आधुनिकता के साथ संस्कृति का संगम: PM मोदी के कार्यकाल में भारत की बदलती पहचान

  भोपाल

मई 2014 में जब हमारे देवतुल्य नरेंद्र मोदीजी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तब देश की जनता ने केवल एक सरकार नहीं चुनी थी, बल्कि शासन की एक नई कार्यशैली और राजनीतिक संस्कृति की अपेक्षा भी व्यक्त की थी. बारह वर्ष बाद इस यात्रा को केवल योजनाओं,आंकड़ों और उपलब्धियों के आधार पर नहीं, बल्कि उस व्यापक दृष्टिकोण के आधार पर समझना अधिक उचित होगा, जिसने शासन की सोच को प्रभावित किया. यदि इन बारह वर्षों को तीन शब्दों में समेटना हो, तो वे शब्द होंगे- सेवा, सुशासन और संकल्प। 

राजनीति से आगे सेवा का भाव
भारतीय राजनीति में लंबे समय तक सत्ता को अधिकार और विशेषाधिकार के रूप में देखा जाता रहा. हमारे देवतुल्य नेता नरेंद्र मोदी जी ने इसे सेवा के रूप में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया. उन्होंने स्वयं को कई बार प्रधान सेवक कहा. यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि शासन की भाषा और शैली में दिखाई देने वाला दृष्टिकोण भी था. सेवा का अर्थ केवल कल्याणकारी योजनाएं चलाना नहीं है. सेवा का अर्थ है कि शासन स्वयं को जनता का संरक्षक नहीं, बल्कि उसका सेवक माने. इस दृष्टि से पिछले बारह वर्षों में शासन की प्राथमिकताओं में अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की चिंता है. गरीब, किसान, महिला, युवा और वंचित वर्ग को केवल वोट बैंक के रूप में नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया के केंद्र में रखने की सफल कोशिश की गई है। 

यह वही सोच है, जिसकी जड़ें पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानववाद में दिखाई देती है. मोदी जी की सरकार ने बार-बार यह संदेश दिया है कि विकास का वास्तविक अर्थ तब है, जब उसका लाभ समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुंचे। 

सुशासन: व्यवस्था में विश्वास की पुनर्स्थापना
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि सं
स्थाओं और व्यवस्थाओं पर जनता के विश्वास से चलता है. लंबे समय तक भारतीय नागरिक की एक शिकायत रही कि सरकार दूर है, प्रक्रियाएं जटिल हैं और व्यवस्था आम आदमी के लिए कठिन हैं। 

पिछले बारह वर्षों में शासन की चर्चा करते समय सुशासन एक प्रमुख शब्द बनकर उभरा. सुशासन का अर्थ केवल भ्रष्टाचार कम करना या तकनीक का उपयोग बढ़ाना नहीं होता है. इसका वास्तविक अर्थ है सरकार को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और प्रभावी बनाना. डिजिटल तकनीक का उपयोग इसी दर्शन का हिस्सा था. तकनीक को केवल आधुनिकता का प्रतीक नहीं, बल्कि सुशासन का माध्यम माना गया. शासन और नागरिक के बीच की दूरी कम करने, प्रक्रियाओं को सरल बनाने तथा निर्णयों को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में लगातार प्रयास हुए। 

सुशासन का एक महत्वपूर्ण पहलू निर्णय लेने की क्षमता भी है. लोकतंत्र में संवाद आवश्यक है, लेकिन अनिर्णय विकास का सबसे बड़ा शत्रु होता है. हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार की कार्यशैली में यह स्पष्ट दिखाई दिया है कि बड़े निर्णयों से बचने के बजाय उन्हें समाधान तक कैसे पहुंचाया जाए? दरअसल इसे ही निर्णायक नेतृत्व कहते हैं. यह निर्विवाद है कि निर्णय लेने की क्षमता इस शासनकाल की प्रमुख पहचान रही है। 

