जल की हर बूंद में बसती है आने वाले कल की धड़कन, संरक्षण पर जोर

भोपाल 

विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्म मंथन और संकल्प का अवसर है। यह वह क्षण है जब हमें प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों को पुनः स्मरण करते हुए एक ऐसे भविष्य की कल्पना करनी चाहिए, जहां जल, जंगल और जमीन सुरक्षित हों। आज आवश्यकता केवल एक दिन के संकल्प की नहीं, बल्कि आने वाले युगों तक चलने वाले जन-संकल्प की है।

पीढ़ियों से हम सुनते आए हैं. “जल ही जीवन है।” किंतु विडंबना यह है कि इस सत्य को समझने में हमें एक गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ा। आज यह संकट किसी एक मोहल्ले, शहर, राज्य या देश तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी के अस्तित्व से जुड़ा वैश्विक प्रश्न बन चुका है। भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं है। बढ़ती जनसंख्या, अनियंत्रित शहरीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक जल स्रोतों को तेजी से क्षीण कर दिया है। ऐसे समय में पानी की प्रत्येक बूंद को सहेजना मानवता का सबसे बड़ा दायित्व बन गया है। जल संकट की गंभीरता केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं है। भू-जल स्तर का निरंतर गिरना, नदियों का प्रदूषित होना, पारंपरिक जल स्रोतों का लुप्त होना और वर्षा जल का व्यर्थ बह जाना इस संकट के प्रमुख कारण हैं। गांवों और नगरों की जीवन रेखा रहे तालाब, बावड़ियाँ और कुएं आज उपेक्षा, अतिक्रमण और कचरे के बोझ तले दम तोड़ रहे हैं। दूसरी ओर कृषि और उद्योगों में भूजल के अंधाधुंध दोहन ने स्थिति को और अधिक विकट बना दिया है। ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में “जल गंगा संवर्धन अभियान” आशा की एक सशक्त किरण बनकर उभरा है। यह अभियान केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी पर आधारित एक सामाजिक आंदोलन है, जिसका मूल मंत्र है…“जन सहयोग से जल संरक्षण और संवर्धन।” इसका उद्देश्य जल संकट के मूल कारणों का समाधान करते हुए समाज को जल संरक्षण के लिए प्रेरित करना है।

मैंने स्वयं अपने विधानसभा क्षेत्र नरसिंहपुर तथा गृह नगर गोटेगांव में सिंगरी नदी के पुनर्जीवन के लिये सफाई अभियान चलाकर जल स्रोतों के संरक्षण का प्रयास किया है। इसी अनुभव के आधार पर मैं सदैव आह्वान करता हूं—“नदियों को नाला बनाना बंद करें।” वास्तव में नदी का उद्गम स्थल ऊर्जा का केंद्र होता है और जहां नदियों का संगम होता है, वहां जीवन की नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं। इसलिए नदियों के उद्गम और उनके प्राकृतिक स्वरूप की रक्षा करना हमारा सामूहिक दायित्व है। मेरे आराध्य परम पूज्य  बाबा  जी की वाणी है कि संकल्प में विकल्प नहीं होता। संकल्प में विक्लप खोजने पर महानतम कार्य रुक जाते हैं।

“जल गंगा संवर्धन अभियान” के अंतर्गत पुराने तालाबों, कुओं, बावड़ियों और नदियों का जीर्णोद्धार किया जा रहा है। वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि बारिश का पानी धरती में समाहित होकर भू-जल स्तर को पुनर्जीवित कर सके। जल स्रोतों के आसपास व्यापक वृक्षारोपण किया जा रहा है, जिससे जल संरक्षण की प्राकृतिक प्रक्रिया मजबूत हो सके। साथ ही नदियों में प्रदूषण रोकने और गंदे नालों के प्रवाह को नियंत्रित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। इस अभियान के परिणाम उत्साहवर्धक हैं। जल संरचनाओं की सफाई और गहरीकरण से भू-जल स्तर में सुधार हुआ है। अनेक ऐतिहासिक तालाबों और बावड़ियों का पुनर्जीवन हुआ है, जिससे स्थानीय स्तर पर जल उपलब्धता बढ़ी है। “पानी चौपाल” जैसे कार्यक्रमों ने लोगों में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा की है और जल बचाने की संस्कृति को पुनर्जीवित किया है। कृषि क्षेत्र में भी इस अभियान ने सकारात्मक प्रभाव डाला है। किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, जिससे कम पानी में अधिक उत्पादन संभव हो । यह न केवल जल संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि किसानों की आर्थिक समृद्धि का भी आधार बन रहा है। जल संकट के स्थायी समाधान के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास भी आवश्यक हैं। शहरों में अपशिष्ट जल का शोधन कर पुनः उपयोग किया जाना चाहिए। औद्योगिक प्रदूषण पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है और व्यक्तिगत स्तर पर भी हमें पानी की बर्बादी रोकने की आदत विकसित करनी होगी। जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति इस जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक कोई भी अभियान पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

जल संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा नैतिक दायित्व है। आज यदि हम जल को सहेजेंगे, तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा। हमें अपनी प्राचीन जल संस्कृति से जोड़ते हुए वैज्ञानिक जल प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग देखना है।

आइए, इस विश्व पर्यावरण दिवस पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि जल की हर बूंद को बचाएंगे, जल स्रोतों का संरक्षण करेंगे और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करेंगे। क्योंकि सच यही है—पानी को सहेजना ही आने वाली पीढ़ियों को बचाना है और जल का संरक्षण ही जीवन का संरक्षण है। भारत की भूमी और मौसम दोनों हमें संदेश दे रहे हैं 5 जून से पौधारोपण की तैयारी करें और वर्षा प्रारंभ होने पर पौधरोपण “विश्व पर्यावरण दिवस” आहवान सुफल औऱ सफल होगा।

 

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