रूसी तेल विवाद पर जयशंकर का पलटवार, बोले- जरूरत पड़ने पर खुद भारत के पास आए थे अमेरिका

नई दिल्ली

 भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अमेरिका और यूरोप को तेल के खेल पर अच्छे से धोया है. रूसी तेल की खरीद के मसले पर एस जयशंकर ने अमेरिका को स्पष्ट संदेश दिया. फिनलैंड की धरती से एस जयशंकर ने अमेरिका को साफ सुनाया कि दिखावा न करो, अमेरिका का तेल वाला खेल भारत अच्छे से जानता है. उन्होंने कहा कि रूस से तेल खरीदने के मामले में भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखा है. भारत तेल की लागत और उपलब्धता के आधार पर तेल खरीदता है. भारत किसी दबाव या नैरेटिव को नहीं मानता. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जिस रूस तेल खरीद को लेकर आज सवाल उठाए जाते हैं, उसी के लिए कभी अमेरिका ने खुद भारत से आग्रह किया था कि भाई प्लीज रूसी तेल खरीद लो, वरना मार्केट की लंका लग जाएगी. वैश्विक तेल बाज़ार को स्थिर रखने के लिए ही अमेरिका ने भारत से रूसी तेल खरीद को लेकर गुहार लगाई थी। 

दरअसल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका और यूरोप को दो टूक जवाब दिया है. उन्होंने कहा कि भारत ने रूस से तेल किसी राजनीतिक या वैचारिक कारण से नहीं, बल्कि अपनी जरूरतों और बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए खरीदा था. जयशंकर ने यह भी दावा किया कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मची हुई थी, तब अमेरिका ने खुद भारत से रूसी तेल खरीदने के लिए कहा था ताकि बाजार स्थिर बना रहे। 

भारत क्यों और कैसे रूसी तेल खरीदने लगा
विदेश मंत्री ने कहा कि 2022 से पहले भारत ने रूस से बहुत अधिक मात्रा में तेल नहीं खरीदा था, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद बनी परिस्थितियों ने भारत को नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर किया. उन्होंने बताया कि उस समय बाजार में जो तेल सबसे अधिक उपलब्ध था, वह रूसी तेल था. कारण कि यूरोपीय देश मिडिल ईस्ट से बड़े पैमाने पर तेल खरीद रहे थे, जो भारत का पारंपरिक सप्लायर रहा है. ऐसे में भारत के सामने रूस से तेल खरीदने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे। 

जयशंकर ने अमेरिका की पोल खोली
उन्होंने याद दिलाया कि उसी दौरान अमेरिका ने भारत से कहा था कि वह रूस से तेल खरीदे, ताकि वैश्विक तेल बादार में कीमतें और आपूर्ति संतुलित रह सके. लेकिन बाद में जब भारत ने अपने हित में निर्णय लेते हुए रूसी तेल की खरीद बढ़ाई, तो पहले उस पर टैरिफ लगाए गए और फिर प्रतिबंधों में ढील दी गई. अमेरिका के इस दोहरे रवैये पर टिप्पणी करते हुए जयशंकर ने कहा,’आइए यह दिखावा न करें कि इसमें कोई बहुत बड़ा सिद्धांत शामिल है. यह पूरा मामला ऑन-ऑफ’ जैसा है. मतलब जब सूट करे तो करो, जब न सूट करे तो मत करो. हम सब समझदार लोग हैं, हम जानते हैं खेल क्या है। 

जयशंकर का पूरा बयान पढ़िए
    फिनलैंड में एक पैनल चर्चा में एस जयशंकर ने कहा, ‘हमने 2022 तक ज़्यादा रूसी तेल नहीं खरीदा. रूस-यूक्रेन जंग के हालात ने हमें मार्केट में उतरने पर मजबूर किया. रशियन हमारे लगातार सप्लायर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि लोग यह याद रखें कि उस समय अमेरिका ने खास तौर पर भारत से रूसी तेल खरीदने के लिए कहा था ताकि ऑयल मार्केट स्टेबल हो सके. अगर आप देखें तो पहले पिछले साल रूसी तेल खरीदने पर हम पर टैरिफ लगाया, फिर अमेरिका ने रूसी तेल पर सैंक्शन हटा दिए. इसलिए यह दिखावा न करें कि इसमें कोई बड़ा प्रिंसिपल शामिल है. कुल मिलाकर बात यह है कि आपका सिद्धांत यह है कि जब हमें सूट करे तब सब ठीक और जब सूट न करे तब सब खराब. यहां हम सब समझदार हैं. हम जानते हैं कि खेल क्या है। 

फिनलैंड में आयोजित एक टॉक में फिनलैंड की विदेश मंत्री एलीना वाल्टोनेन और यूएई की असिस्टेंट विदेश मंत्री लाना नुसेबेह के साथ एक पैनल चर्चा में भाग लेते हुए जयशंकर से रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की स्थिति पर सवाल पूछा गया। 

सवाल: रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर यूरोप में ऐसा माना जा रहा है कि भारत दोनों पक्षों के बीच एक नैतिक समानता (Moral Equivalence) बनाने की कोशिश कर रहा है. जैसे कि आप कह रहे हों कि ‘यह बहुत बुरा हुआ और इसे रुकना चाहिए’ लेकिन आप रूस के प्रति अधिक सहानुभूति रख रहे हैं और उससे तेल खरीदने को तैयार हैं. आप यहां मौजूद लोगों को अपना यह रुख कैसे समझाएंगे?

डॉ. एस. जयशंकर का जवाब: ‘मैं यहां दो बातें कहना चाहूंगा. पहली यह कि मैं तेल खरीदता हूं. मैं तेल की कीमत (Cost) और उसकी उपलब्धता (Availability) के आधार पर इसे खरीदता हूं. उस समय बाज़ार में उपलब्ध ज़्यादातर तेल रूसी था, क्योंकि यूरोपीय देश मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट का तेल खरीद रहे थे, जो कि हमारा पारंपरिक सप्लायर था. ऐसे में परिस्थितियों ने हमें एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया. दूसरी बात चूंकि आपने ‘नैतिक अस्पष्टता’ (Moral Ambiguity) की बात की है, तो मैं यह कहना चाहूंगा कि किसी भी यूरोपीय देश पर कभी भारतीय हथियारों से हमला नहीं हुआ है. काश, मैं यही बात भारत के संदर्भ में यूरोपीय हथियारों के लिए भी कह पाता.’ यूरोपीय देश उन हथियारों को बेचते हैं जिनका इस्तेमाल भारत पर हमला करने के लिए किया जाता है. ऐसा आज से नहीं, बल्कि पिछले कई सालों से हो रहा है. इसके विपरीत, हम भारतीयों ने कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे यूरोप की सुरक्षा खतरे में पड़े. मुझे लगता है कि यह एक बेहद वाजिब और सही तर्क है। 

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