संकल्प: विकसित भारत का सपना
हर युग की राजनीति का एक केंद्रीय विचार होता है. स्वतंत्रता आंदोलन का विचार स्वराज था. स्वतंत्रता के बाद का विचार राष्ट्र निर्माण था. इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में मोदी सरकार ने विकसित भारत को राष्ट्रीय संकल्प के रूप में प्रस्तुत किया. यह संकल्प केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है. इसके भीतर आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय गौरव की भावना भी जुड़ी हुई है. पिछले बारह वर्षों में बार-बार यह संदेश दिया गया कि भारत को केवल विकासशील राष्ट्र के रूप में संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे विश्व की अग्रणी शक्तियों में स्थान प्राप्त करना चाहिए। 

यह दृष्टिकोण भारतीय समाज में एक नए आत्मविश्वास का निर्माण करता है. लंबे समय तक भारत अपनी संभावनाओं की चर्चा तो करता था, लेकिन उन्हें प्राप्त करने का साहस कम दिखाई देता था. आज विकसित भारत का विचार एक राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में स्थापित हुआ है। 

मोदीजी का आशीर्वाद मध्यप्रदेश के साथ
अपने देवतुल्य, 'प्रधानसेवक' से प्रेरणा लेकर हमने भी विकसित मध्यप्रदेश का सपना देखा. यह बताते हुए मन भाव विभोर है कि मोदीजी का हर कदम पर हर निर्णय पर मार्गदर्शन, स्नेह और आशीर्वाद मिला. चाहे वर्षों से लंबित केन बेतवा और पार्वती-कालीसिंध चंबल लिंक परियोजना हो या पीएम मित्र पार्क, उन्होंने आगे बढ़कर परेशानियों को दूर किया, उनके जैसा नेतृत्व दुर्लभ है। 

देश के सात राज्यों में पीएम मित्र पार्क बनाने का निर्णय हुआ, तो उस सूची में मध्यप्रदेश को भी रखा गया. यह अति प्रसन्नता का विषय है कि अब तक सिर्फ मध्यप्रदेश में ही पीएम मित्र पार्क का भूमिपूजन हुआ है और यह गौरव का विषय रहा कि धार में पार्क के भूमिपूजन में प्रधानमंत्री जी शामिल हुए. यह सब मध्यप्रदेश से उनके विशेष लगाव का परिणाम ही है। 

प्रदेश में साइबर तहसील का सफल क्रियान्वयन हो या भोपाल और इंदौर में मेट्रो रेल, सब प्रधानमंत्रीजी के स्नेह आशीर्वाद मार्गदर्शन का ही परिणाम है. आज प्रदेश में नौ एयरपोर्ट हैं, तो इसके पीछे भी उनका ही मार्गदर्शन है। 

आज हमारा मध्यप्रदेश नक्सल मुक्त है, तो इसके पीछे उनका ही दिशा-निर्देश है. उन्होंने समय-समय पर समझाया तो चेताया भी. उन्होंने कहा कि गोली का जवाब गोली से दो पर जो लोग बंदूक-हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं, उनके लिए बेहतर से बेहतर पुनर्वास की व्यवस्था भी हो। 

उनकी सलाह चेतावनी का ही सुफल है कि आज मध्यप्रदेश लाल सलाम को आखिरी सलाम कह चुका है. आज मध्यप्रदेश में उद्योगों का जाल बिछ रहा है, लाखों करोड़ का निवेश हो रहा है, तो इसके पीछे प्रधानमंत्रीजी का ही मार्गदर्शन है. फरवरी 2025 में भोपाल में आयोजित ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट में शामिल होना, उनका विशेष स्नेह ही तो दर्शाता है. उन्होंने हमें संवेदना की सीख दी है. बताया है कि नर ही नारायण हैं. वंचितों-गरीबों में नारायण के दर्शन करो. उनकी सीख ही थी कि हमने अपने शुरुआती निर्णयों में ही इंदौर के हुकुमचंद मिल के कामगारों को उनका बकाया अधिकार दिलवाने में सफलता हासिल की. कामगारों को चेक सौंपने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को प्रधानमंत्रीजी ने वर्चुअली संबोधित भी किया था। 

मध्यप्रदेश के सभी 55 जिलों में अग्रणी सरकारी कालेजों को प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित करना हो या हाइवे का विकास हो, हर मोर्चे पर प्रधानमंत्री जी ने आगे बढ़कर रूचि दिखाई, मार्गदर्शन मदद और स्नेह देते रहे. मुझे कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि वे कालजयी, त्रिकालदर्शी नेता हैं। 

