाव के लिए बना सिड्डू का दिलचस्प इतिहास

हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत पहाड़ियां और ठंडा मौसम हर किसी को अपनी ओर अट्रैक्ट करता है. यहां पर काफी टेस्टी-टेस्टी डिशों का भी इतिहास जुड़ा हुआ है लेकिन सबसे फेमस है यहां का 'सिड्डू' (Siddu). लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस स्वादिष्ट डिश की शुरुआत पहाड़ों की जानलेवा ठंड से बचने की मजबूरी में हुई थी? जानकारी के मुताबिक, माइनस डिग्री तापमान में जब हड्डियां गलाने वाली ठंड पड़ती थी तब स्थानीय चरवाहों और पहाड़ी लोगों ने शरीर को अंदर से गर्म और एनर्जेटिक रखने के लिए इस खास डिश का आविष्कार किया था. तो आइए इसकी उत्पत्ति समय के साथ कैसे-कैसे नया रूप लेती गई, इस बारे में जान लीजिए.

तिब्बती कनेक्शन और खमीर
सिड्डू का लिखित जिक्र और डॉक्युमेंटेशन 19वीं सदी के ब्रिटिश काल और पहाड़ी यात्रा वृत्तांतों में मिलना शुरू हुआ था इसलिए ऐतिहासिक तौर पर इसके इतिहास को लगभग 200 साल पुराना माना जाता है.

सिल्वर माउंटेन स्कूल ऑफ़ होटल मैनेजमेंट की एक रिसर्च के मुताबिक, सिड्डू शब्द की उत्पत्ति तिब्बती शब्द 'त्से-दोए' (Tse-doe) से मानी जाती है जिसका सीधा मतलब स्टीम ब्रेड यानी भाप में पकी हुई रोटी होता है. हिमाचल के पुराने महासू (अब शिमला का हिस्सा), कुल्लू और मनाली जैसे इलाकों में ठंड के दिनों में कफी बर्फबारी हुआ करती थी. ऐसे समय में लोग हफ्तों तक घरों में कैद हो जाते थे क्योंकि उनके पास खाने और खेती के कोई साधन नहीं हुआ करते थे.

ऐसे में उस समय खाने के लिए लोगों के पास सूखा अनाज ही होता था जिससे वो भूख मिटाते थे. ऐसे में वो लोग गेहूं के आटे में नेचुरल खमीर उठाकर उसे फर्मेंट करते थे. इस प्रोसेस से तैयार आटा न सिर्फ पेट के लिए हल्का और पचाने में आसान होता था बल्कि शरीर को भी अंदर से गर्म रखता था.

खसखस और अखरोट की स्टफिंग
पहाड़ी लोगों की लाइफस्टाइल के बारे में विस्तार से बताने वाली ग्लोबल फूड मैगजीन गोया जर्नल के मुताबिक, इतिहास में सिड्डू को मुख्य रूप से खानाबदोश चरवाहे अपनी लंबी और थका देने वाली यात्राओं के दौरान एक टिकाऊ भोजन के रूप में साथ ले जाते थे.

सिड्डू की सबसे बड़ी खासियत इसके अंदर भरी जाने वाली स्टफिंग मानी जाती थी. पुराने समय में इसके अंदर खसखस यानी अफीम के पेड़ के बीज (Poppy Seeds), अखरोट, अलसी और लोकल मसालों का पेस्ट भरते थे. खसखस और ड्राई फ्रूट्स की तासीर बेहद गर्म होती है जो भयंकर बर्फबारी में भी इंसानी शरीर को अंदर से गर्म रखती थी और भरपूर एनर्जी देती थी. आर्ध चंद्राकर यानी गुजिया आकार में मोड़ी गई इस ब्रेड को पहले चीड़ के पत्तों पर रखकर पारंपरिक बर्तनों में भाप से पकाया जाता था जिससे इसमें एक भीनी खुशबू समा जाती थी.

हिमाचल की अहम डिश बनी
समय के साथ सिड्डू का रूप और इसकी लोकप्रियता दोनों बदल चुके हैं. कभी चरवाहों का सफर का साथी रहा यह भोजन आज हिमाचल की संस्कृति और शादियों का सबसे जरूरी हिस्सा बन चुका है. आज कुल्लू और शिमला के बाजारों में पारंपरिक उड़द दाल और खसखस के अलावा पनीर, चिकन और मशरूम स्टफिंग वाले सिड्डू भी पर्यटकों के बीच काफी पसंद किए जा रहे हैं.

सिड्डू को परोसने का तरीका भी बेहद शाही है. गर्मा-गर्म सिड्डू के बीच में कट लगाकर उसमें ढेर सारा पिघला हुआ देसी घी भरा जाता है और इसे हरी चटनी के साथ सर्व किया जाता है जो आज भी हर फूड लवर के लिए एक अल्टीमेट विंटर डिलाइट है.

कैसे बनाते हैं सिड्डू?
सिद्दू बनाने के लिए गेहूं के आटे को खमीर उठाकर उसमें खमीर मिलाया जाता है. फिर इस आटे में बादाम, खसखस, मूंगफली, अखरोट और तिल जैसे विभिन्न मेवों का पेस्ट भरा जाता है. इसके साथ ही इसमें स्वादानुसार धनिया, टमाटर, प्याज और मसाले भी डाले जाते हैं. इसे भाप में पकाया जाता है, घी से सजाया जाता है और हरी (जिसमें अक्सर धनिया और पुदीना होता है) और लाल (जिसमें मिर्च और लहसुन होता है) चटनी के साथ परोसा जाता है. कोई भी दो सिद्दू एक जैसे नहीं होते; लेकिन सभी सिद्दू उतने ही स्वादिष्ट होते हैं.

हिमाचल प्रदेश में, यह आमतौर पर नमकीन होता है, जिसमें अखरोट, तिल, बादाम, मूंगफली, खसखस, खुबानी जैसे मौसमी चीजें प्याज और धनिया के साथ मिलाकर भरी जाती हैं.

More From Author

यूपी रोडवेज बसों की लाइव ट्रैकिंग से यात्रियों का सफर हुआ ज्यादा सुरक्षित

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

RO No. 13783/138

city24x7.news founded in 2021 is India’s leading Hindi News Portal with the aim of reaching millions of Indians in India and significantly worldwide Indian Diaspora who are eager to stay in touch with India based news and stories in Hindi because of the varied contents presented in an eye pleasing design format.