सांस्कृतिक आत्मविश्वास का पुनर्जागरण
हमारे नेता मोदीजी के कार्यकाल की एक महत्वपूर्ण विशेषता सांस्कृतिक चेतना का पुनरुत्थान भी है. स्वतंत्रता के बाद भारत ने आधुनिकता को अपनाया, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर संकोच दिखाई दिया। 

पिछले बारह वर्षों में भारतीयता, विरासत और सभ्यता पर गर्व करने का भाव अधिक मुखर होकर सामने आया है. यह विचार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक यात्रा को आधुनिक राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का प्रयास भी है. अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो, काशी का पुनर्विकास हो, या विश्व मंचों पर भारतीय परंपराओं और योग का प्रचार- इन सभी के पीछे सांस्कृतिक आत्मविश्वास का वही भाव दिखाई देता है। 

उनसे प्रेरणा प्राप्तकर मध्यप्रदेश भी अपनी विरासत को संजो रहा है. किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था या सेना में नहीं होती. उसकी शक्ति उसके आत्मविश्वास में भी होती है. इस दृष्टि से सांस्कृतिक पुनर्जागरण मोदीजी के कार्यकाल की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। 

वैश्विक मंच पर भारत की नई पहचान
बारह वर्षों की इस यात्रा का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका है. आज का भारत केवल वैश्विक घटनाओं का दर्शक नहीं, बल्कि वह सक्रिय भागीदार और प्रभावशाली आवाज है। 

विदेश नीति में यह परिवर्तन केवल कूटनीतिक उपलब्धि नहीं है. इसके पीछे यह विचार है कि भारत को अपनी सभ्यता, जनसंख्या, अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप वैश्विक भूमिका निभानी चाहिए. विश्व की प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों में संतुलन, वैश्विक संकटों के दौरान स्वतंत्र दृष्टिकोण तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती उपस्थिति ने यह संकेत दिया है कि देश अब स्वयं को सीमित भूमिका में देखने को तैयार नहीं है। 

राजनीति की नई भाषा
नरेंद्र मोदीजी के नेतृत्व ने भारतीय राजनीति की भाषा भी बदली है. पहले चुनावी विमर्श मुख्यतः जातीय समीकरणों, क्षेत्रीय हितों और गठबंधन गणित के इर्द-गिर्द घूमता था. लेकिन आज इसके साथ विकास, आकांक्षा, राष्ट्रीय गौरव और भविष्य की चर्चा भी प्रमुख हो गई है. युवा पीढ़ी विशेष रूप से इस परिवर्तन का हिस्सा बनी है. आज का युवा केवल वर्तमान सुविधाओं की बात नहीं करता, बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारत की कल्पना भी करता है. यह परिवर्तन राजनीतिक विमर्श के स्तर पर महत्वपूर्ण है। 

लोकतंत्र की शक्ति इस बात में है कि वह उपलब्धियों का सम्मान करे और चुनौतियों को स्वीकार करे. हमारे देवतुल्य नेता मोदीजी की सरकार के सामने भी यही संकल्प है कि वे अपने संकल्प को किस प्रकार और अधिक व्यापक रूप से धरातल पर उतारती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के बारह वर्षों को यदि केवल योजनाओं और आंकड़ों से समझने का प्रयास किया जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी. इन बारह वर्षों का वास्तविक महत्व उस सोच में है, जिसने शासन को सेवा से, प्रशासन को सुशासन से और राजनीति को संकल्प से जोड़ने का सफल प्रयास किया है। 

यह कालखंड भारत के आत्मविश्वास, आकांक्षाओं और राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण का कालखंड रहा है. यह नए भारत की आधारशिला है. एक बात और निर्विवाद है कि इन बारह वर्षों ने भारतीय राजनीति और शासन की दिशा पर गहरा प्रभाव छोड़ा है. आज जब यह यात्रा बारह वर्ष पूर्ण कर चुकी है, तब इसे केवल एक सरकार के कार्यकाल के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे दौर के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें भारत ने स्वयं को नए दृष्टिकोण से देखना और दुनिया को अपने बारे में नए ढंग से बताना शुरू किया. यही इस कालखंड की सबसे बड़ी पहचान है- सेवा, सुशासन और संकल्प। 

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